‘परिवर्तन’ सुमित्रानंदन पंत की दार्शनिक एवं विचारप्रधान कविता है, जो उनके काव्य-संग्रह पल्लव में संकलित है। इसमें कवि ने परिवर्तन को जीवन और जगत का शाश्वत सत्य स्वीकार करते हुए उसके विनाशकारी तथा सृजनात्मक दोनों रूपों का चित्रण किया है। कविता में सुख-दुःख, जीवन-मृत्यु, उत्थान-पतन और नव-निर्माण की प्रक्रिया को परिवर्तन के माध्यम से व्यक्त किया गया है। यह रचना छायावादी काव्य की दार्शनिक ऊँचाइयों का प्रतिनिधित्व करती है।
परिवर्तन कविता का विषय
🔴कविता में कवि ने परिवर्तन को जीवन एवं जगत का का शाश्वत सत्य स्वीकार किया है।
🔴परिवर्तन के सुंदर एवं सकारात्मक रूप के साथ-साथ कुरूप एवं विनाशकारी रूप का भी चित्रण।
🔴'परिवर्तन' कविता में निहित संदेश
🔴परिवर्तन जीवन का शाश्वत सत्य ।
🔴परिवर्तन ही संसार के विकास का आधार।
🔴संसार में सुख-दुख जीवन के दो पहलू हैं तथा जीवन में दोनों का आना निश्चित है।
🔴संसार में दीनता और दुर्बलता है, इसीलिए यहाँ, दया, क्षमा और प्यार जैसी अद्भुत भावनाएँ हैं।
🔴जगत् की परिवर्तनशीलता के कारण ही आज का दुख कल का आनंद बन जाता है।
🔴जीवन और मृत्यु भी इसी परिवर्तन के दो पहलू हैं।
🔴जीवन का अर्थ है जगत् का निरंतर विकसित होना और मृत्यु का अर्थ है गति तथा क्रम का नष्ट हो जाना।
परिवर्तन कविता का सारांश
परिवर्तन कविता की मानसिकता पर विचार करते हुए कवि ने स्वयं लिखा है कि "जन्म के मधुर रूप में मृत्यु दिखाई देने लगी तथा वसंत के कुसुमित आवरण के भीतर पतझर का अस्थिर अन्तर।"
"खोलता इधर जन्म लोचन, मूँदती उधर मृत्यु क्षण-क्षण।"
मेरी जीवन-दृष्टि का मोह एक प्रकार से छूटने लगा और सहज जीवन व्यतीत करने की भावना को धक्का लगा। इस क्षणभंगुरता के 'बुदबुदों' के व्याकुल संसार में परिवर्तन ही एक मात्र चिरंतन सत्ता लाने लगी।
कवि ने परिवर्तन को अत्यन्त निष्ठुर, कठोर एवं दुर्ममनीय बताया है। इसमें घिसटता व्यक्ति निरन्तर दुःख व क्षोभ से पीड़ित रहता है, लेकिन कवि ने परिवर्तन को मात्र इसी रूप में नहीं देखा, अपितु सृष्टि के एक सहज रूप में देखकर उसे सुन्दर, सत्य और शिव भी सिद्ध किया है। कवि केवल दुःखवाद से ही सृष्टि के स्वरूप को नहीं देखता, अपितु उसमें सुन्दर सुख की स्थिति भी पाता है।
पन्त जी के समीक्षक श्री शान्ति प्रिय द्विवेदी ने पल्लव की 'परिवर्तन' कविता के विषय में लिखा है- "परिवर्तन में कवि की विशेषता यह है कि उसने दर्शन शास्त्र की शुष्कता में भी काव्य का रस संचार कर दिया है। ज्ञान को भाव बना दिया है, काल को कला का स्पर्श दे दिया है।"
परिवर्तन का अनुभूति पक्ष 'पल्लव' की अनेक कविताओं के समान किसी भावस्फुरता से रूपायित नहीं होता अपितु उसका स्वरूप स्थितियों की परस्पर टकराहटों से जन्म लेता है। यहाँ आकर राग-रंजित सौन्दर्य-सुधा कैशौर्यभाव, बालकों की उन्मुक्तता, राशि-राशि यौवन-विस्तार का सुखद अनुभवा समाप्त-सा होता है और जीवन की यथार्थ स्थिति का कटु अनुभव प्रारम्भ हो जाता है। इस कविता में भावों की प्रबलता न होकर विचारों को व्यवस्था प्रदान की गई है लेकिन यह विचार कवि की अनुभूति का अंग बनकर ही काव्य-रूप में व्यक्त हुआ है। विश्व के निरन्तर परिवर्तनशील रूप की या प्रकृति की कठोरताओं की मार्मिक अनुभूति की तड़प ही इस कविता की संरचना का मूल आधार है। शान्ति प्रिय द्विवेदी के शब्दों में "उसमें परिवर्तनमय विश्व की करुण अभिव्यक्ति इतनी वेदनाशील हो उठी है कि वह सहज ही सभी पदों को अपनी सहानुभूति से बाँध लेना चाहती है। परिवर्तन कविता का अनुभव-जगत् अत्यन्त विस्तृत है। श्रृंगार की रागात्मकता, ध्वंस का निनाद, असित और नासित का भावुक-विधान, यौवन और जरा की आँख मिचौली, शान्ति और अशान्ति का खेल आदि सब मिलकर इस कविता को विस्तृत तथा नव आयाम प्रदान करते हैं।
परिवर्तन कविता के कुछ पदों की व्याख्या
तुम्हारा ही तांडव नर्तन
विश्व का करुण विवर्तन !
तुम्हारा ही न्यनोन्मीलन,
निखिल उत्थान, पतन !
अहे वासुकि सहस्र फन !
लक्ष्य अलक्षित चरण तुम्हारे चिन्ह निरन्तर
छोड़ रहे हैं जग के विक्षत वक्षस्थल पर !
शत-शत फेनोच्छवासित, स्फीत फुतकार भयंकर
घुमा रहे हैं घनाकार जगती का अंबर!
मृत्यु तुम्हारा गरल दंत, कंचुक कल्पान्तर,
अखिल विश्व की विवर
वक्र कुंडल
दिग्मडल !
व्याख्या -
सुमित्रानन्दन पन्त जी कहते हैं कि अरे निष्ठुर अर्थात् निर्दयी परिवर्तन संसार में चारों और तुम ही ताण्डव रूपी नृत्य करते फिर रहे हो। संसार में तुम्हारी आँखों का खुलना ही इसके उत्थान पतन का कारण बनता है। संसार में तुम्हारी ही करुणा परिक्रमा कर रही है। कवि कहते हैं कि अरे हजार फनों वाले वासुकि नाग रूपी परिवर्तन तुम्हारे ही ज्ञात-अज्ञात चरण इस संसार के विक्षत वक्षस्थल पर लगातार अपना निशान छोड़ रहे हैं।
कवि कहते हैं कि तुम्हारे सैंकड़ों फनों से युक्त भयंकर फुंकार से ही यह घनाकार पृथ्वी आकाश घूम रहा है। अरे निष्ठुर परिवर्तन, मृत्यु तुम्हारा विष से भरा दाँत है और अनेक युग तुम्हारे वस्त्र हैं। यह सम्पूर्ण संसार, दिशाएँ आदि तुम्हारे मुख हैं। तात्पर्य यही है कि इस सम्पूर्ण विश्व में परिवर्तन ही सबकुछ है। वही प्रत्येक स्थान पर व्याप्त है।
विशेष -
- प्रस्तुत पद में विश्व में होते परिवर्तन को ही उत्थान-पतन का कारण बताया गया है।
- मानवीकरण अलंकार एवं तत्सम शब्दावली का प्रयोग किया गया है।
ज्वाते शत सुरवर नरनाथ
तुम्हारे इन्द्रासन-तल माथ;
घूमते शत-शत भाग्य अनाथ,
सतत रथ के चक्रों के साथ !
तुम नृशंस से जगती पर चढ़ अनियन्त्रित,
करते हो संसृति को उत्पीड़न पद-मर्दित,
नग्न नगर कर, भग्न भवन, प्रतिमाएँ खंडित
हर लेते हो विभव, कला, कौशल चिर संचित !
आधि, व्याधि, बहुवृष्टि, वात, उत्पात, अमंगल
वहिन, बाढ़ भूकम्प-तुम्हारे विपुल सैन्य दल;
अहे निरंकुश ! पदाघात से जिनके विहवल
हिल-इल उठता है टलमल
पद दलित धरातल !
व्याख्या -
पन्त जी कहते हैं कि हे दुर्जेय, विश्व को जीतने वाले परिवर्तन तुम पर कोई विजय प्राप्त नहीं कर सकता। तुम्हारे सामने सैंकड़ों देवता और राजा शीश नवाते हैं। तुम्हारे सामने इन्द्र का आसन भी कुछ नहीं है। सैंकड़ों भाग्यशाली सरल रथ के चक्रों के साथ घूमते हुए तुम निर्दयी और अत्याचारी बनकर पृथ्वी पर अनियन्त्रित रूप से चढ़ जाते हो और पूरे संसार को उत्पीड़ित करते रहते हो और पैरों से उसका मर्दन करते रहते हो।
हे भयंकर परिवर्तन ! तुम अपनी नष्ट करने वाली शक्तियों के साथ नगर के नगर खाली कर देते हो, भवनों को खंडहर बना देते हो और प्रतिमाओं को तोड़ देते हो। हे परिवर्तन ! तुम पुरातन काल से संचित वैभव, कला और कौशल को हर लेते हो। रोग, विपत्ति, अधिक वर्षा, वायु, उत्पात, अमंगल, अग्नि, बाढ़ भूकम्प आदि तुम्हारे बहुत से सैन्य दल हैं। अरे, निरंकुश परिवर्तन, तुम्हारे पैसे के आघात से ये पृथ्वी हिलती हुई प्रतीत होती है और सारा धरातल तुम्हारे पैरों तले कुचल जाता है।
विशेष -
- प्रस्तुत पद में परिवर्तन के भयंकर रूप का अद्भुत वर्णन किया गया है।
- यहाँ भयानक रस की निष्पत्ति हुई है।
- यहाँ मानवीकरण अलंकार, अनुप्रास अलंकार आदि का प्रयोग किया है।
फिर नवल रुधिर, पल्लव-लाली !
प्राणों की मर्मर से मुखरित
जीव की मांसल हरियाली!
मंजरित विश्व में यौवन के
जग कर जग का पिक, मतवाली
निज अमर प्रणय-स्वर मदिरा से
भर दे फिर नव-युग की प्याली।
व्याख्या -
पन्त जी कहते हैं कि जिस प्रकार कंकाल-जाल पर नए रक्त और लालिमा युक्त देह तथा प्राणों से युक्त जीवन की सुन्दर और मांसल देह पुष्ट होकर मनोहर हो जाती है उसी तरह संसार में परिवर्तन के बाद होने वाले नव निर्माण से संसार में चारों तरफ हरियाली छा जाती है।
कवि कहते हैं कि जग रूपी कोयल नव यौवन से पुष्पित होकर मतवाली हो जाती है तथा अपने अमर प्रणय स्वर की मदिरा से नव-युग की प्याली को भर देती है अर्थात अपने मधुर स्वर से उपवन को गंजायमान कर उसमें नव्यता का संचार कर हुई नव-युग को सुष्टि से पूरा विश्व प्रफुल्लित हो जाता है। चारों दिशाएँ महकने लगती हैं और नव जीवन फलने-फूलने देती है, उसी तरह पुनर्निर्माण के बाद हुई लगता है।
विशेष -
- प्रस्तुत पद्यांश में प्रतीकात्मक शैली का प्रयोग किया गया है।
- यहाँ यमक, रूपक अलंकारों का प्रयोग किया है।
परिवर्तन कविता के संदर्भ में विद्वानों के मत
✋डॉ० नागेंद्र ने इस कविता को ग्रैंड भाव महाकाव्य कहा है और लिखा है कि "पंत जी के इस ग्रैंड भाव महाकाव्य को उनकी प्रतिनिधि कृत कहना अनुचित न होगा ।"
✋शांतिप्रिय द्विवेदी ने यहाँ तक लिखा है - "परिवर्तन में कवि की विशेषता यह है कि उसने दर्शन-शास्त्र की शुष्कता में भी काव्य का रस-संचार कर दिया है, ज्ञान को भाव बना दिया है, काल को कला स्पर्श दे दिया है। 'पल्लव' के अन्य चित्रपटों पर सधी हुई तुलिका ने ही 'परिवर्तन' में एक प्रशस्त चित्रपट पा लिया है। इसमें सभी छंदो और सभी रसों का समावेश है। कथा का आधार लेकर लिखे गए हिंदी के प्रबंध-काव्य अनेक है, किंतु बिना किसी आधार के केवल भाव व कला को इतना विशद काव्य खड़ीबोली में कोई नहीं !"
✋सुप्रसिद्ध समालोचक आचार्य नंददुलारे वाजपेयी भी इस कविता की महत्ता पर रीझ कर स्पष्ट शब्दों में लिखते है कि - "परिवर्तन में पहुँचकर पंत जी की कल्पना सचेष्ट होकर अपनी शक्ति का परिचय देती है। 'उच्छ्वास', 'आँसू', 'ग्रंथि' आदि के वैयक्तिक अनुभवों के उपरांत 'परिवर्तन' में कवि की निर्लेप कल्पना प्रस्फुटित हो उठी है और यहाँ वह जीवन के संबंध में निराशामूलक, कितु तटस्थ विचार प्रकट करती है। यदि यह कथन ठीक है कि कविता शरीर के रिढ़ दर्शन (philosophy) है, तो 'परिवर्तन' में कविता को यह रीढ़-दृढ़ रीढ़ मिल गई है। परिवर्तन को हम दार्शनिक काव्य कह सकते हैं और पंत जी की सुंदरतम रचनाओं में से मानते हैं।"
✋श्री 'विशम्भर मानव' जी ने कहा है कि - "परिवर्तन पंत जी की पहली महत्वपूर्ण विचार-प्रधान रचना है। यह वह पहली रचना है, जिसमें कवि व्यापक दृष्टि से सृष्टि की घटनाओं पर विचार करता है।"
✋महाकवि निराला ने लिखा है कि - "परिवर्तन किसी भी बड़े कवि की कविता से निस्संकोच मैत्री कर सकता है।" इसके साथ ही कविवर पंत ने भी स्वयं इसे 'पल्लव' काल की प्रतिनिधि रचना घोषित किया है।
परिवर्तन (कविता) – सुमित्रानंदन पंत के महत्वपूर्ण तथ्य
'परिवर्तन' यह कविता 1924 ई. में लिखी गई थी। कविता रोला छंद में रचित है। यह एक लम्बी कविता है। यह कविता 'पल्लव' नामक काव्य संग्रह में संकलित है। परिवर्तन कविता को समालोचकों ने एक 'ग्रैंड महाकाव्य' कहा है। स्वयं पंत जी ने इसे पल्लव काल की प्रतिनिधि रचना मानते हैं।
परिवर्तन को कवि ने जीवन का शाश्वत सत्य माना है। यहाँ सबकुछ परिवर्तनशील है। इसमें परिवर्तन के कोमल और कठोर दोनों रूपों का चित्रण है। परिवर्तन को रोकने की क्षमता किसी में भी नहीं है।
"पल्लव की प्रतिनिधि रचना 'परिवर्तन' में विगत वास्तविकता के प्रति असंतोष तथा परिवर्तन के आग्रह की भावना विद्यमान है। साथ ही जीवन की अनित्य वास्तविकता के भीतर से नित्य सत्य को खोजने का प्रयत्न भी है जिसके आधार पर नवीन वास्तविकता का निर्माण किया जा सके । " - 'सुमित्रानंदन पंत'
परिवर्तन का छायावादी शिल्प भी अद्वितीय एवं बेजोड़ है। युवा पन्त ने दार्शनिकता से युक्त इस कविता की रचना कर अत्यधिक प्रसिद्धी पाई थी।

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