इस लेख में प्रभावी संप्रेषण की परिभाषा, वाचिक एवं अवाचिक संप्रेषण, अन्तःसांस्कृतिक एवं सामूहिक संप्रेषण, कक्षा संप्रेषण के सिद्धान्त तथा संचार के Seven C’s का विस्तृत और सरल वर्णन किया गया है। यह सामग्री विद्यार्थियों, प्रतियोगी परीक्षाओं तथा बी.एड./प्रबंधन अध्ययन के लिए उपयोगी है।
प्रभावी संप्रेषण
Effective Communication
प्रभावी संप्रेषण प्रेषक द्वारा प्राप्तकर्ता को सूचना भेजने की प्रक्रिया है। इसके अन्तर्गत सूचना पहुँचाने के लिए ऐसे माध्यम का प्रयोग किया जाता है, जिसके द्वारा संप्रेषित सूचना प्रेषक और प्राप्तकर्ता दोनों को समझ में आ जाए। इन माध्यमों में वाचिक, गैर-वाचिक अन्तःसांस्कृतिक एवं सामूहिक संप्रेषण तथा कक्षा संप्रेषण को शामिल किया जाता है, जिसका वर्णन निम्न प्रकार है
1. वाचिक संप्रेषण
Verbal Communication
मानव की सबसे बड़ी विशेषता उसकी वाचिक या शाब्दिक भाषा है इसलिए प्राणियों में मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, जबकि अन्य प्राणी केवल ध्वनि एवं संकेत पर निर्भर होते हैं।
इस संप्रेषण के अन्तर्गत संप्रेषक अपने विचारों एवं भावों की अभिव्यक्ति लिखित भाषा के रूप में या शब्दों के रूप में बोलकर करता है। वाचिक/शाब्दिक संप्रेषण को निम्न दो भागों में विभाजित किया जाता है
(i) मौखिक संप्रेषण (Oral Communication) जिस संप्रेषण में बोलकर क्रिया की जाती है, उसे मौखिक संप्रेषण कहते हैं। दूसरे शब्दों में, किसी संदेश को बोलकर उच्चारित करना अथवा जो संदेश बिना लिखे हुए पहुँचाया जाता है, उसे मौखिक संप्रेषण कहते हैं। इसमें दो पक्ष प्रेषक (Sender) और प्राप्तकर्ता (Receiver) होते हैं। इस संप्रेषण में भाषा प्रमुख रूप से मौखिक होती है। इस प्रकार के संप्रेषण के द्वारा ही मानवीय संबंधों की स्थापना होती है; जैसे- सार्वजनिक स्थान, संगठन अथवा घर इन सभी में मौखिक संप्रेषण ही व्यक्तियों को आपस में एक सूत्र में जोड़ते हैं।
उल्लेखनीय है कि संप्रेषण की इस क्रिया में प्रयुक्त होने वाले माध्यम को मौखिक माध्यम कहा जाता है। यहाँ कुछ प्रमुख मौखिक माध्यम निम्नलिखित हैं
- प्रत्यक्ष या आमने-सामने वार्तालाप (Direct or Face to Face Communication)
- सभा (Meeting)
- सम्मेलन (Conference)
- भाषण (Speech)
- टेलीफोन पर वार्तालाप (Conversation Over the Telephone)
- साक्षात्कार (Interview)
- रेडियो प्रसारण (Radio Broadcasting)
- सामूहिक संवाद (Group Discussion)
- विचार गोष्ठी (Seminar)
(ii) लिखित संप्रेषण (Written Communication) जब प्रेषक कोई सूचना अथवा संदेश लिखित में संप्रेषित करता है, तो वह लिखित/अमौखिक संप्रेषण कहलाता है। ऐसे संदेश जिन्हें स्थायी व भविष्य में सन्दर्भ के रूप में रखना हो, तो लिखित संप्रेषण का उपयोग किया जाता है। लिखित संप्रेषण में शब्दों की स्पष्टता एवं वाक्यों में पूर्णता का ध्यान रखना आवश्यक होता है, जिससे कि सामने वाले व्यक्ति को उक्त संदेश समझ में आ सके। लिखित संप्रेषण के अभाव में किसी व्यापार का संचालन सम्भव नहीं है। इस संप्रेषण के माध्यम से संदेशों के रिकॉर्ड को सुरक्षित रखा जा सकता है। लिखित संप्रेषण के लिए किसी भाषा, कूट, संकेत आदि का प्रयोग किया जाता है।
लिखित संप्रेषण के कुछ प्रमुख माध्यम निम्नलिखित हैं
- पत्र (Letter)
- समाचार पत्र (Newspaper)
- ईमेल (Email)
- सूचना (Notice)
- प्रश्नावली (Questionnaire)
- चित्र (Diagram)
- फैक्स (Fax)
- चार्ट (Chart)
2. अवाचिक/गैर-वाचिक / अशाब्दिक संप्रेषण
Non-Verbal Communication
इस प्रकार के संप्रेषण में किसी भी प्रकार के भाषागत शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाता। इसके अन्तर्गत चिन्हों, लक्षणों, संकेतों तथा सूचित चिन्हों का प्रयोग किया जाता है अर्थात् इसमें विचारों, भावनाओं एवं अभिव्यक्तियों को बिना शब्दों के प्रयोग के व्यक्त किया जाता है। प्रारम्भ में जब मानव सभ्यता में शब्दों की खोज नहीं हुई थी, तो उस समय भी व्यक्ति अपने संदेशों का संप्रेषण संकेत एवं चिन्हों के माध्यम से ही करता था, किन्तु आज 21वीं शताब्दी में मानव सभ्यता विकसित हो गई है तथा सूचना और संप्रेषण के आधुनिक साधन उपलब्ध हो गए हैं। इसके बावजूद आज भी अवाचिक संप्रेषण आवश्यक है, क्योकि वह भावुक विचार संदेश जो हजारों शब्दों के द्वारा भी संप्रेषित नहीं हो पाता, वह मात्र संकेत चिन्ह, भाव-भंगिमा के द्वारा कुछ पलों में ही संप्रेषित किया जा सकता है। यह संप्रेषण का एक शक्तिशाली व प्राकृतिक माध्यम है।
अवाचिक संप्रेषण का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया जा सकता है
(i) ध्वनि संकेत (Audio Sign) ध्वनि की गति, आकृति व तरंगदैर्ध्य के अनुसार ध्वनि संकेत में भाषा के अलग-अलग अर्थ होते हैं; जैसे-कार्यालय में बर्जर, स्कूल में घण्टी, एम्बूलेंस के सायरन की आवाज, युद्ध के समय ब्लैकआउट तथा पुराने समय में शंखों की ध्वनि (युद्ध प्रारम्भ और समाप्ति पर) तथा शहनाई की आवाज खुशी के समय आती है।
(ii) दृश्य संकेत (Visual Sign) भाषा में ड्राइंग, चार्ट, चित्र पेण्टिंग, फोटो कॉपी, खुदाई प्रतिमा, बस स्टैण्ड व रेलवे स्टेशन पर लाल, हरी व पीली रोशनी (प्रकाश) आदि जो अपने अलग-अलग अर्थों में सभी को संप्रेषित करती है।
(iii) पार्श्व भाषा (Para Language) पार्श्व भाषा भी अवाचिक संप्रेषण का सशक्त माध्यम है। पार्श्व भाषा मौखिक संप्रेषण की अभिव्यक्ति को प्रभावशाली बनाती है। मौखिक संप्रेषण में शब्द होते हैं, जबकि पार्श्व भाषा अवाचिक होती है।
(iv) दैहिक भाषा अथवा बॉडी लैंग्वेज (Body Language) मनुष्य का शारीरिक संचालन भाव-भंगिमा (Body Movement), ध्यान मुद्रा, दृष्टि सम्बन्ध (Eye Contact) आवाज में उतार-चढ़ाव, आदि को दैहिक भाषा के माध्यम के रूप में व्यक्त किया जाता है। यह माध्यम अपने संदेशों व विचारों को प्रभावी ढंग से संप्रेषित करते हैं। इसके अन्तर्गत, हाथों से संकेत करना, मुँह हिलाना, हाथ हिलाना इत्यादि को शामिल किया जाता है।
3. अन्तः सांस्कृतिक संप्रेषण
Inter Cultural Communication
यह संप्रेषण दो या अधिक संस्कृतियों के बीच किया जाने वाला संप्रेषण है। इस संप्रेषण के अन्तर्गत हम विभिन्न संस्कृति एवं सामाजिक समूहों के के बारे में अध्ययन करते हैं अथवा कैसे हम प्रभावी सांस्कृतिक संप्रेषण कर सकतें हैं। इस संप्रेषण के वक्त हम यह समझाने का प्रयास करते हैं कि विश्व के विभिन्न देशों के लोग कैसी क्रिया करते हैं, कैसे संचार करते हैं तथा वो विश्व के बारे में क्या अनुभव करते हैं। इस प्रकार का संप्रेषण सामाजिक गुणों, सोच प्रारूप और विभिन्न समूहों, देशों व विश्व की संस्कृति पर केन्द्रित होता हैं। इसके कारण हमें विभिन्न प्रकार के संस्कृति सेवाएँ प्रदान करने में सहायता मिलती है।
4. सामूहिक संप्रेषण
Group Communication
यह संप्रेषण कुछ लोगों के समूह के बीच होता है, जिनका उद्देश्य समान होता है। यह अन्तर्वैयक्तिक संप्रेषण का विस्तार होता है, जिसमें दो या दो से अधिक व्यक्ति आपस में अपने विचार, दक्षता रुचि को साझा करते हैं। यह लोगों को एक साथ आने व अपने विचार व अनुभव को साझा करने का अनुभव अवसर प्रदान करता है। यह लोगों के संप्रेषण कौशल में वृद्धि करता है।
प्रभावी कक्षा-संप्रेषण
Effective Classroom Communication
कक्षा में शिक्षण प्रक्रिया एक प्रकार का संप्रेषण है। शिक्षण एक सहयोगात्मक क्रिया है। इसमें दो पक्ष अध्यापक और शिक्षार्थी होते हैं। इसके अन्तर्गत मुख्य भूमिका शिक्षक निभाता है। कक्षा के क्रिया-कलाप भी संचार प्रक्रिया में शामिल हैं। इसमें विचारों तथा सूचनाओं का आदान-प्रदान होता है। यदि संप्रेषण के आधार पर शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को देखा जाए तो स्पष्ट होगा कि शिक्षण संप्रेषण प्रक्रिया वास्तव में संप्रेषण प्रक्रिया ही है, जो निरन्तर चलती रहती है। कक्षा में संप्रेषण प्रक्रिया निम्न प्रकार होती है
पूछना → कहना → सुनना → समझना आदि।
प्रभावी कक्षा संप्रेषण के सिद्धान्त
सन्देश, छात्र, शिक्षण विधि और मीडिया, शिक्षक आदि पर कक्षा संप्रेषण की प्रभावशीलता निर्भर करती है। कक्षा संचार के सिद्धान्तों को निम्न चार शीर्षकों के अन्तर्गत वर्णित किया गया है
1. शिक्षकों के लिए सिद्धान्त
शिक्षकों के सिद्धान्त निम्नलिखित हैं -
शिक्षक में छात्रों को समझने की योग्यता कक्षा में प्रभावी संप्रेषण के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि शिक्षक में छात्रों को समझने एवं उनके बौद्धिक स्तर के अनुसार वार्तालाप करने की योग्यता होनी चाहिए।
विषय में दक्षता शिक्षक का अपने विषय पर पूर्ण अधिकार अथवा अपने विषय का सम्पूर्ण ज्ञान होना चाहिए जिससे वे छात्रों की विषय में रुचि उत्पन्न कर सकें तथा उनकी जिज्ञासा शान्त कर सकें।
प्रभावी संप्रेषण कौशल कक्षा शिक्षण में मौखिक संप्रेषण होता है तथा शिक्षक एवं छात्र आमने-सामने होते हैं।
अतः शिक्षक को अपनी बातों को प्रभावशाली तरीके से पहुंचाने के लिए प्रोजेक्टर ग्राफ, रेखाचित्र तथा शिक्षा क्षेत्र में उपयोगी नवीनतम उपकरण का प्रयोग करना चाहिए।
वस्तुनिष्ठ एवं कर्त्तव्यनिष्ठ शिक्षक शिक्षक के वस्तुनिष्ठ एवं कर्तव्यनिष्ठ होने पर छात्र उनका सम्मान करते हैं। जिसके परिणामस्वरूप कक्षा में संप्रेषण और अधिक प्रभावी हो जाता है।
2. सन्देश नियत करने के सिद्धान्त
सन्देश नियत करने के सिद्धान्त निम्न हैं
अनुक्रम का उचित होना इसके अन्तर्गत अनुक्रम का सरल से जटिल की ओर, मूर्त से अमूर्त की ओर का अनुसरण कर सकते हैं।
सरल भाषा का प्रयोग कक्षा संप्रेषण के अन्तर्गत तकनीकी भाषा का प्रयोग न करके सरल भाषा का ही प्रयोग करना चाहिए।
उचित प्रतीकों का उपयोग इनके उपयोग के द्वारा विद्यार्थियों को किसी भी विषय को आसानी से समझाया जा सकता है।
प्रासंगिक अभ्यास विद्यार्थी की कक्षा एवं मानसिक स्तर के अनुरूप इस प्रकार के अभ्यास दिए जा सकते हैं।
3. शिक्षण-विधियों और मीडिया के चयन के लिए सिद्धान्त
शिक्षण विधियों व मीडिया के चयन के लिए निम्न सिद्धान्त हैं
उचित विधियों व मीडिया का चयन ये विधियाँ शिक्षार्थी के स्तर के अनुरूप होनी चाहिए।
अच्छे मीडिया का उपयोग किसी भी मीडिया का उपयोग करने से पूर्व उसकी दृश्यता, गुणवत्ता, स्पष्टता आदि को ध्यान में रखना चाहिए।
शिक्षण अधिगम तथा मीडिया का एकीकरण शिक्षण अधिगम तथा मीडिया में एकरूपता होनी चाहिए अर्थात् छात्रों को यह नहीं लगना चाहिए कि शिक्षण अधिगम और मीडिया पृथक् है। उदाहरणस्वरूप यदि छात्रों को कोई फिल्म दिखाई जा रही है, तो उस फिल्म के विषय पर चर्चा भी होनी चाहिए, जिससे छात्र फिल्म के माध्यम से दिए गए सन्देश को आत्मसात् कर सकें।
4. अनुकूल वातावरण बनाने के लिए सिद्धान्त
अनुकूल वातावरण बनाने के सिद्धान्त निम्नलिखित हैं
छात्रों के बैठने के लिए उचित व्यवस्था कक्षा में छात्रों के लिए उचित फर्नीचर, प्रकाश आदि का प्रबन्ध होना चाहिए, जिससे शिक्षक की बात को ध्यान से सुन सकें तथा इन्हें किसी असुविधा का अनुभव न हो।
कक्षा का अनुकूल वातावरण कक्षा का वातावरण अनुकूल और प्रजातान्त्रिक होना चाहिए, जिससे छात्रों को प्रश्न पूछने और अपनी राय देने की पूर्ण स्वतन्त्रता हो।
प्रबलता प्रदान करना इसके अन्तर्गत शिक्षार्थियों को प्रशंसा, पुरस्कार आदि के माध्यम से प्रबल बनाया जाता है।
विद्यार्थियों की सीमित संख्या कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या सीमित होनी चाहिए जिससे शिक्षक प्रत्येक विद्यार्थी पर ध्यान केन्द्रित कर सकें। इसके लिए नियामक संस्था शिक्षक-छात्र अनुपात तय करती है।
छात्रों के साथ सामंजस्य शिक्षक और छात्र के सम्बन्ध मैत्रीपूर्ण होने चाहिए जिससे छात्र के मन में शिक्षक के प्रति भय उत्पन्न न हो सके।
संप्रेषण के सात 'सी'
Seven 'C' of Communication
1. विश्वसनीयता (Credibility) - मैषक (sender) द्वारा प्रेषित सन्देश का स्रोत विश्वसनीय होना चाहिए।
2 सन्दर्भ (Context) - संचार ऐसा हो जो वर्तमान परिस्थिति से सम्बन्ध रखता हो।
3. विषय-वस्तु (Content) - प्रेषक (Sender) और प्राप्तकर्ता (Receiver) को विषय-वस्तु की पूर्ण जानकारी होनी चाहिए।
4. स्पष्टता (Clarity) - सन्देश की भाषा स्पष्ट एवं सरल होनी चाहिए।
5 संगतता (Consistency) - संचार समाप्त न होने वाली प्रक्रिया है। अतः सन्देश की प्रत्येक पुनरावृत्ति में संगतता होनी चाहिए।
6. माध्यम (Channel) - संचार में प्रेषक एवं प्राप्तकर्ता के अनुकूल ही माध्यमों का उपयोग होना चाहिए।
7. श्रोताओं की क्षमता (Capability of Audience) - सन्देश को प्रेषित करने से पूर्व ही श्रोताओं की क्षमताओं का आकलन करना चाहिए तथा उसी के अनुरूप सन्देश प्रेषित होना चाहिए।

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