“प्रथम रश्मि” कविता (सुमित्रानंदन पंत) का सरल हिंदी में सारांश, पद-व्याख्या, महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर एवं अलंकारों सहित सम्पूर्ण अध्ययन सामग्री यहाँ पढ़ें।
'प्रथम रश्मि' कविता का सारांश
'प्रथम रश्मि' कविता में कवि ने सुबह की प्रथम किरण के साथ ही प्रकृति में होने वाले स्वाभाविक परिवर्तन का सटीक व मनोरम चित्रण प्रस्तुत किया है। कवि जिज्ञासा से प्रश्न पूछ रहा है कि प्रथम रश्मि के आने से पूर्व सम्पूर्ण संसार स्तब्ध, मूच्छित था और सजीव-निर्जीव सब मानो एकाकार थे, परन्तु पहली किरण के आते ही उनमें चेतना कैसे जाग गई। कवि को प्रकृति का यह परिवर्तन कौतूहल लगता है। उसे आश्चर्य होता है कि चिड़ियों को रवि के आने का कैसे पता चल गया।
कवि कहता है कि रात्रि में नाना प्रकार के जुगनू सोते हुए तरु-पल्लवों को चूम रहे थे और स्नेह रहित तारों के सम्मुख तरु-पल्लव बिलकुल चेतनाहीन थे, परन्तु अचानक ही किस प्रकार प्रथम किरण का स्पर्श पाते ही पेड़ों पर रहने वाली कोयले कूक उठीं। लेखक कहता है कि हे अन्तर्यामिनी! तुझे किसने बतलाया कि सुबह हो चुकी है।
'प्रथम रश्मि' के कुछ पदों की व्याख्या
तूने कैसे पहचाना?
कहाँ, कहाँ हे बाल-विहंगिनि !
पाया, तूने यह गाना?
सोई थी तू स्वप्न नीड़ में
पंखों के सुख में छिपकर,
झूम रहे थे, घूम द्वार पर,
प्रहरी-से जुगुनू नाना !
शशि किरणों से उत्तर-उतरकर
भू पर कामरूप नभचर
चूम नवल कलियों का मृदु मुख
सिखा रहे थे मुसकाना!
स्नेहहीन तारों के दीपक,
श्वास-शून्य में तरु के पात,
विचर रहे थे स्वप्न अवनि में,
तम ने था मंडप ताना!
कूक उठी सहसा तरुवासिनि,
गा तू स्वागत का गाना
किसने तुमको अन्तर्यामिनि,
बतलाया उसका आना?
व्याख्या -
कविवर पन्त कहते हैं कि हे बाल विहंगिनी (चिडिया) सुबह को प्रथम किरण का आना तूने कैसे पहचाना अर्थात तुम्हें कैसे पता चला की सुबह हो गई है? हे रंगिनी अर्थात रंगीन पंखों वाली तूने सुबह होते ही ये चहचहाकर गाना कैसे सीखा?
कवि कहते हैं कि तू तो अपने घोंसले में सोई हुई अपने पंखों में छुप कर सपनों में खोई हुई थी। दरवाजे पर पहरेदार को तरह बहुत से जुगुन झूम-झूमकर घूम रहे थे। चन्द्रमा की चांदनी के साथ पृथ्वी पर कामदेव के समान बहुत से पक्षी नई कलियों के मुख को चूम-घूम कर उन्हें मुस्कुराना सिखा रहे थे। तेल रहित तारे रूपी दिए, श्वास से रहित वृक्षों के पत्ते अर्थात् (वृक्षों के वे पत्ते जो बिलकुल स्थिर थे) ये सभी स्वप्न रूपी पृथ्वी पर विचरण कर रहे थे, क्योंकि चारों ओर अन्धकार का ही साम्राज्य था। अचानक पेड़ों पर रहने वाली कोयल कूक उठी और स्वागत का गीत गाने लगी। हे अन्तर्यामिनी! ये बतला तुझे सुबह की प्रथम किरण का आना किसने बतलाया?
विशेष -
- सुबह की प्रथम किरण के पृथ्वी पर आने पर प्रकृति में हो रहे विभिन्न परिवर्तनों से कवि अचंभित है। वे यह सोच रहे हैं कि इन सबको अर्थात् पक्षियों को सुबह होने का आखिर पता कैसे चला?
- यहाँ उपमा, यमक आदि अलंकारों का सुन्दर प्रयोग किया गया है।
ज्योति-पुंज में हो साकार,
बदल गया द्रुत जगत्-जाल में
धर कर नाम रूप नाना!
सिहर उठे पुलकित हो द्रुम दल,
सुप्त समीरण हुआ अधीर,
झलका हास कुसुम अधरों पर
हिल मोती का-सा दाना !
खुले पलक, फैली सुवर्ण छवि,
जगी सुरभि, डोले मधु बाल,
स्पन्दन कंपन औ 'नव जीवन'
सीखा जग ने अपनानाः
प्रथम रश्मि का आना रंगिणि,
तूने कैसे पहचाना?
कहाँ-कहाँ हे बाल-विहंगिनि
पाया यह स्वर्गिक गाना?
व्याख्या -
कवि कहते हैं कि सुबह की पहली किरण के आते ही अचानक निराकार अँधेरा प्रकाश के पुंज के रूप में साकार हो उठा। वह अन्धकार तीव्र संसार के जाल में फैसकर विभिन्न नामों के रूप में बदल गया। वृक्षों के पत्ते पुलकित होकर सिहर उठे अर्थात् वे भी सुबह की किरण को देखकर आनन्दित होकर हिलने लगे। जो वायु शान्त होकर बह रही थी वो भी अधीर होकर तेजी से बहने लगी। फूलों के होठों पर पड़ी हुई मोती जैसी ओस हिलकर झिलमिलाने लगी। पलकों के खुलते ही सुवर्ण छवि चारों ओर फैल गई अर्थात् फूलों की पंखुड़ियाँ जो रात्रि में बन्द थीं, खुल गईं। उनके खुलने से चारों ओर उनकी सुगन्ध फैल गई और उन पर भँवरे भिनभिनाने लगे। पूरे संसार ने नए जीवन को और काँपती धड़कनों को अपनाना सीख लिया।
कवि कहता है कि हे विनोदिनी! सुबह की पहली किरण के आगमन को तूने कैसे पहचाना? हे छोटी चिड़िया तुमने यह स्वर्ग जैसा आनन्द प्रदान करने वाला गीत गाना कहाँ से सीखा।
विशेष -
- प्रस्तुत पद में सुबह की प्रथम किरण के साथ प्रकृति में आए सकारात्मक परिवर्तन को दिखाया गया है।
- यहाँ अनुप्रास, उपमा आदि अलंकारों का सुन्दर प्रयोग किया गया है।
'प्रथम रश्मि' कविता के महत्वपूर्ण तथ्य
प्रथम रश्मि कविता के महत्पूर्ण प्रश्नोंउत्तर
- पल्लव
- वीणा
- गुंजन
- ग्राम्या
- छायावादी
- प्रगतिवादी
- प्रयोगवादी
- रीतिवादी
- उपमा
- रूपक
- रूपकातिशयोक्ति
- उत्प्रेक्षा
- सुबह
- क्षितिज
- धरती
- बादल
- उज्ज्वल
- मनमोहिनी
- श्रीहीन
- नभचारिणी

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