छायावादी काव्य का जन्म द्विवेदी युगीन काव्य की प्रतिक्रिया स्वरूप हुआ, क्योंकि द्विवेदीयुगीन कविता विषयनिष्ठ, वर्णन प्रधान और स्थूल थी, जबकि छायावादी कविता व्यक्तिनिष्ठ, कल्पना प्रधान एवं सूक्ष्म है।
इस पोस्ट में छायावाद क्या है? हिंदी साहित्य में छायावाद की परिभाषा, विशेषताएँ, प्रमुख कवि और प्रवृत्तियाँ सरल भाषा में पढ़ें। UGC NET, SET और अन्य परीक्षाओं के लिए उपयोगी नोट्स।
छायावाद की समय सीमा
छायावाद का विकास द्विवेदीयुगीन कविता के पश्चात् हुआ। सामान्यतः छायावादी काव्य की सीमा 1918 से 1936 ई. तक मानी जाती है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भी छायावाद का प्रारम्भ 1918 ई. से माना है। 1918 ई. में जयशंकर प्रसाद की कृति 'झरना' प्रकाशित हो चुकी थी तथा निराला की कविता 'जूही की कली' 1916 ई. में प्रकाशित हो चुकी थी। प्रसाद की कामायनी 1936 में प्रकाशित हुई तथा 1936 ई. में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई। उपरोक्त सभी बातों को ध्यान में रखकर छायावाद की अन्तिम सीमा 1936 मानना उपयुक्त है।
छायावाद का अर्थ
‘छायावाद’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है – छाया + वाद।
यहाँ ‘छाया’ का अर्थ प्रत्यक्ष के स्थान पर अप्रत्यक्ष या संकेतात्मक अभिव्यक्ति से है।
छायावादी कवियों ने अपने भावों को सीधे न कहकर प्रतीकों, रूपकों और बिंबों के माध्यम से व्यक्त किया।इसलिए इस काव्यधारा को छायावाद कहा गया।
सरल शब्दों में कहा जाए तो –
छायावाद हिंदी कविता की वह काव्यधारा है जिसमें कवि अपने अंतर्मन की भावनाओं, कल्पना, प्रकृति-सौंदर्य और रहस्यात्मक अनुभूतियों को प्रतीकात्मक शैली में व्यक्त करता है।
विभिन्न विद्वानों के अनुसार छायावाद की परिभाषा
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार, "छायावाद शब्द का प्रयोग दो अर्थों में समझना चाहिए एक तो रहस्यवाद के अर्थ में जहाँ उसका सम्बन्ध काव्यवस्तु से होता है अर्थात् जहाँ कवि उस अनन्त और अज्ञात प्रियतम को आलम्बन बनाकर अत्यन्त चित्रमयी भाषा में प्रेम की अनेक प्रकार से व्यंजना करता है. छायावाद का दूसरा प्रयोग काव्य शैली या पद्धति विशेष के व्यापक अर्थ में है।"
डॉ. नगेन्द्र के अनुसार, "छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह है। यह एक विशेष प्रकार की भाव पद्धति है, जीवन के प्रति विशेष भावात्मक दृष्टिकोण है।"
डॉ. रामकुमार वर्मा के अनुसार, "परमात्मा की छाया आत्मा में, आत्मा की छाया परमात्मा में पड़ने लगती है, तब छायावाद की सृष्टि होती है।"
जयशंकर प्रसाद के अनुसार, "कविता के क्षेत्र में पौराणिक युग की किसी घटना अथवा देश-विदेश की सुन्दरता के बाह्य वर्णन से भिन्न जब वेदना के आधार पर स्वानुभूतिमयी अभिव्यक्ति होने लगी, तब हिन्दी में उसे छायावाद के नाम से अभिहित किया गया। ध्वन्यात्मकता, लाक्षणिकता, सौन्दर्यमय प्रतीक विधान तथा उपचार के साथ स्वानुभूति की विवृत्ति छायावाद की विशेषताएँ हैं।"
आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी के अनुसार, "मानव तथा प्रकृति के सूक्ष्म किन्तु व्यक्त सौन्दर्य में आध्यात्मिक छाया का भाव छायावाद की सर्वमान्य व्याख्या हो सकती है।"
महादेवी वर्मा के अनुसार, "छायावाद तत्त्वतः प्रकृति के बीच जीवन का उद्गीत है।"
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार, "छायावाद के मूल में पाश्चात्य रहस्यवादी भावना अवश्य थी। इस रहस्यवाद की मूल प्रेरणा अंग्रेजी की रोमाण्टिक भावधारा की कविता से प्राप्त हई थी।"
उपरोक्त विद्वानों की परिभाषाओं से स्पष्ट है कि -
- छायावाद में स्थूलता के स्थान पर सूक्ष्मता दिखाई देती है।
- छायावादी काव्य में रहस्यवादी प्रवृत्ति विद्यमान है।
- छायावाद प्रेम, प्रकृति व सौन्दर्य का काव्य है।
- छायावाद में स्वानुभूति की प्रधानता है।
- छायावादी कविता अंग्रेज़ी रोमाण्टिक काव्यधारा से प्रभावित है।
- छायावाद में सांस्कृतिक चेतना, मानवतावादी दृष्टिकोण की प्रमुखता है।
छायावादी काव्य की विशेषताएँ
छायावादी काव्य की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
आत्म अभिव्यक्ति
छायावादी कविता में कवियों ने अपने व्यक्तिगत जीवन के निजी प्रसंगों को खोजने का प्रयास किया। इन्होंने अपनी भावनाओं की खुलकर अभिव्यक्ति की। सुख-दुःख से परिपूर्ण कविताएँ खूब लिखी गईं। जयशंकर प्रसाद कृत 'आँसू' व पन्त कृत 'उच्छवास' इसका उदाहरण है।
पन्त जी अपनी प्रियतमा को पूजने की बात करते हैं
पूजता हूँ मैं तुम्हें कुमारि, मूँद दुहरे दृग द्वार।।
निराला जी राम की शक्ति पूजा में अपने जीवन की निराशा को अभिव्यक्त करते हैं। जीवनभर वे लोगों का विरोध झेलते रहे। निम्नलिखित पंक्तियाँ उनके दर्द को बयाँ करती हैं
धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध।।
सौन्दर्य चित्रण
छायावादी कवि मूलतः प्रेम व सौन्दर्य के कवि हैं। छायावादी कवियों ने नारी को उसकी प्रेमिका के रूप में ग्रहण किया जो हृदय व यौवन की सम्पूर्ण विभूतियों से परिपूर्ण है। जयशंकर प्रसाद 'कामायनी' की श्रद्धा का सौन्दर्य चित्रण करते हैं
खिला हो ज्यों बिजली का फूल, मेघवन बीच गुलाबी रंग।।
छायावादी कवियों ने सौन्दर्य के स्थूल चित्रण की अपेक्षा उसके सूक्ष्म प्रभाव का ही चित्रण किया है। प्रेम के क्षेत्र में छायावादी कवि किसी प्रकार की रूढ़ि मर्यादा व नियमबद्धता को स्वीकार नहीं करते। निराला लिखते है
दोनों हम भिन्न वर्ण, भिन्न जाति भिन्न रूप भिन्न धर्म भाव पर, केवल अपनाव से, प्राणों से एक थे।
नारी का उदात्त रूप में चित्रण
छायावादी कवियों ने नारी को उदात्त रूप प्रदान करते हुए उसे पुरुष की प्रेरक शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। नारी दया, क्षमा, साहस, प्रेम, करुणा की मूर्ति है, श्रद्धा की पात्र है। प्रसाद जी लिखते हैं
पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में।।
नारी यहाँ सहचरी, सखी तथा प्रेयसी बनकर आई। वह भी सामन्ती बन्धनों में जकड़ी हुई थी। चहारदीवारी में कैद तथा भोग की वस्तु के रूप में नारी यातना ग्रस्त थी। छायावादियों ने नारी शरीर के प्रतिमानों की जगह उसके हृदय की अतल गहराइयों पर ध्यान दिया। पन्त जी ने यह स्पष्ट किया कि नारी सिर्फ भोग (सेक्स) का उपकरण नहीं है, बल्कि जीवन और समाज का अभिन्न अंग भी है
योनि नहीं है रे नारी, वह भी मानवी प्रतिष्ठित।
छायावादी रचनाकारों ने नारी के प्रेम को पवित्र व पावन गंगा की तरह माना। यह माना कि इससे पुरुष हृदय में पड़ी हुई ग्रन्थियों को भी खोला जा सकता है। पन्त ने इस प्रेम को कामशक्तियों से कोसों दूर माना
अभी तक तो पावन प्रेम कहलाया नहीं पापाचार। कोई मुझको आज यह मदिरा हाय गंगा जल की धार।
प्रकृति चित्रण
पन्त जी ने यह माना कि प्रकृति जीवन के सर्वाधिक निकट है। इसके दावे को नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता। मानव को प्रकृति ने सिर्फ दिया ही है बदले में वह कोई अपेक्षा नहीं करती। यही वजह है कि उन्होंने प्रकृति के प्रेम के आगे नारी प्रेम को भी त्याज्य माना
बाले तेरे बाल जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन,
भूल अभी से इस जग को।
छायावादी प्रकृति यदि सुन्दर है तो भयावह भी है। रचनाकारों ने माना कि प्रकृति प्रतिध्वनन के सिद्धान्त पर कार्य करती है। जयशंकर प्रसाद जी ने अपनी रचना कामायनी में दोनों रूपों की चर्चा की
यह प्रकृति परम रमणीय अखिल ऐश्वर्य भरी शोधक की एक तुम और यह विस्तृत भूखण्ड, प्रकृति वैभव से भरा अमन्द।
प्रसाद जी ने माना कि यदि मनुष्य प्रकृति का संरक्षण करे तो यह प्रकृति भी जीवन का रक्षक बनकर उभरती है, परन्तु आज अतिशय विज्ञानवाद और घोर औद्योगीकरण ने प्रकृति के साथ जिस प्रकार खिलवाड़ किया उससे प्रकृति का क्षय कितना हुआ, ये तो नहीं आँका जा सका, लेकिन प्रकृति का पलटवार जग-जाहिर है। विश्व परिदृश्य में प्राकृतिक असन्तुलन से उत्पन्न घटनाओं ने मानव जीवन को अस्त-व्यस्त करके रख दिया है। इस वैज्ञानिक छेड़छाड़ से प्राकृतिक शक्तियों ने ताण्डव मचाना शुरू किया है। कामायनी में जल प्रलय की समस्या का चित्रण इसी सन्दर्भ में किया गया।
दुःख और वेदना की अभिव्यक्ति
छायावादी काव्य में दुःख और वेदना की अभिव्यक्ति प्रमुखता से हुई है। महादेवी वर्मा तो वेदना की कवयित्री हैं। वे अपने जीवन की तुलना नीर भरी बदली से करती हैं
मेरा न कभी अपना होना, परिचय इतना इतिहास यही
उमड़ी कल थी मिट आज चली।
प्रसाद का 'आँसू' काव्य भी कवि की पीड़ा की अभिव्यक्ति ही है। वे कहते हैं
दुर्दिन में आँसू बनकर वह आज बरसने आई।।
पन्त ने 'परिवर्तन' कविता में यह स्वीकार किया है कि जगत में दुःख 'सुमेरु' की भाँति अत्यधिक और सुख 'सरसों' की भाँति अत्यल्प है
अरे जग है जग का कंकाल।।
वृथा रे ये अरण्य चीत्कार।
शान्ति सुख है उस पार।।
रहस्यवाद
छायावाद की एक प्रमुख प्रवृत्ति रहस्यवाद है। पन्त की 'मौन निमन्त्रण' कविता में रहस्यवाद की अभिव्यक्ति अत्यन्त मनोरम ढंग से हुई है जहाँ कवि को प्रकृति के उपादानों में उस अज्ञात सत्ता के 'मौन निमन्त्रण' का आभास होता है
जान मुझको अबोध अनजान।
सुझाते हो तुम पथ अनजान।
फूंक देते छिद्रों में गान ।।
निराला की 'तुम और मैं' कविता तथा महादेवी जी का सम्पूर्ण काव्य रहस्यवादी भावनाओं से ओत-प्रोत है।
कल्पनाशीलता
छायावादियों ने काव्य कर्म के लिए कल्पनाशीलता को महत्त्वपूर्ण माना। प्रसिद्ध स्वच्छन्दतावादी आलोचक आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने साहित्य और कल्पना की अटूट रिश्ते की चर्चा की। निराला जी ने कविता में कल्पनाशीलता को सर्वोपरी मानते हुए कहा कि कविता कल्पना कानन (जंगल) की देवी है। पन्त जी ने कल्पनाओं को विह्वल बाल का दर्जा दिया। कैशोर्य भावुकता इस धारा की कविता की एक परवर्ती के रूप में रही है जिसका सीधा-सीधा सम्बन्ध कवि कल्पना से है। पन्त ने अन्यत्र लिखा कोई भी गम्भीर अथवा व्यापक अनुभूति काल्पनिक ही होती है।
छायावादी धारा भारतीय समाज के संक्रमण को दर्शाती है। एक तरफ पश्चिमी विज्ञानवादी, बौद्धिकतावादी संस्कृति तो दूसरी तरफ भारतीय भावुकता। जहाँ बौद्धिकता का प्रश्न है उसे तो यथार्थवाद से जोड़ा जा सकता है लेकिन भावुकता का आग्रह कल्पना से परे नहीं हो सकता है।
यह स्वीकार किया कि जिस प्रकार सृष्टिकर्ता नित नई सृजना को जन्म देता है उसी प्रकार कवि का सृजक मन कल्पनाशील होकर ही नवीनता से जुड़ सकता है। छायावादियों के लिए कल्पनाशीलता आवश्यक तथा मजबूरी दोनों का रूप लेकर आई। कविता बन्धन विरोध की तो चर्चा करती है, लेकिन वास्तव में, मुक्ति बहाल नहीं की जा सकती। ऐसी कल्पनाओं में ही सृष्टिकर्ता ने मुक्ति टटोलने या बहाल करने का प्रयास किया; जैसे
आह! कल्पना का सुन्दर यह मधुर जगत कितना होता।
शिल्पगत विशेषताएँ
छायावादी कवियों ने अपने काव्य में लाक्षणिकता का प्रयोग किया है, जिससे भाषा अत्यन्त सशक्त एवं प्रभावमयी बन गई है; जैसे
डूबा है सारा ग्राम प्रान्त।
यहाँ कवि शान्ति की अधिकता को बताता है। सारा ग्राम प्रान्त शब्द रहित सन्ध्या में डूबा हुआ था। यहाँ 'डूबा' शब्द में लक्षणा शब्दशक्ति है।
छायावादी कवियों ने अपने काव्य में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग किया है;
जैसे
अम्बर पनघट में डुबो रही
ताराघट ऊषा नागरी।"
यहाँ ऊषा प्रकृति है वह मानव नहीं है उसे मानव के रूप में वर्णित करना मानवीकरण अलंकार का उदाहरण है।
बिम्ब योजना
छायावादी कवियों ने अपने काव्य में बिम्ब का प्रयोग अत्यन्त सफलतापूर्वक किया है। कवि शब्दों द्वारा ऐसा चित्र उपस्थित करता है, जिससे इन्द्रियों के सामने वर्ण्य-विषय का एक चित्र प्रकट हो जाता है, इसे वह पाठक के सम्मुख प्रस्तुत करना चाहता है। पाठक उस बिम्ब से तादात्म्य स्थापित कर लेता है। कहीं पर यह श्रव्य बिम्ब होता है, कहीं पर स्पर्श बिम्ब होता है
श्रव्य बिम्ब का एक उदाहरण है
छम छम छम छम गिरती बूंदे तरुओं से छन के।
प्रतीक योजना
छायावादी काव्य की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता प्रतीक योजना है। छायावादी कवि विभिन्न प्रतीकों के द्वारा अपनी बात कहता है, इससे कथन में वक्रता आ जाती है
निशा को धो देता राकेश चाँदनी में जब अलकें खोल कली से कहता था मधुमास बता दे मधु मदिरा का मोल।
यहाँ पर निशा, राकेश, कली, मधुमास आदि के माध्यम से नायक-नायिका के प्रेम की अभिव्यक्ति मिलती है। प्रकृति के ये पदार्थ उपमान नहीं हैं, प्रतीक हैं।
छायावाद के प्रमुख कवि
छायावाद के प्रमुख चार कवि हैं- जयशंकर प्रसाद, सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला', सुमित्रानन्दन पन्त तथा महादेवी वर्मा। इन्हें छायावाद के मुख्य स्तम्भ माना जाता है।
जयशंकर प्रसाद (1889-1937 ई.)
छायावाद के प्रवर्तक एवं श्रेष्ठ छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद का जन्म 1889 ई. में काशी के एक सम्पन्न वैश्य परिवार में हुआ था। बाल्यकाल से ही इनकी कविता के प्रति रुचि जाग्रत हो गई थी। इन्हें अनेक कवियों का भी सान्निध्य मिला। पहले ये ब्रजभाषा में कविताएँ लिखते थे, किन्तु बाद में इन्होंने खड़ी बोली में कविताएँ लिखनी शुरू की। प्रसाद जी बहुमुखी प्रतिभासम्पन्न तथा शिव के उपासक थे। अपने जीवन संघर्षों, आत्मीयजनों से बिछड़ना, अर्थाभाव तथा पत्नी-वियोग आदि कष्टपूर्ण जीवन को झेलते हुए भी हिन्दी काव्य जगत को इन्होंने काव्यरूपी बहुमूल्य रत्न दिए हैं। अत्यधिक श्रम और क्षय रोग (टी. बी.) से पीड़ित रहने के कारण 15 नवम्बर, 1937 को मात्र 48 वर्ष की अल्पायु में ही इनका निधन हो गया।
जयशंकर प्रसाद 'छायावादी युग के प्रवर्तक' के नाम से जाने जाते हैं। उनके साहित्य में भारतीय संस्कृति का प्रखर चित्रण हुआ है। इनके द्वारा रचित काव्यकृति 'कामायनी' एक अमर कृति है।
इस कृति पर इन्हें 'हिन्दी साहित्य सम्मेलन' की ओर से 'मंगलाप्रसाद पारितोषिक' प्राप्त हुआ था। 'कामायनी' में छायावादी प्रवृत्तियों और विशेषताओं के दर्शन होते हैं। इनके काव्य का मुख्य आधार प्रेम और सौन्दर्य रहा है। इन्होंने प्रतीकात्मक, चित्रात्मक तथा गीतात्मक काव्य भाषा का प्रयोग किया। प्रसाद जी ने 'हंस' और 'इन्दु' नामक पत्रिकाओं का प्रकाशन भी कराया। प्रसाद जी ने हिन्दी साहित्य की गद्य-पद्य दोनों विधाओं में अपनी कला का प्रदर्शन किया है। ये मूलतः कवि है और इन्होंने 27 कृतियों की रचना की थी।
प्रसाद की प्रमुख रचनाएँ -
इनकी प्रमुख रचनाएँ (काव्य-संग्रह) निम्नलिखित है
कामायनी महाकाव्य 'कामायनी' प्रसाद जी की सर्वश्रेष्ठ कृति मानी जाती है, जिसे विश्व-साहित्य में प्रमुख स्थान प्राप्त है। इसमें मनु, श्रद्धा और इड़ा के माध्यम से मानव को हृदय (श्रद्धा) और बुद्धि (इड़ा) के समन्वय का सन्देश दिया गया है। कामायनी में पन्द्रह सर्ग हैं- चिन्ता, आशा, श्रद्धा, काम, वासना, लज्जा, कर्म, ईर्ष्या, इड़ा, स्वप्न, संघर्ष, निर्वेद, दर्शन, रहस्य, आनन्द। प्रसाद जी ने 'कामायनी' में अभिव्यक्त जीवन दर्शन के माध्यम से आधुनिक मानव को अपना जीवन सुखी बनाने हेतु कुछ दिशा-निर्देश दिए हैं। प्रसाद के दार्शनिक विचारों पर सर्वाधिक प्रभाव 'शैव दर्शन' के अन्तर्गत आने वाले 'प्रत्यभिज्ञा दर्शन' का पड़ा है। कामायनी में प्रयुक्त अनेक पारिभाषिक शब्द प्रत्यभिज्ञा दर्शन के शब्द हैं। प्रसाद जी की निपुणता यह रही है कि उन्होंने दर्शन के नीरस एवं शुष्क विचारों को भाव एवं कल्पना के योग से सरस एवं सर्वजन सुलभ बना दिया है, परिणामतः कथा कहीं बोझिल नहीं हुई है। कामायनी के दार्शनिक विचार व्यावहारिक हैं, जिन्हें अपनाकर मानव अपने जीवन को आनन्दमय बना सकता है।
इस कृति में आनन्द प्राप्ति के लिए प्रसाद ने 'हृदय और बुद्धि', 'सुख और दुःख', 'इच्छा, ज्ञान और क्रिया' की समरसता पर बल दिया है। इसमें प्रमुख पात्र मनु जल प्लावन की घटना में देव जाति के विनाश के विषय में विचार करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि देव जाति अहंकार, अकर्मण्यता और भोग विलास की अधिकता के कारण नष्ट हुई।
आँसू यह विशुद्ध विरह काव्य है। इसमें अनुभूति और कल्पना प्रधान है। कवि की भावुकता इस काव्य में मुख्य रूप से दृष्टिगत हुई है।
झरना इसमें प्रेम, सौंदर्य तथा प्रकृति का सुन्दर चित्रण किया गया है, जो छायावादी कविताओं का संग्रह है।
लहर इस कृति में भावगत मानसिक स्थितियों का मार्मिक चित्रण किया गया है तथा यह एक मुक्तक रचना है।
प्रसाद जी ने इनके अतिरिक्त चित्राधार, करुणालय, कानन कुसुम, प्रेम-पथिक, महाराणा का महत्त्व, उर्वशी, वन-मिलन, प्रेम राज्य, अयोध्या का उद्धार, शोकोच्छवास आदि कृतियों की भी रचना की है।
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' (1899-1969 ई.)
सूर्यकान्त त्रिपाठी का जन्म 1899 ई. में बंगाल के महिषादल राज्य में हुआ। उनका जीवन बड़ा ही दुःखद रहा है। पिता का असामयिक निधन तथा इनकी युवावस्था में 1 ही पत्नी का निधन इनके लिए कष्टपूर्ण रहा। ये काव्य के क्षेत्र में पन्त के साथ आए. इन्होंने 'समन्वय' व 'मतवाला' का सम्पादन कार्य भी किया। निराला जी 1916 से 1958 ई. तक काव्य साधना करते रहे। मानव की पीड़ा परतन्त्रता के प्रति तीव्र आक्रोश उनकी कविताओं में दृष्टिगत होता है तथा अन्याय एवं असमानता के प्रति विद्रोह की भावना उनमें सर्वत्र व्याप्त है। हिन्दी कविता में स्वच्छन्द छन्द रचना का सूत्रपात निराला ने किया था। उनके काव्य की भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली है. जिसमें स्वर-लय की प्रधानता है तथा ओजपूर्णता का गुण विद्यमान है।
'निराला' की प्रमुख रचनाएँ -
निराला की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं
'बादल राग' कविता में निराला जी ने बादल से प्रार्थना की है कि वह भारत के दीनहीन गरीब किसानों की पुकार सुनकर विप्लव मचाने के लिए वहाँ अवश्य पहुँचे। निराला की इन बातों से स्पष्ट है कि वे सामाजिक विषमता को समाप्त कर समता स्थापित करना चाहते थे।
'वनबेला', 'तोड़ती पत्थर', 'भिक्षुक' व 'बादलराग' जैसी कविताओं में निराला ने निम्न जन अथवा सर्वहारा की शक्ति को पहचानने का कार्य किया। निराला जी की 'विधवा', 'भिक्षुक', 'दीन', 'बहू' जैसी कविताएँ समाज के विभिन्न वर्गों के प्रति सच्ची सहानुभूति प्रकट करती हैं।
तोड़ती पत्थर कविता प्रगतिवादी कविता है। इसमें एक महिला मजदूर की दुर्दशा का चित्रण है। वह महिला तपती दोपहर में सड़क के किनारे भारी हथौड़े से पत्थर को तोड़ती है, वहीं दूसरी ओर पूँजीपतियों ने छाया भरे पेड़ों को भी अपने घर की चार दीवारी में कैद कर रखा है। शोषक वर्ग निर्मम है, जो दीनहीन लोगों को छाया भरे अपने घर के पेड़ों के नीचे भी बैठने की सुविधा नहीं देता।
निराला के काव्य में उनके व्यक्तित्व के अनुरूप विभिन्न विरोधी विषयों का समावेश हुआ है। प्रेम और निवेंद, ओज और करुणा, विनय और विद्रोह, स्वच्छन्दता और भक्ति, गम्भीरता और हास्य जैसी परस्पर विरोधी प्रवृत्तियों का समन्वय उनके काव्य में दृष्टिगोचर होता है। यदि विभिन्न वादों की दृष्टि से देखा जाए, तो छायावाद, रहस्यवाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद आदि सभी की उपलब्धि उनके काव्य में हो जाएगी। निराला जी की रचनाएँ इस प्रकार हैं- अनामिका (1923 ई.), परिमल (1929 ई.), अणिमा (1943 ई.), गीतिका (1936 ई.), तुलसीदास (1938 ई.), राम की शक्ति पूजा (1938 ई.), बेला (1946 ई.), नए पत्ते (1942 ई.), अर्चना (1950 ई.), आराधना (1953 ई.) आदि।
सुमित्रानन्दन पन्त (1900-1977 ई.)
छायावाद की वृहदत्रयी में प्रसाद, निराला के साथ पन्त जी की गणना भी की जाती है। इनका जन्म कौसानी नामक ग्राम में 20 मई, 1900 को हुआ। ये प्रकृति चित्रण के लिए प्रसिद्ध है। इन्होंने अधिकांशतः प्रकृति का आलम्बन रूप में चित्रण किया है। प्रकृति के सुकुमार कवि कहे जाते हैं। उनका पहला काव्य-संग्रह 'वीणा' (1927 ई.) है। 'युगान्त' की रचना वर्ष 1936 में हुई तथा इसी के साथ पन्त जी के काव्य-विकास का एक कालखण्ड समाप्त हो जाता है। युगान्त छायावादी युग के अन्त की घोषणा है। उनकी कविता का स्वरूप एवं स्वर समय के साथ बदलता रहा है। उनके काव्य को आलोचकों ने निम्नलिखित चरणों में बाँटा है
- छायावादी काव्य
- प्रगतिवादी काव्य
- अन्तश्चेतनावादी काव्य (अरविन्द दर्शन का प्रभाव)
- नवमानवतावादी काव्य
पन्त जी की प्रथम रचना 'गिरजे का घण्टा' वर्ष 1916 में प्रकाशित हुई। उनकी काव्य यात्रा की शुरुआत इसी रचना से ही हुई। इनके काव्य का प्रथम चरण छायावादी रचनाओं का है।
छायावादी काव्य
पन्त की काव्य रचना का प्रथम चरण छायावादी युग की रचनाओं के रूप में हुआ। इस युग की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं
उच्छवास (1920 ई.), ग्रन्थि (1920 ई.), वीणा (1927 ई.), पल्लव (1926 ई.), गुंजन (1932 ई.) आदि।
पल्लव काव्य का प्रथम चरण पन्त जी के लिए सर्वोत्तम काल था। इस काल की रचनाओं में प्रकृति एवं प्रेम को नए अन्दाज में देखा गया। खड़ी बोली हिन्दी को स्थापित करने की भूमिका का निर्वाह भी इसी काल में हुआ।
'पल्लव' में कवि प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करता है और अध्यात्म की ओर आकृष्ट होता है। पल्लव की भूमिका को 'छायावादी का मेनीफेस्टो' कहा जाता है। 'पल्लव' इनकी छायावादी प्रतिनिधि रचना कही जा सकती है। गुंजन में कवि जग-जीवन के विस्तृत क्षेत्र में पदार्पण करता है, यानी कवि पन्त कल्पना-लोक को छोड़कर यथार्थ की भूमि पर आ जाते हैं और यहीं से उनके काव्य में प्रगतिवाद के आगमन की सूचना मिलती है। 'ज्योत्स्ना' नाट्य शैली में लिखित काव्य रचना है, जिसकी विषय-वस्तु छायावादी है। यह वस्तुतः उनके जीवन-सम्बन्धी विचारों की कुंजी है।
प्रगतिवादी काव्य
पन्त की काव्य रचना का द्वितीय चरण प्रगतिवादी काव्य का युग है। इस काल के अन्तर्गत तीन काव्य संकलन आते हैं- युगान्त (1936 ई.), युगवाणी (1939 ई.) तथा ग्राम्या (1940 ई.)।
युगान्त में धरती के गीत हैं। युगवाणी में कवि का प्रगतिवादी स्वर मुखरित हुआ है। वह मानव जीवन को सुन्दर बनाने का प्रयास करने लगते हैं। ग्राम्या में कवि भारत की आत्मा गाँवों का सजीव चित्र उपस्थित करते हैं।
अन्तश्चेतनावादी काव्य
पन्त जी के काव्य का तीसरा चरण अन्तश्चेतनावादी काव्य का युग है। इस युग की रचनाओं पर अरविन्द दर्शन का प्रभाव है। इस क्रम में अरविन्द दर्शन से प्रभावित उनकी दो प्रमुख रचनाएँ हैं स्वर्ण किरण तथा स्वर्ण धूलि। इन दोनों काव्य संकलनों में अन्तश्चेतनावाद से प्रभावित कविताएँ हैं। अरविन्द दर्शन में भौतिकवाद और अध्यात्मवाद का समन्वय किया गया है।
कवि ने बुद्धिवाद का विरोध किया है और त्याग, तपस्या, संयम, श्रद्धा, विश्वास और ईश्वर की प्रेम भावना को अपनाने पर बल दिया है।
नवमानवतावादी काव्य
पन्त जी के काव्य का चतुर्थ चरण नवमानवतावादी कविताओं का युग है। इस युग की रचनाएँ निम्नलिखित हैं
उत्तरा (1949 ई.), कला और बूढ़ा चाँद (1959 ई.), अतिमा (1955) ई.), लोकायतन (1964 ई.), चिदम्बरा, अभिषेकिता, समाधिका आदि।
पन्त जी को 'चिदम्बरा' के लिए वर्ष 1968 में भारतीय साहित्य का सर्वश्रेष्ठ 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' प्राप्त हुआ। 'कला और बूढा चाँद' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। 'उत्तरा' से लेकर 'अभिषेकिता' तक की उनकी सभी रचनाएँ मानवता को उन्नत बनाने के लिए दिए गए सन्देशों से युक्त हैं। पन्त जी ने विश्वबन्धुत्व एवं लोक कल्याण की भावना पर विशेष बल दिया है।
महादेवी वर्मा (1907-1987 ई.)
महादेवी वर्मा का जन्म 1907 ई. में फर्रुखाबाद के एक कायस्थ परिवार में हुआ था। इनकी माता का नाम श्रीमती हेमरानी व पिता का नाम श्री गोविन्द प्रसाद वर्मा था। इनकी माँ धर्मपरायण थीं। माँ की भक्तिभावना का इनके ऊपर गहरा प्रभाव पड़ा। आरम्भ में इन्होंने ब्रजभाषा में कविताएँ लिखीं हैं। बाद में खड़ी बोली में भी कविताएँ लिखने लगीं। ये कुशल चित्रकार भी थीं, इसलिए इनकी कविताओं में चित्रों जैसी संरचना का आभास मिलता है। इनकी कविताओं में आरम्भ से ही विस्मय, जिज्ञासा, व्यथा और आध्यात्मिकता के भाव मिलते हैं।
महादेवी वर्मा का काव्य
महादेवी की काव्य-यात्रा को पाँच खण्डों में विभाजित करके देखा जा सकता है। उनके संग्रहों के नाम उनकी काव्य-यात्रा को संकेतित करते हैं। पहली रचना नीहार में जीवन के प्रति एक रहस्यमय व्याकुल भाव दृष्टिगत होता है। रश्मि की कविताओं में उस रहस्यमयता का स्पष्टीकरण है। नीरजा अभिव्यक्ति की दृष्टि से उनका सुन्दर काव्य-संग्रह है। अभिव्यक्ति का जो स्तर आरम्भ में मिलता है, वह आगे चलकर और अधिक संवेदनीय बन गया है। सान्ध्यगीत में एक समापन का आग्रह-सा लगता है। इस प्रकार इन चारों पुस्तकों को उन्होंने यामा शीर्षक से प्रकाशित किया है। 'यामा' के लिए महादेवी वर्मा को हिन्दी साहित्य के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
दीपशिखा में कवयित्री ने स्वयं को जीवन के प्रति सम्पूर्ण भाव से समर्पित कर दिया। सारी ललक संवेदना की आकुल विस्मयानुभूति और किसी चिरन्तन के प्रति समर्पण की उत्सुकता अपनी पूर्णता को प्राप्त कर निरपेक्ष-सी हो गई है।
'सान्ध्यगीत' की भूमिका में इन्होंने अपने रहस्यात्मक संवेदन को स्पष्ट शब्दों में व्यक्त किया है। वास्तव में, उनका काव्य संवेदना की अमूर्तता का काव्य है, जिसके सारे प्रतीक अपने आप में मूर्त हैं। इनके गीत भावप्रधान हैं। इनके गीतों में व्यथा, पीड़ा, आशा, अज्ञात प्रिय के प्रति प्रणय निवेदन और साधना की विविध अनुभूतियों के स्वर मुखरित हुए हैं। इन्होंने अनुभूति के विचार से समन्वित करने का प्रयास किया है। अन्य छायावादी कवियों के समान वे भी हृदय और बुद्धि के विरोध का निराकरण कर काव्य में दोनों की अखण्ड स्थिति का समर्थन करती हैं।


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