“द्रुत झरो जगत् के जीर्ण पत्र” कविता में सुमित्रानंदन पंत ने पुरानी रूढ़ियों और जड़ मान्यताओं को त्यागकर नवचेतना और परिवर्तन का संदेश दिया है। यहाँ कविता का सरल सारांश, पद-व्याख्या, प्रतीक, केंद्रीय भाव तथा परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर उपलब्ध हैं।
'द्रुत झरो जगत् के जीर्ण पत्र' कविता का सारांश
'द्भुत झरो जगत् के जीर्ण पत्र' में कविवर सुमित्रानन्दन पन्त ने 'परिवर्तन' की माँग की है। अपनी इस कविता के माध्यम से पन्त जी ने पुरातन रूढ़ियों, परम्पराओं और निष्क्रिय मान्यताओं को समाप्त करने की इच्छा व्यक्त की है। उनका मानना है कि जिस वस्तु की उपयोगिता न हो, उसका नष्ट हो जाना ही स्वाभाविक है
हे ग्रस्त ध्वस्त! हे शुष्क-शीर्ण!
हिम-ताप-पीत, मधुवाट भीट,
तुम वीर-राग, जड़, पुराचीन !!
पन्त जी हमेशा से ही परिवर्तन के पक्षधर रहे हैं, जिस प्रकार पतझड़ आते ही पीले पत्तों का ह्रास हो जाता है, उसी प्रकार हमें भी सड़ी हुई पुरातन रूढ़ियों की श्रृंखलाओं को नष्ट कर देना चाहिए और यही प्रकृति भी कहती है। मनुष्य का जीवन भी ऐसा ही होता है। वृद्धावस्था को प्राप्त मनुष्य भी धीरे-धीरे जीर्ण-शीर्ण होते शरीर के साथ अन्ततः मृत्यु को प्राप्त हो जाता है और अद्वैत हो जाता है।
अतः परिवर्तन प्रकृति और विश्व का नियम है इसी को आधार बनाकर पन्त जी ने कहा है कि हे संसार के मृत्यु को प्राप्त होते पत्र तुम जितनी जल्दी ही शुष्क होकर झड़ जाओ जिससे नई कोपलों के आने का मार्ग जल्दी ही प्रशस्त हो जाए। अर्थात् पुरानी मान्यताओं के नष्ट होने के बाद नवीन परम्पराओं और मान्यताओं का उदय होगा, जिससे समाज के विकास में वृद्धि करने को बल मिलेगा।
'द्रुत झरो जगत् के जीर्ण पत्र' कविता के कुछ पदों की व्याख्या
हिम-ताप-पीत, मधुवात-भीत,
तुम वीर-राग, जड़, पुराचीन !!
निष्मण विगत-युग! मृतविहंग !
जग-नीड़, शब्द ओ श्वास-हीन,
च्युत, अस्त-व्यस्त पंखों से तुम
झर-झर अनन्त में हो विलीन !
व्याख्या -
पन्त जी कहते हैं कि हे जगत् रूपी वृक्ष के जर्जर पत्ते तुम तीव्रता से झर जाओ अर्थात् संसार की पुरातन होती परम्पराओं, तुम नष्ट हो जाओ या हे जगवासियों इन पुरानी होती सड़ती रूढ़ि-श्रृंखलाओं को तुम तोड़ डालो और नवीन मान्यताओं को धारण करके जग में नव-चेतना का संचार करो। पन्त जी कहते हैं कि हे जगत् के जर्जर होते पत्र तुम ध्वस्त हो चुके हो और शुष्क होकर टुकड़े-टुकड़े हो चुके हो। तुम बर्फ और धूप की मार सह-सहकर पीले पड़ गए हो। अब बसन्ती हवाओं से तुम भयभीत हो जाते हो अर्थात् तुम्हें अपने नष्ट होने का भय रहता है। इस समय तुम राग हीन, निष्याय और अत्यन्त पुरातन हो चुके हो। अतः तुम्हारा झरना ही श्रेयस्कर है।
पन्त जी कहते हैं कि हे जगत् के जीर्ण अर्थात् मृतप्राय पत्र तुम निष्प्राण हो चुके हो, तुम्हारा युग बीत चुका है, तुम मृत पक्षी के समान हो। तुम्हारा घोंसला शब्द और श्वास हीन हो चुका है। तुम्हारे पंख अस्त-व्यस्त हो चुके हैं, वे मृतप्राय होकर टूटने वाले हैं। इसलिए तुम झरकर शून्य में विलीन हो जाओ। कहने का तात्पर्य यह है कि इस प्रकृति में परिवर्तन अनिवार्य है, जो मृतप्राय और कमजोर हो जाता है, उसका नष्ट हो जाना ही आवश्यक होता है। पुराने युग के बीत जाने के बाद नव युग की सृष्टि ही विश्व में नई चेतना का संचार करती है।
यहाँ पन्त जी परिवर्तन के माध्यम से मनुष्य को सचेत कर रहे हैं कि हे मानव, तुमने जो पुरानी परिपाटी और मान्यताएँ अपना रखी हैं, उन्हें त्यागकर नवीनता को ग्रहण करो। परिवर्तन ही युग की पुकार होता है। पुराने ढर्रे पर चलते हुए जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। अतः अपने संकीर्ण, पुरातन विचारों को त्यागकर मन में आशा जगाने वाली नई मान्यताओं को ग्रहण करो।
विशेष -
- पन्त जी प्रायः परिवर्तन के समर्थक रहे हैं। उनका मानना है कि समाज की जो प्रचलित पुरानी रूढ़ियाँ विकास की राह में बाधक बने, तो उन्हें त्यागना ही श्रेयस्कर होता है।
- यहाँ तत्सम शब्द युक्त खड़ी बोली भाषा का प्रयोग किया गया
द्रुत झरो कविता के महत्वपूर्ण तथ्य
- नवयुग के निर्माण की भावना पुरानी मान्यताओं, विचारों को नष्ट करने की बात अंधविश्वास, रूढी-प्रथा, परंपराओं को नकारा है
- पुरानी मान्यताएँ जडवत, निर्जीव हो चूकी है
- परिवर्तन ही कवि का मुख्य उद्देश है।
- आधुनिक बोध और प्रगतिवादी चेतना की कविता है ।
- कविता में प्रतीकों का प्रयोग किया गया है।
द्रुत झरो कविता के महत्पूर्ण प्रश्नोंउत्तर
- युगांत
- पल्लव
- ग्राम्या
- ग्रंथि
- सात
- चार
- पाँच
- तीन
- सड़ी-गली परम्पराओं का ।
- विध्वंस का ।
- नव जीवन का।
- नियति का ।
- स्वर्ण किरण
- गुंजन
- पल्लव
- कला और बूढा चाँद
- 1912
- 1934
- 1920
- 1922
- ग्राम्या
- युगांत
- पल्लव
- गुंजन
- छायावादी
- आध्यात्मिक
- प्रगतिवादी
- नव मानवतावादी
- स्रस्त ध्वस्त
- शुष्क शीर्ण
- विगत युग
- नवल रुधिर

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