अपना-अपना भाग्य कहानी - जैनेन्द्र कुमार

जैनेन्द्र कुमार हिन्दी की प्रेमचन्द परम्परा के प्रमुख साहित्यकारों में एक प्रसिद्ध साहित्यकार हैं। इन्होंने कहानी, उपन्यास, निबन्ध तथा आलोचना के क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। ये पहले ऐसे लेखक थे, जिन्होंने हिन्दी कहानियों को मनोवैज्ञानिक गहराइयों से जोड़ा। इन्होंने कहानी को घटना के स्तर से उठाकर 'चरित्र' और 'मनोवैज्ञानिक' सत्य पर लाने का प्रयास किया। इन्होंने न केवल व्यक्ति और समाज के पारस्परिक सम्बन्धों की नई व्याख्या की, बल्कि व्यक्ति के मन को उचित महत्ता भी दी। इनके इस योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। 

    जैनेंद्र कुमार का जीवन परिचय

    नाम - जैनेंद्र कुमार (Jainendra Kumar)

    जन्म - 02 जनवरी 1905 (अलीगढ़, उत्तर प्रदेश) 

    निधन - 24 दिसंबर, 1988

    माता का नाम - श्रीमती रमा देवी 

    विधाएँ - उपन्यास, कहानी, निबंध 

    उपन्यास -परख, त्यागपत्र, कल्याणी, सुनीता, मुक्तिबोध आदि। 

    कहानी - फाँसी, वातायन, एक रात, दो चिड़ियाँ, नीलम देश की राजकन्या, पाजेब आदि। 

    निबंध - प्रस्तुत प्रश्न, जड़ की बात, साहित्य का श्रेय और प्रेय, पूर्वोदय, मंथन व सोच विचार आदि। 

    पुरस्कार एवं सम्मान -  साहित्य अकादमी पुरस्कार (वर्ष 1966), पद्म भूषण (वर्ष 1971), भारत भारती सम्मान

    अपना-अपना भाग्य कहानी के पात्र


    अपना-अपना भाग्य कहानी - जैनेन्द्र कुमार

    1. अपना अपना भाग्य कहानी (1929) में पत्रिका विशाल भारत में प्रकाशित हुई थी। 
    2. कहानी संग्रह का नाम वातायन (1931) था।  
    3. इसमें कुल 13 कहानियाँ -

    • फोटोग्राफी 
    • खेल 
    • चोरी
    • अपना अपना भाग्य 
    • अंधे का भेद 
    • दिल्ली मे 
    • आतिथ्य 
    • ब्याह 
    • निर्मम 
    • साधु की हठ 
    • चलित चित्त
    • तमाशा 
    • भाभी

    कहानी अपना-अपना भाग्य कहानी का विषय-वस्तु/विशेषता

    1. समाज का दोहरा चरित्र पर प्रकाश 
    2. अंग्रेजों की गुलामी करनेवालों पर व्यंग्य 
    3. अंग्रेजी और भारतीय सभ्यता का चित्रण 
    4. नैनीताल में पड़ रही ठंड का वर्णन
    5. पहाड़ी गरीब बच्चों का शोषण और उनके हालत पर प्रकाश 
    6. साधन-सम्पन्न स्वार्थी व्यक्तियों द्वारा गरीबों का अनादर
    7. गरीब अथवा अमीर के घर पैदा होना अपना-अपना भाग्य

    अपना-अपना भाग्य कहानी के प्रमुख प्रात्र 

    लेखक - कहानी का एक पात्र जो उदासीन बुद्धिजीवी है। वह केवल घटना पर तटस्थ टिप्पणी करता है। 

    लेखक का मित्र - लेखक का मित्र भावुक स्वभाव का व्यक्ति है। उसके हृदय में बालक के प्रति सहानुभूति का भाव है। 

    बालक - कहानी का मुख्य पात्र 10 वर्षीय बालक है, जो सहज और निश्छल स्वभाव का है। पूरी कहानी उसी के आस-पास घूमती है। वह उन अनेक भारतवासियों का प्रतिनिधित्व करता है, जो अपने-अपने भाग्य के सहारे जीवित हैं। 

    'अपना-अपना भाग्य' कहानी की समीक्षा 

    'अपना-अपना भाग्य' जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित एक प्रसिद्ध कहानी है, जिसमें उन्होंने बड़े ही मार्मिक ढंग से एक गरीब बच्चे का चित्रण किया है, जो भूख और ठण्ड के कारण दम तोड़ देता है और मृत्यु को उसका भाग्य मान लिया जाता है। 

    कहानी में लेखक तथा उसका मित्र नैनीताल घूमने जाते हैं, जहाँ उन्हें एक गरीब बालक ठण्ड से काँपता हुआ मिलता है। उसके पास न तन ढकने को वस्त्र है और न भूख मिटाने को अन्न। वह बालक काम की तलाश में भटकता है, परन्तु उसे कहीं काम नहीं मिलता। वह लेखक तथा उसके मित्र को अपने परिवार तथा मित्र के विषय में बताता है। लेखक तथा उसका मित्र बालक की सहायता कर पाने में स्वयं को असमर्थ मानकर उसे अगले दिन आने को कहते हैं, परन्तु अधिक ठण्ड के कारण अगले दिन बालक की मृत्यु हो जाती है, जिसको वे उसका भाग्य मानते हैं। यहीं पर कहानी समाप्त हो जाती है।

    प्रस्तुत कहानी उस वर्ग पर केन्द्रित है, जो अभाव के कारण उपेक्षित जीवन जीने के लिए विवश है। दस वर्ष का एक बालक भूख से पीड़ित होकर अपने एक साथी के साथ घर से भागता है और समाज की विषमता का शिकार होकर अन्त में मारा जाता है। दोनों बालकों की मृत्यु को समाज उनका भाग्य मानता है। समाज यह मानने को तैयार नहीं कि दोनों के भाग्य में असमय मृत्यु नहीं लिखी थी, बल्कि एक बालक साहब की मार से मारा जाता है, तो दूसरा बालक समाज की निष्ठुरता से। 

    समाज के अमीर बुद्धिजीवी लोग केवल बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, परन्तु किसी उपेक्षित वर्ग की सहायता नहीं करते हैं। गरीबों के भाग्य को दोषी ठहराकर उन्हें अपने भाग्य के सहारे छोड़कर वे अपने कर्त्तव्य का पूरा होना मान लेते हैं तथा अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से दूर भागते हैं। उच्च वर्ग के लोगों के मन में निम्न वर्ग के लिए कोई सहानुभूति नहीं है। 

    लेखक तथा उसका मित्र बालक की सहायता कर सकते थे। वे उसे रात में सोने के लिए जगह दिलवा सकते थे, उसे अपना कोई कपड़ा दे सकते थे, परन्तु वे कुछ नहीं करते और बालक को उस भयंकर ठण्ड में कल फिर आना कहकर स्वयं चैन की नींद सोने चले जाते हैं। यहाँ लेखक ने सामाजिक असमानता के प्रति बुद्धिजीवियों की उपेक्षापूर्ण उदासीनता एवं असमर्थता की मनोवृत्ति पर व्यंग्य किया है। लेखक तथा उसका मित्र असहाय और बेबस बालक के प्रति अपनी जिज्ञासा को प्रकट करते हैं, लेकिन उसकी सहायता करने के समय में हृदयहीन तथा अमानवीय बन जाते हैं, इसी संवेदनशीलता पर लेखक ने यहाँ व्यंग्य किया है।

    प्रस्तुत कहानी द्वारा जैनेन्द्र कुमार ने सामाजिक विषमता का यथार्थ चित्रण किया है। समाज में गरीब और लाचार बालकों का शोषण दिखाना लेखक का उद्देश्य है। लेखक ने इस कहानी में यह भी स्पष्ट किया है कि जिसकी अपनी सामाजिक पहचान नहीं होती, वह शोषित होकर अपनी पहचान के अभाव में कहीं अच्छी नौकरी नहीं पाता और अन्त में मर जाता है। 

    कहानी के आरम्भ में नैनीताल के प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन भी हुआ है, जिसमें संध्या के समय का अत्यन्त मनोहारी चित्रण किया गया है। वहाँ उपस्थित लोगों, उनकी वेशभूषाओं आदि का भी वर्णन सहजता से किया गया है। इस प्रकार देशकाल वातावरण का चित्रण करने के लिए लेखक ने नैनीताल के जीवन्त चित्र खींचे हैं, साथ ही वहाँ होने वाली सर्दी का वर्णन भी लेखक ने किया है। इस कहानी की भाषा सहज तथा प्रभावपूर्ण है, जिसमें मुहावरों का प्रयोग भी हुआ। लेखक ने वातावरण के चित्रण में भाषा को अधिक रोचक एवं भावपूर्ण बना दिया है। बालक की स्थिति का वर्णन अत्यन्त मार्मिक बन पड़ा है। 

    अतः कह सकते हैं कि 'अपना-अपना भाग्य' कहानी में सामाजिक विषमता तथा अमीर-गरीब के बीच की खाई का वर्णन किया गया है, जो पाठक को सामाजिक परिस्थिति पर सोचने के लिए विवश करती है। साथ ही यह सन्देश भी देती है कि मनुष्य को अपनी मनुष्यता के धर्म का पालन करते हुए परोपकारी बनना चाहिए, ताकि समय आने पर किसी असहाय की सहायता की जा सके, क्योंकि एक छोटी सी सहायता ही किसी व्यक्ति की जान बचा सकती है।

    अपना-अपना भाग्य कहानी PDF Download

    अपना-अपना भाग्य कहानी PDF को Download करने के लिए नीचे दिये गये Link पर Click करें - 


    👇👇


    Download Kahani Apna Apna Bhagya


    Apna Apna Bhagya Kahani MCQ

    अपना-अपना भाग्य कहानी कहानी से संबंधित MCQs निम्नलिखित हैं - 

     प्रश्‍न 01. अपना-अपना भाग्य कहानी में आदमियों की दुनिया ने बस यही उपहार उसके पास छोड़ा था। (यही उपहार क्या है? 

    1. घृणा 
    2. लाचारिपन 
    3. क्रूरता 
    4. काले चिथड़ों की कमीज 

    उत्तर: 4. काले चिथड़ों की कमीज


     प्रश्‍न 02. अपना-अपना भाग्य कहानी में बालक के मां-बाप कहां रहते थे? 

    1. नैनीताल से बीस कोस दूर गांव में। 
    2. नैनीताल से दस कोस दूर गांव में। 
    3. नैनीताल से तेरह कोस दूर गांव में। 
    4. नैनीताल से पन्द्रह कोस दूर गांव में।

    उत्तर: 4. नैनीताल से पन्द्रह कोस दूर गांव में।


     प्रश्‍न 03. अजी, ये पहाड़ी बड़े शैतान होते हैं। बच्चे-बच्चे में गुल छिपे रहते हैं। आप भी क्या अजीब हैं। उठा लाए कहीं से लो।” (किसका कथन है) 

    1. लेखक का 
    2. होटल वाले का 
    3. वकील का 
    4. दुकानदार का 

    उत्तर: 3. वकील का


     प्रश्‍न 04. अपना-अपना भाग्य कहानी में लेखक और उसके मित्रों ने उस लड़के किस होटल में दस बजे के लिए मिलने के लिए बोला ? 

    1. होटल पिंक पोब 
    2. होटल दिलकसा 
    3. होटल डी पब 
    4. होटल द मून 

    उत्तर: 3.  होटल डी पब


     प्रश्‍न 05. "अरे यार ! बजट बिगड़ जाएगा। हृदय में जितनी दया है, पास में उतने पैसे तो नहीं हैं।" (अपना-अपना भाग्य कहानी में यह कथन किसका है ? 

    1. लेखक 
    2. वकील मित्र 
    3. दुकान वाला 
    4. वकील के मित्र 

    उत्तर: 2. वकील मित्र

    👉UGC NET  के Syllabus में दी गई कहानीयॉं -

    { इकाई – VII, हिन्दी कहानी }

    राजेन्द्र बाला घोष (बंग महिला) :चन्द्रदेव से मेरी बातेंदुलाईवाली
    माधवराव सप्रे  :एक टोकरी भर मिट्टी
    सुभद्रा कुमारी चौहान :- राही
    राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह :कानों में कंगना
    चन्द्रधर शर्मा गुलेरी :उसने कहा था
    जयशंकर प्रसाद :आकाशदीप
    जैनेन्द्र :अपना-अपना भाग्य
    फणीश्वरनाथ रेणु :तीसरी कसम, लाल पान की बेगम
    अज्ञेय :- गैंग्रीन
    शेखर जोशी :कोसी का घटवार
    कृष्णा सोबती :सिक्का बदल गया
    ज्ञानरंजन :पिता
    कमलेश्वर :राजा निरबंसिया
    निर्मल वर्मा :परिंदे

    एक टिप्पणी भेजें

    0 टिप्पणियाँ