दुष्यंत कुमार की गजलें | Dushyant Kumar Ghazals in Hindi

दुष्यंत कुमार (1 सितम्बर, 1933 : 30 दिसम्बर, 1975) एक हिंदी कवि तथा ग़ज़लकार थे। समकालीन हिन्दी ग़ज़ल के क्षेत्र में जो लोकप्रियता दुष्यंत कुमार को मिली, वो किसी और को नहीं मिल पाई। दुष्यंत ने कविता, गीत, ग़ज़ल, नाटक, काव्य, कथा आदि सभी विधाओं में लेखन कार्य किया परंतु गज़लों की अपार लोकप्रियता ने अन्य विधाओं को नेपथ्य में डाल दिया।

दुष्यंत कुमार की गजलें | Dushyant Kumar Ghazals in Hindi

दुष्यंत कुमार की कुछ लोकप्रिय गजल तथा कविताएँँ:- 


1. हो गई है पीर पर्वत / दुष्यंत कुमार की गजलें


हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए


आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी

शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए


हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में

हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए


सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए


मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही

हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए


2. मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ/ दुष्यंत कुमार की गजलें


मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ 

वो ग़ज़ल आप को सुनाता हूँ 


एक जंगल है तेरी आँखों में 

मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ 


तू किसी रेल सी गुज़रती है 

मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ 


हर तरफ़ एतराज़ होता है 

मैं अगर रौशनी में आता हूँ 


एक बाज़ू उखड़ गया जब से 

और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ 


मैं तुझे भूलने की कोशिश में 

आज कितने क़रीब पाता हूँ 


कौन ये फ़ासला निभाएगा 

मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ 


3. चीथड़े में हिन्दुस्तान / दुष्यंत कुमार की गजलें


एक गुडिया की कई कठपुतलियों में जान है,

आज शायर ये तमाशा देख कर हैरान है।


ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए,

यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है।


एक बूढा आदमी है मुल्क में या यों कहो,

इस अँधेरी कोठारी में एक रौशनदान है। 


मस्लहत-आमेज़ होते हैं सियासत के कदम,

तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है।


इस कदर पाबंदी-ए-मज़हब की सदके आपके

जब से आज़ादी मिली है, मुल्क में रमजान है।


कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,

मैंने पूछा नाम तो बोला की हिन्दुस्तान है।


मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ,

हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है।


4. गांधीजी के जन्मदिन पर / दुष्यंत कुमार की कविता


मैं फिर जनम लूंगा 

फिर मैं 

इसी जगह आउंगा 

उचटती निगाहों की भीड़ में 

अभावों के बीच 

लोगों की क्षत-विक्षत पीठ सहलाऊँगा 

लँगड़ाकर चलते हुए पावों को 

कंधा दूँगा 

गिरी हुई पद-मर्दित पराजित विवशता को 

बाँहों में उठाऊँगा । 


इस समूह में 

इन अनगिनत अचीन्ही आवाज़ों में 

कैसा दर्द है 

कोई नहीं सुनता ! 

पर इन आवाजों को 

और इन कराहों को 

दुनिया सुने मैं ये चाहूँगा । 


मेरी तो आदत है 

रोशनी जहाँ भी हो 

उसे खोज लाऊँगा 

कातरता, चु्प्पी या चीखें, 

या हारे हुओं की खीज 

जहाँ भी मिलेगी 

उन्हें प्यार के सितार पर बजाऊँगा । 


जीवन ने कई बार उकसाकर 

मुझे अनुलंघ्य सागरों में फेंका है 

अगन-भट्ठियों में झोंका है, 

मैने वहाँ भी 

ज्योति की मशाल प्राप्त करने के यत्न किये 

बचने के नहीं, 

तो क्या इन टटकी बंदूकों से डर जाऊँगा ? 

तुम मुझकों दोषी ठहराओ 

मैने तुम्हारे सुनसान का गला घोंटा है 

पर मैं गाऊँगा 

चाहे इस प्रार्थना सभा में 

तुम सब मुझपर गोलियाँ चलाओ 

मैं मर जाऊँगा 

लेकिन मैं कल फिर जनम लूँगा 

कल फिर आऊँगा ।


5. अब तो पथ यही है / दुष्यंत कुमार की कविता


जिंदगी ने कर लिया स्वीकार,

अब तो पथ यही है|


अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है,

एक हलका सा धुंधलका था कहीं, कम हो चला है,

यह शिला पिघले न पिघले, रास्ता नम हो चला है,

क्यों करूँ आकाश की मनुहार ,

अब तो पथ यही है |


क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाए,

एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाए,

एक समझौता हुआ था रौशनी से, टूट जाए, 

आज हर नक्षत्र है अनुदार,

अब तो पथ यही है| 


यह लड़ाई, जो की अपने आप से मैंने लड़ी है,

यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है,

यह पहाड़ी पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है,

कल दरीचे ही बनेंगे द्वार,

अब तो पथ यही है |


6. मत कहो आकाश में कोहरा घना है / दुष्यंत कुमार की गजलें 


मत कहो आकाश में कोहरा घना है,

यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।


सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह का,

क्या कारोगे सूर्य का क्या देखना है।


हो गयी हर घाट पर पूरी व्यवस्था,

शौक से डूबे जिसे भी डूबना है।


दोस्तों अब मंच पर सुविधा नहीं है,

आजकल नेपथ्य में सम्भावना है.


7. मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगे / दुष्यंत कुमार की गजलें


मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगे

इस बूढे पीपल की छाया में सुस्ताने आयेंगे


हौले-हौले पाँव हिलाओ जल सोया है छेडो मत

हम सब अपने-अपने दीपक यहीं सिराने आयेंगे


थोडी आँच बची रहने दो थोडा धुँआ निकलने दो

तुम देखोगी इसी बहाने कई मुसाफिर आयेंगे


उनको क्या मालूम निरूपित इस सिकता पर क्या बीती

वे आये तो यहाँ शंख सीपियाँ उठाने आयेंगे


फिर अतीत के चक्रवात में दृष्टि न उलझा लेना तुम

अनगिन झोंके उन घटनाओं को दोहराने आयेंगे


रह-रह आँखों में चुभती है पथ की निर्जन दोपहरी

आगे और बढे तो शायद दृश्य सुहाने आयेंगे


मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता

हम घर में भटके हैं कैसे ठौर-ठिकाने आयेंगे


हम क्यों बोलें इस आँधी में कई घरौंदे टूट गये

इन असफल निर्मितियों के शव कल पहचाने जयेंगे


हम इतिहास नहीं रच पाये इस पीडा में दहते हैं

अब जो धारायें पकडेंगे इसी मुहाने आयेंगे


8. आग जलती रहे / दुष्यंत कुमार की कविता


एक तीखी आँच ने

इस जन्म का हर पल छुआ,

आता हुआ दिन छुआ

हाथों से गुजरता कल छुआ

हर बीज, अँकुआ, पेड़-पौधा,

फूल-पत्ती, फल छुआ

जो मुझे छूने चली

हर उस हवा का आँचल छुआ

प्रहर कोई भी नहीं बीता अछूता

आग के संपर्क से

दिवस, मासों और वर्षों के कड़ाहों में

मैं उबलता रहा पानी-सा

परे हर तर्क से

एक चौथाई उमर

यों खौलते बीती बिना अवकाश

सुख कहाँ

यों भाप बन-बन कर चुका,

रीता, भटकता

छानता आकाश

आह! कैसा कठिन

कैसा पोच मेरा भाग!

आग चारों और मेरे

आग केवल भाग!

सुख नहीं यों खौलने में सुख नहीं कोई,

पर अभी जागी नहीं वह चेतना सोई,

वह, समय की प्रतीक्षा में है, जगेगी आप

ज्यों कि लहराती हुई ढकने उठाती भाप!

अभी तो यह आग जलती रहे, जलती रहे

जिंदगी यों ही कड़ाहों में उबलती रहे ।


9. आज सडकों पर / दुष्यंत कुमार की गजलें


आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,

पर अन्धेरा देख तू आकाश के तारे न देख ।


एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ,

आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख ।


अब यकीनन ठोस है धरती हक़ीक़त की तरह,

यह हक़ीक़त देख लेकिन ख़ौफ़ के मारे न देख ।


वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे,

कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख ।


ये धुन्धलका है नज़र का तू महज़ मायूस है,

रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख ।


राख़ कितनी राख़ है, चारों तरफ बिख़री हुई, 

राख़ में चिनगारियाँ ही देख अंगारे न देख ।


10. फिर कर लेने दो प्यार प्रिये / दुष्यंत कुमार की कविता


अब अंतर में अवसाद नहीं 

चापल्य नहीं उन्माद नहीं 

सूना-सूना सा जीवन है 

कुछ शोक नहीं आल्हाद नहीं 


तव स्वागत हित हिलता रहता 

अंतरवीणा का तार प्रिये ..


इच्छाएँ मुझको लूट चुकी 

आशाएं मुझसे छूट चुकी 

सुख की सुन्दर-सुन्दर लड़ियाँ 

मेरे हाथों से टूट चुकी 


खो बैठा अपने हाथों ही 

मैं अपना कोष अपार प्रिये 

फिर कर लेने दो प्यार प्रिये ..


11. मापदण्ड बदलो / दुष्यंत कुमार की कविता


मेरी प्रगति या अगति का

यह मापदण्ड बदलो तुम,

जुए के पत्ते-सा

मैं अभी अनिश्चित हूँ ।

मुझ पर हर ओर से चोटें पड़ रही हैं,कोपलें उग रही हैं,

पत्तियाँ झड़ रही हैं,

मैं नया बनने के लिए खराद पर चढ़ रहा हूँ,

लड़ता हुआ

नई राह गढ़ता हुआ आगे बढ़ रहा हूँ ।


अगर इस लड़ाई में मेरी साँसें उखड़ गईं,

मेरे बाज़ू टूट गए,

मेरे चरणों में आँधियों के समूह ठहर गए,

मेरे अधरों पर तरंगाकुल संगीत जम गया,

या मेरे माथे पर शर्म की लकीरें खिंच गईं,

तो मुझे पराजित मत मानना,

समझना –

तब और भी बड़े पैमाने पर

मेरे हृदय में असन्तोष उबल रहा होगा,

मेरी उम्मीदों के सैनिकों की पराजित पंक्तियाँ

एक बार और

शक्ति आज़माने को

धूल में खो जाने या कुछ हो जाने को

मचल रही होंगी ।

एक और अवसर की प्रतीक्षा में

मन की क़न्दीलें जल रही होंगी ।


ये जो फफोले तलुओं मे दीख रहे हैं

ये मुझको उकसाते हैं ।

पिण्डलियों की उभरी हुई नसें

मुझ पर व्यंग्य करती हैं ।

मुँह पर पड़ी हुई यौवन की झुर्रियाँ

क़सम देती हैं ।

कुछ हो अब, तय है –

मुझको आशंकाओं पर क़ाबू पाना है,

पत्थरों के सीने में

प्रतिध्वनि जगाते हुए

परिचित उन राहों में एक बार

विजय-गीत गाते हुए जाना है –

जिनमें मैं हार चुका हूँ ।


मेरी प्रगति या अगति का

यह मापदण्ड बदलो तुम

मैं अभी अनिश्चित हूँ ।