खड़ी बोली (कौरवी) का इतिहास, विशेषताएँ, क्षेत्र और प्रमुख कवि | Khadi Boli in Hindi

खड़ी बोली का इतिहास

खड़ी बोली (कौरवी)

अर्थ : 'खड़ी बोली' शब्द का प्रयोग दो अर्थों में होता है एक तो साहित्यिक हिंदी खड़ी बोली के अर्थ में और दूसरा दिल्ली-मेरठ के आसपास की लोक-बोली के अर्थ में| यहाँ दूसरे अर्थ में ही इस शब्द का प्रयोग किया जा रहा है। इसी अर्थ में 'कौरवी' का भी प्रयोग कुछ लोग करते हैं। खड़ी बोली में 'खड़ी' शब्द का अर्थ विवादास्पद है। कुछ लोगों ने 'खड़ी' का अर्थ 'खरी' (pure) अर्थात शुध्द माना है, तो दूसरों ने 'खड़ी' (standing) | कुछ अन्य लोगों ने इसका संबंध खड़ी बोली में अधिकता से प्रयुक्त खड़ी पायी '1' (गया, खड़ा, का) तथा उसके ध्वन्यात्मक प्रभाव कर्कशता से जोड़ा है। अभी तक यह प्रश्न अनिश्चित है।

उद्भव / विकास : 

खड़ी बोली या कौरवी का उद्भव शौरसेनी अपभ्रंश के उत्तरी रूप से हुआ है।

क्षेत्र : 

इसका क्षेत्र देहरादून का मैदानी भाग, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, दिल्ली का कुछ भाग, बिजनौर, रामपुर तथा मुरादाबाद है।

बोलनेवालों की संख्या : 

अनुमानतः डेढ़ करोड़ |

साहित्य : 

लोक साहित्य की दृष्टि से खड़ी बोली बहुत संपन्न है और - इसमें पवाडा, नाटक, लोककथा, लोकगीत आदि पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। इनका काफी अंश प्रकाशित भी हो चूका है। हिंदी उर्दू हिन्दुस्तानी तथा दक्खिनी एक सीमा तक खड़ी बोली पर आधारित हैं।

प्रमुख कवि : 

अमीर खुसरों, भारतेंदु, महावीर प्रसाद व्दिवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्यासिंह उपाध्याय, नाथूराम शर्मा शंकर, श्रीधर पाठक आदि |

विशेषताएँ :

  • शब्दों का आकारांत होना | जैसे आणा, खोट्टा, लोट्टा, आदि|
  • व्यंजन व्दित्व की प्रवृत्ति | जैसे बेट्टा, बाप्पू, उप्पर, गड्डी, आदि
  • खड़ी बोली में छोटे 'न' के स्थान पर बड़े 'ण' का प्रयोग होता है। जैसे - खाणा, जाणा, राणी, अपणा आदि|
  • खड़ी बोली के कुछ विशिष्ट अव्यय उसके स्वरूप की अन्यतम विशेषता को व्यक्त करते हैं। जैसे कद (कब), जद (जब), इब (अब), - होर (और), कदी (कभी) आदि |
  • खड़ी बोली में प्रयुक्त कुछ सर्वनाम भी विशेष प्रकार के हैं। जैसे मुज (मुझ), म्हारा (हमारा), थारा (तुम्हारा), कुच्छ (कुछ), विस्का (उसका) कोण (कौन) |
  • राहुल सांकृत्यायन एवं डॉ भोलानाथ तिवारी ने खड़ीबोली को 'कौरवी' नाम दिया हुआ है।
  • हिंदी और उर्दू दोनों ही खड़ीबोली की बेटियाँ हैं
  • मानक हिंदी का विकास खड़ीबोली से हुआ है।
  • खुसरों खड़ी बोली के पहले कवि (आदिकाल), पहली बार साफ सुथरी खड़ीबोली का प्रयोग किया है।
  • व्दिवेदी युग में - महावीर प्रसाद व्दिवेदी (सरस्वती) ने खड़ीबोली को काव्य भाषा बनाने तथा उसका परिष्कार एवं परिमार्जन करने का कार्य किया।
  • छायावाद युग में खड़ीबोली में लाक्षणिकता, कोमलता मृदुता एवं - मधुरता का समावेश हुआ
  • छायावाद के उपरान्त खड़ीबोली पूर्ण रूप समर्थ एवं सक्षम भाषा बन चुकी थी। जिसमें नये प्रयोग इस काल में हो रहे थे।

खड़ी बोली की उपबोलियां

खड़ी बोली हिन्दी की पांच उपभाषाएं और अठारह बोलियां शामिल हैं౼

            उपभाषाएँ          बोलियाँ

1.       पश्चिमी हिन्दी           ख़ड़ी बोली (कौरवी), ब्रजभाषा, बुन्देली, हरियाणवी (बाँगरू), कन्नौजी।                         

2.       पूर्वी हिन्दी                अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी।

3.       राजस्थानी                मारवाड़ी, जयपुरी, मेवाती, मालवी।

4.       पहाड़ी                     गढ़वाली, कुमायुंनी, नेपाली।

5.       बिहारी                    मैथिला, मगही, भोजपुरी।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ