चन्दबरदाई हिंदी साहित्य के आदिकाल के प्रसिद्ध कवि और पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि थे। उनकी प्रमुख रचना पृथ्वीराज रासो हिंदी का प्रसिद्ध वीरगाथा काव्य है। इस लेख में चन्दबरदाई का जीवन परिचय, उनका साहित्यिक योगदान तथा पृथ्वीराज रासो का संक्षिप्त परिचय सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है। साथ ही रेवा तट सर्ग का सार, भावार्थ और विस्तृत व्याख्या भी दी गई है, जिससे पाठकों को विषय को समझने में आसानी हो सके। यह सामग्री विशेष रूप से UGC NET, SET और हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों, शोधार्थियों तथा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी है। यहाँ आपको परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य और स्पष्ट जानकारी एक ही स्थान पर मिल जाएगी।
चन्दवरदाई का जीवन परिचय
◾जन्म - 1168 ई. (लाहौर, पाकिस्तान)
◾मृत्यु - 1200 ई.
◾आश्रयदाता - पृथ्वीराज चौहान
◾भाषा - पिंगल व ब्रजभाषा
◾प्रमुख रचना -पृथ्वीराज रासो
अन्य महत्वपूर्ण जानकारी -
◾चन्दवरदाई का जन्म लाहौर में सन् 1168 ई. में हुआ था।
◾आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा है कि- "(चंद) हिन्दी के प्रथम महाकवि माने जाते है और इनका 'पृथ्वीराज रासो' हिन्दी का प्रथम महाकाव्य है।"
◾चंदवरदाई का मूल नाम बलिद्य और अन्य नाम पृथ्वीभट्ट था।
◾चंदबरदाई की प्रसिद्धि का कारण उनके द्वारा रचित ढाई हजार पृष्ठों का ग्रंथ 'पृथ्वीराज रासो' है।
◾'पृथ्वीराज रासो' में मूलतः छप्पय छंद का प्रयोग हुआ इसी कारण चंदवरदाई को 'छप्पय का राजा' कहा जाता है।
◾श्यामसुंदर दास और उदयनाथ तिवारी ने इस महाकाव्य को विशालकाय महाकाव्य कहा है।
◾बाबू गुलाबराय ने पृथ्वीराज रासो को 'स्वाभाविक विकासशील महाकाव्य' कहा है।
पृथ्वीराज रासो
पृथ्वीराज रासो इसकी रचना 'चन्दबरदाई' ने की है। इस ग्रन्थ का वर्ण्य-विषय पृथ्वीराज की वीरगाथा का वर्णन करना है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार पृथ्वीराज रासो को हिन्दी का प्रथम महाकाव्य माना जाता है।
चन्दबरदाई पृथ्वीराज का मित्र एवं दरबारी कवि था। पृथ्वीराज रासो के चार संस्करण प्रसिद्ध हैं। सबसे बड़ा संस्करण वह है, जिसका प्रकाशन नागरी प्रचारिणी सभा, 'काशी' से हुआ है। उस संस्करण की हस्तलिखित प्रतियाँ उदयपुर के संग्रहालय में सुरक्षित हैं। चौथा संस्करण सबसे छोटा है, जिसमें केवल 1300 छन्द हैं। इसी कारण इस ग्रन्थ को 'छन्दों का अजायबघर' भी कहा जाता है।
पृथ्वीराज रासो ऐतिहासिक चरित काव्य होने पर भी ऐतिहासिक तथ्यों से रहित है। रासो की प्रामाणिकता तो संदिग्ध है, परन्तु उसका काव्य सौन्दर्य अक्षुण्ण है। इसमें वीर व श्रृंगार रसों का सुन्दर प्रयोग हुआ है।
पृथ्वीराज रासो वीर रस प्रधान ग्रन्थ है। इसके वृहत् संस्करण में 69 सर्ग हैं। यह हिन्दी का प्रथम महाकाव्य है। विजयपाल रासो एवं हम्मीर रासो अपभ्रंश की रचनाएँ हैं। हिन्दी साहित्य के इतिहास में पृथ्वीराज रासो सर्वाधिक विवादित रचना रही है।
पृथ्वीराज रासो के 'रेवा तट' सर्ग का कथानक
'पृथ्वीराज रासो' में 69 समय (सर्ग) हैं। 'रेवा तट' समय पृथ्वीराज रासो का सत्ताइसवाँ समय (सर्ग) है। इसमें दिल्ली के महान् राजा पृथ्वीराज चौहान तथा शहाबुद्दीन गोरी के रेवा तट पर होने वाले संघर्ष का वर्णन है। जब शहाबुद्दीन को अपने गुप्तचरों द्वारा ज्ञात होता है कि पृथ्वीराज चौहान रेवा (नर्मदा) तट के समीप वन आखेट में रत हैं, तो वह अपनी सेना सहित पृथ्वीराज पर आक्रमण कर देता है, परन्तु पृथ्वीराज चौहान शीघ्र ही मोर्चा संभाल लेते हैं और उसकी सेना को छिन्न-भिन्न करके उसे (शहाबुद्दीन) बन्दी बना लेते हैं। अतः स्पष्ट है कि प्रस्तुत सर्ग में युद्ध का वर्णन है, इसलिए कुछ विद्वान् इस अंश के नामकरण 'रेवा तट' पर आपत्ति उठाते हैं, लेकिन इस सर्ग में वर्णित पृथ्वीराज का रेवा तट के समीप किसी वन में आखेटरत होना तथा शहाबुद्दीन के आक्रमण करने पर उत्साह के साथ उस पर पलटवार करना आदि घटनाएँ इस शंका का निराकरण कर देती हैं। 'रेवा तट' सर्ग को कथा इस प्रकार है
पृथ्वीराज चौहान के सेनापति चामण्ड राय द्वारा देवगिरि को जीतने के बाद कवियों ने पृथ्वीराज चौहान की कीर्ति का बखान किया। एक दिन चामण्ड राय ने पृथ्वीराज से कहा कि रेवा (नर्मदा) नदी के तट पर ऐरावत हाथी के समान बहुत से हाथी पाए जाते हैं। अतः आप रेवा तट पर शिकार खेलने चले, तभी पृथ्वीराज चौहान ने कवि चन्द से पूछा कि ये देवताओं के वाहन पृथ्वी पर कैसे आ गए। कवि चन्दबरदाई ने उत्तर दिया कि हे महाराज! हिमालय के पास एक बहुत बड़ा वट वृक्ष था, जोकि सौ योजन तक फैला था।
एक दिन हाथियों ने विचरण करते हुए उस वृक्ष की शाखाएं तोड़ी और ऋषि दीर्घतपा का आश्रम उजाड़ डाला। इस बात से क्रोधित होकर ऋषि ने मदान्ध हाथियों को श्राप दे दिया। इस कारण हाथी तब से गतिविहीन हो गए। तब मनुष्यों ने उन्हें अपनी सवारी बना लिया। कवि चन्द ने आगे बताया कि अंगदेश के एक वन में लोहिताक्ष सरोवर पर उन श्रापित हाथियों का झुण्ड क्रीड़ा करता था।
उसी वन में पालकाव्य ऋषि रहते थे, जिनकी हाथियों से अत्यन्त प्रीति थी। राजा पृथ्वीराज ने पूछा कि हे कविराज! उन ऋषि की हाथियों से इतनी प्रीति का कारण क्या था? कवि ने बताया कि एक बार एक ब्रह्मर्षि को घोर तपस्या में रत देखकर देवराज इन्द्र डर गए और उनकी तपस्या को भंग करने के उद्देश्य से उन्होंने रम्भा (अप्सरा) को ऋषि के पास भेजा। ऋषि ने क्रोधित होकर रम्भा को हथिनी होने का श्राप दे दिया। एक दिन सोते हुए एक मुनि का वीर्यपात हो गया, जिसे उस हथिनी ने खा लिया और पालकाव्य मुनि का जन्म हुआ। पालकाव्य मुनि इसी कारण हाथियों से प्रीति रखते थे।
पालकाव्य ऋषि और वे श्रपित हाथी एक-दूसरे से बड़ी प्रीति रखते थे। एक दिन उस वन में राजा रोमपाद शिकार खेलने आया और हाथियों को पकड़कर चम्पापुरी ले गया। हाथी पालकाव्य से बिछुड़ने के कारण दुर्बल होते चले गए, उनके दीर्घकाय शरीर कृशकाय हो गए फिर पालकाव्य ऋषि वहाँ आए और उनकी काफी सेवा-सुश्रूषा की। कोपल, पराग, पत्ते, छाल, शाखाएँ आदि खिलाकर ऋषि ने उन्हें स्वस्थ कर दिया, जिससे सभी हाथी पुनः हृष्ट-पुष्ट हो गए।
कवि चन्द का हाथियों के विषय में यह वृत्तान्त सुनकर राजा पृथ्वीराज को बड़ा हर्ष हुआ, तभी चामण्ड राय ने पृथ्वीराज से कहा कि हे राजन् ! रेवा तट पर बड़े दाँतों वाले हाथियों के साथ-साथ मार्ग में सिंह भी मिलेंगे। आप उनका भी शिकार कर सकते हैं। चामण्ड राय ने आगे कहा कि वहाँ पहाड़ों और जलाशयों पर कस्तूरी मृग, कबूतर व अन्य पक्षी भी रहते हैं और दक्षिण दिशा का सौन्दर्य तो और भी अवर्णनीय है। यह सुनकर पृथ्वीराज चौहान ने सोचा कि मेरे वहाँ जाने से जयचन्द को तो ईर्ष्या होगी ही, साथ ही स्थान भी रमणीक है। अतः चौहान ने रेवा तट की ओर प्रस्थान कर दिया।
वहाँ के सभी राजाओं ने पृथ्वीराज का स्वागत किया और पृथ्वीराज ने भी वहाँ खूब शिकार का आनन्द लिया। उसी समय लाहौर के शासक चन्द पुण्डीर दाहिम का पत्र मिला, जिसमें लिखा था कि शहाबुद्दीन गोरी ने चौहान पर आक्रमण करने के लिए एक बड़ी सेना तैयार की है। चन्द पुण्डीर के पत्र को पढ़कर चौहान लाहौर की ओर चल दिए।
पृथ्वीराज ने सभी सामन्तों से मन्त्रणा करके गोरी से युद्ध की घोषणा कर दी। चन्द पुण्डीर ने अपनी सेना को लाहौर में गोरी की सेना को रोकने के लिए सावधान कर दिया। गोरी ने चिनाब नदी को पार किया, जहाँ उसका मुकाबला चन्द पुण्डीर से हुआ। चन्द पुण्डीर ने अपने पाँच वीरों के मरते ही गोरी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया, तभी चौहान के दूतों ने उसे बताया कि तातार मारूफ खाँ (गोरी का प्रधान सेनापति) लाहौर से केवल पाँच कोस की दूरी पर ही है। यह सुनकर पृथ्वीराज चौहान को क्रोध आ गया और पृथ्वीराज ने गोरी की सेना पर आक्रमण कर दिया।
नगाड़ों के बजते ही हाथियों के घण्टे घनघना गए। चौहान की सेना के लोहे के बाणों को देखकर गोरी की सेना घबरा गई। दोनों ओर की सेनाएँ भिड़ गईं। चौहान पक्ष के साथ-साथ गोरी पक्ष के भी अनेक वीर योद्धा मारे गए। रावर सँभरसिह, सोलंकी माधवराय, गरुअ गोइंद, पतंग जयसिह, चन्द पुण्डीर, कूरम्भ, आहुट्ठ, लखन, लोहाना आदि बहुत से वीर मारे गए। चार दिन तक युद्ध निरन्तर चलता रहा। चौथे दिन चौहान के एक योद्धा गुज्जर (रघुवंशी राम) ने गोरी को पकड़ लिया। सुल्तान गोरी को हाथी पर बाँधकर दिल्ली ले गया।
वह एक माह और तीन दिन तक पृथ्वीराज की कैद में रहा। शहाबुद्दीन के अमीरों ने पृथ्वीराज से गोरी को छोड़ने की विनती की और दण्डस्वरूप नौ हजार घोड़े, सात सौ ऐराकी घोड़े, आठ सफेद हाथी, बीस ढली हुई ढालें, गजमुक्ता और अनेक माणिक्य दिए। तत्पश्चात् पृथ्वीराज चौहान ने गोरी से सन्धि कर ली और पहिना ओढ़ाकर उसे उसके घर भेज दिया। यहीं 'रेवा तट' सर्ग की कथा समाप्त हो जाती है।
'रेवा तट' की काव्यगत विशेषताएँ
'रेवा तट' की काव्यगत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं -
भाव पक्ष -
'रेवा तट' का प्रधान विषय पृथ्वीराज और गोरी का युद्ध है। स्पष्टतः इसका प्रधान रस वीर रस है। सर्ग के आरम्भ में चौहान को रेवा तट पर शिकार करने के लिए प्रेरित करते समय कुछ समय के लिए सौन्दर्य प्रधान छन्द मिलते हैं। तत्पश्चात् सम्पूर्ण सर्ग में युद्ध वर्णन, सैनिक व्यूह रचना, युद्ध साज-सज्जा आदि का ही वर्णन मिलता है। अतः कहा जा सकता है कि सम्पूर्ण सर्ग में वीर रस का ही परिपाक हुआ है। चन्द पुण्डीर के दूत द्वारा लाए गए पत्र में गौरी की सेना के प्रति चौहान को सचेत किया गया है, जिसके द्वारा हमें गोरी की विशाल सेना का पता चलता है-
सा सेना चतुरग बंधि उलल, तत्तार मारूफयं।।
तुज्झी सार स उप्परा वस रसी, पल्लानर्य षानयं।
एकं जीव सहाब साहि न नयं, बीयं स्वयं सेनय।।
युद्ध में आमने-सामने डटी सेनाओं का उत्साह और शत्रुओं के प्रति मन में उत्पन्न होने वाले क्रोध का वर्णन करके कवि चन्द ने एक ही छन्द में वीर व रौद्र रस का मानो समागम ही कर दिया है, जोकि अन्य काव्यों में मिलना असम्भव है यथा
रसं भीजि सूरं चवग्गांन षिल्लै।।
लगे सीस नेजा भ्रमैं मेज तथ्यं।
भषै बाइसं भाट दीपत्ति सथ्यं ।।
गोरी की सेना नजदीक आ गई है, यह समाचार सुनकर पृथ्वीराज के क्रोध और ओज का दृश्य अद्भुत बन पड़ा है
तौ नन्दन सोमेस को, फिर बंधौ सुरतांन।।
वीर रस व रौद्र रस की पुष्टि करने वाला यह छन्द दृष्टव्य है
भर तमस तामस सूर बर भरि, रास तामस छंदयौ।।
बर बज्जियं नीसांन धुनि घन, बीर बरनि अकूरयं।
घर धरकि धाइर करषि काइर, रसमि सूरस कूरयं।।
कला पक्ष -
कला पक्ष की दृष्टि से 'रेवा तट' स्पष्ट और प्रभावशाली है। वीर रस से पुष्ट होने के कारण इस सर्ग की भाषा ओजपूर्ण है। कवि ने अपभ्रंश भाषा का प्रयोग करते हुए अरबी, फारसी, तत्सम आदि शब्दों का आवश्यकतानुसार प्रयोग किया है। ओजपूर्ण भाषा का एक उदाहरण यहाँ दृष्टव्य है
अप्प मरै छिज्जै नृपति कौन कारज यह जोई।
कवि चन्दबरदाई ने अपने रासो ग्रन्थ में छन्द योजना के अन्तर्गत छन्दों की बाढ़ ही ला दी है। कवि ने दूहा (दोहा), छप्पय, भुजंगी, साटक, कुण्डलिया, कण्ठ शोभा, मोतीदाम, रसावला आदि प्राचीन छन्दों के प्रयोग से काव्य में विशिष्टता लाने का सफल प्रयास किया है। निम्न उदाहरण हैं
मेच्छ मसरति सत्ति कै, बंच कुरानी बार।।
बर मुसाफ तत्तार षाँ, मस कित्ति तन बांन।
में भंजे लाहौर धर, लेहूँ सुनि सु विहान।
लेहूँ सु निसु विहान, सुनै ढिल्ली सुरतांनं।
लुथ्यि पार पुण्डीर, भीर परिहै चौहांन।
दुचित चित्त जिन करहु, राज आखेट उथापं।
गज्जनेस आयस्स, चले सब छूयं मुसाफं।
लोह अंच उड्डंत, पत्त तरवर जिमि डोलै।।
अनुप्रास अलंकार का भी प्रयोग कहीं-कहीं प्रभावशाली जान पड़ा है
धन रहै धम्म जस जागे है दीप दीपति दिवलोक पति।
बीप्सा अलंकार का यह उदाहरण भी प्रभावपूर्ण है
बह बह कहि रघुबंस रांम हक्कारि स उठ्यौ।
उत्प्रेक्षा अलंकार की तरह ही कवि ने उपमा अलंकार का भी प्रमुखतः प्रयोग किया है
बर बीर धार जुगिद पंतिय, कब्बि ओपम पाइयं।
इस तरह प्रस्तुत सर्ग 'रेवा तट' कला पक्ष की दृष्टि से वैभवपूर्ण है। कवि ने प्रसंगानुकूल विविध छन्दों, रसों, अलंकारों आदि का प्रयोग कर 'पृथ्वीराज रासो' को श्रेष्ठ काव्य बनाने में सफलतम प्रयास किया है।
रेवा तट के प्रमुख पदों की व्याख्याएँ
जय जय जप कीरति सकल, कही कव्विजन गाइ।।
मिलट राज प्रथिराज सों, कही राव चामंड।
रेवातट जो मन करौं, (तौ) वन अपुब्ब गज झुंड।।
सन्दर्भ -
उपर्युक्त दोनों दूहे (दोहे) चन्दबरदाई कृत 'पृथ्वीराज रासो' के सर्ग 'रेवा तट' से लिए गए हैं।
प्रसंग -
यहाँ कवि ने पृथ्वीराज चौहान के सेनापति चामण्ड राय द्वारा देवगिरि को जीतने पर उनकी कीर्ति का गान किया है और चामण्ड राय द्वारा रेवा तट पर शिकार करने के लिए पृथ्वीराज को प्रेरित किया गया है।
व्याख्या - श्रेष्ठ वीर चामण्ड राय जब देवगिरि को जीतकर आया, तो दरबार के सभी कवियों ने राजा पृथ्वीराज के यश का बखान किया। सेनापति चामण्ड राय जब पृथ्वीराज से मिले तो उनसे बोले कि यदि आप रेवा तट जाने की इच्छा करें, तो वहाँ वन में अपूर्व हाथियों के झुण्ड मिलेंगे।
(2)
अँरा पति धरि नाम, दियौ चढ़नै सुरराजं ।।
दानव दल तेहि गंजि रंजि उमया उर अन्दर।
होई क्रपाल हस्तिनी संग बगसी रचि सुन्दर।।
औलादि तासु तन आय कै, रेवा तट वन विछरिय।
सामन्तनाथ सों मिलत इष, दाहिम्मै कथ उच्चरिय।।
सन्दर्भ - पूर्ववत् ।
प्रसंग - यहाँ पर चामण्ड राय ने पृथ्वीराज को हाथियों की उत्पत्ति के विषय में बताया है।
व्याख्या - शंकर ने अपने माथे के पसीने की बूंद से तिलक करके सामान्य गज को गजराज बना दिया (या शंकर ने अपने माथे के पसीने की बूंद से गजराज को उत्पन्न किया) और उसका नाम ऐरावत रखकर देवराज इन्द्र को सवारी करने के लिए दे दिया। उसने राक्षसों का नाश किया और उमा (माता पार्वती) के हृदय को प्रसन्न किया। उन्होंने (उमा ने) कृपा करके उसे (ऐरावत को) एक सुन्दर हथिनी प्रदान की। इन्हीं के मिलन से (शरीर से) उत्पन्न इनकी सन्तानें रेवा तट के पास के वनों में फैल गई। दाहिम (चामण्ड राय) ने पृथ्वीराज से मिलकर इस कथा का वर्णन किया।
च्यारि प्रकार पिष्षि बन वारन।
भद्र मंद म्रग जाति सधारन।।
पुच्छि चंद कवि को नरपत्तिय।
सुर वाहन किम आइ धरत्तिय।।
सन्दर्भ - पूर्ववत्।
प्रसंग - प्रस्तुत पद्यांश में चामण्ड राय पृथ्वीराज को हाथियों की जातियों के विषय में बता रहे हैं।
व्याख्या - चामण्ड राय पृथ्वीराज से कहता है कि हे राजन् ! उस वन में (रेवा तट के पास के वन में) चार प्रकार की जातियों के हाथी देखे जाते हैं भद्र, मन्द, मृग और साधारण, तभी नरपति (राजा) ने चन्द कवि (चन्दबरदाई) से पूछा कि देवताओं का वाहन पृथ्वी पर किस प्रकार आ गया।
(4)
सौ जोजन परिमांन साष तस भंजि मतंगं।।
बहुरि दुरद मद अंध ढाहि मुनिवर आरामं।
दर्घतपा री देषि श्राप दीनो कुपि ताम।।
अंबर विहार गति मंद हुआ नर आरूढ़न संग्रहिय।
संभरि नरिंद कवि चंद कहि सुर गइंद इम भुवि रहिय।।
सन्दर्भ - पूर्ववत्।
प्रसंग - पृथ्वीराज द्वारा यह पूछने पर कि देवताओं का वाहन पृथ्वी पर कैसे आया, तो कवि चन्द राजा के इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं कि
व्याख्या - हे राजन् ! हिमालय पर्वत के निकट एक बड़ा ऊँचा वट (बरगद) का वृक्ष था। वह सौ योजन तक फैला हुआ था। पहले तो इन हाथियों ने उस वृक्ष की शाखाएँ तोड़ी और फिर मद से अन्धे इन द्विरदों (हाथियों) ने दीर्घतपा ऋषि का बगीचा उजाड़ डाला, जिस कारण मुनिवर ने क्रोधित होकर उन्हें श्राप दे दिया। श्राप के कारण उनकी आकाशगामी चाल मन्द हो गई और मनुष्यों ने अपनी सवारी के लिए उनका संग्रह कर लिया। कवि चन्द कहते हैं कि हे संभल के राजा (पृथ्वीराज) इस तरह देवताओं के वाहन (ये हाथी) पृथ्वी पर रह गए।
(5)
फल्लि कली दै जरियं कुंजर करि धूलयं तनं ।।
सन्दर्भ - पूर्ववत्।
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियों में पालकाव्य ऋषि द्वारा हाथियों को खिलाकर उन्हें फिर से हृष्ट-पुष्ट करने का वर्णन है।
व्याख्या - चम्पापुरी के राजा रोमपाद हाथियों को पकड़कर ले गए, जिसके बाद वे पालकाव्य ऋषि के वियोग से दुर्बल हो गए। पालकाव्य ऋषि चम्पापुरी पहुँचे और उन्होंने दुर्बल हाथियों को कोंपलें, पराग, पत्ते, छालें, डालियाँ, फल-फूल, कन्द, फलियाँ, कलियाँ तथा जड़ी-बूटी खिलाकर उनके शरीर को फिर से हृष्ट-पुष्ट बना दिया।
(6)
धर चहुआंनी उप्परै, बज्जा बञ्जन बाइ।।
सन्दर्भ - पूर्ववत्।
प्रसंग - यहाँ चन्द पुण्डीर का दूत लाए गए पत्र का हाल सुना रहा है।
व्याख्या - हे महाराज! गोरी के सेनापति खां तातार मारूफ खाँ ने शाह (गोरी) के हाथ से पान लिया है। चौहानों को उखाड़ फेंकने के लिए वे वायु में बाजे (वाद्य यन्त्र) बजा रहे हैं।
सा सेना चतुरंग बंधि उललं, तत्तार मारूफयं।।
तुज्झी सार स उप्परा बस रसी, पल्लानयं षानयं।
एकं जीव सहाब साहि न नयं, बीयं स्तयं सेनयं।।
सन्दर्भ - पूर्ववत्।
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियों में चन्द पुडीर का दूत गोरी के श्रेष्ठ सेनापति के द्वारा की गई तैयारी का वर्णन कर रहा है।
व्याख्या - चन्द पुण्डीर का दूत आगे कहता है कि हे राजन्। सुनिए, गोरी के श्रेष्ठ सेनापति तातार मारूफ खाँ ने ढोल बजाकर सारी तैयारियाँ कर ली हैं और उसकी सेना चतुरंगिणी बनकर ऊपर झपटने या टूट पड़ने को तैयार है। आपके ऊपर आक्रमण करने की इच्छा से उन्होंने अपने घोड़ों पर जीने कस ली है या आपकी सत्ता को नष्ट करने के लिए खान घोड़े दौड़ा रहे हैं। गोरी की सेना 'एक साहब शाह (गोरी) रहे और कोई न रहे' यह कहकर उसका स्वागत कर रही है।
बर मुसाफ तत्तार षों, मरन कित्ति तन बांन।
में भंजे लाहौर घर, लैहूँ सु निसु विहान।
लैहूँ सु निसु विहान, सुनै ढिल्ली सुरतांनं।
लुथ्यि पार पुंडीर, भीर परिहै चौहान।
दुचित चित्त जिन करिहु, राज आखेट उथापं।
गज्जनेस आयस्स, चले सब छूय मुसाफं।।
सन्दर्भ - पूर्ववत्।
प्रसंग - यह चन्द पुण्डीर के पत्र का अन्तिम अंश है। इसे पढ़ते हुए दूत कहता है कि
व्याख्या - हे राजन्, तातार खाँ ने पवित्र कुरान की शपथ खाकर कहा कि जब रण का वेश धारण ही कर लिया है तो मरने का क्या डर। मैं लाहौर को नष्ट कर एक दिन में दिल्ली पर भी अधिकार कर लूँगा। चन्द पुण्डीर की लोथ (लाश) गिराकर मैं चौहान पर आक्रमण कर दूँगा (या चौहान पर आक्रमण होगा)। आप अपने हृदय में कैसी भी शंका न करें। इस समय राजा शिकार खेलने में लगा हुआ है। गजनी के ईश (गोरी) ने सबको आज्ञा दी और सभी लोग पवित्र कुरान को छूकर निकल गए।
तब कहै जैट पंवार सुनहु प्रिथिराज राजमत।
जुद्ध साहि गोरी नरिन्द लाहौर कोट गत।।
सबै सेन अप्पनौ राज एकट्ठ सु किज्जै।
इष्ट भ्रत्य सगपन सुहित (बीर) कागज लिषि दिज्जै।।
सामंत सामि इह मंत है अरुजु मंत चिंतै नृपति।
धन रहै धम्म जस जोग है, दीप दिपति दिवलोकपति ।।
सन्दर्भ - पूर्ववत् ।
प्रसंग - पृथ्वीराज शहाबुद्दीन के आक्रमण के बारे में सुनकर अपने मन्त्रियों से मन्त्रणा कर रहे हैं।
व्याख्या - तब जैत प्रभार बोले, हे पृथ्वीराज राजमत ऐसा हो कि नरेन्द्र (पृथ्वीराज) को लाहौर के दुर्ग में जाकर शाह गोरी से युद्ध करना चाहिए। अपने राज्य की सम्पूर्ण सेना को इकट्ठा करके अपने इष्टों, भृत्यों, सगो, सुहितों को पत्र लिखना चाहिए। हे सामन्तों के स्वामी! यह राजमत है और जो कुछ आपको अच्छा लगता हो वह कीजिए (या जो आपका मत है, उसके अनुसार कीजिए)। धर्म और यश का योग ही आपका धन होना चाहिए, क्योकि आपका तेज इन्द्र के समान दीप्तिमान है।
वह बह कहि रघुबंस रांम हक्कारि स उठ्यौ।
सुनौ सब्ब सामंत साहि आयें बल छुट्यौ।।
गज रु सिंध सा पुरिष जहीं संधै तहं झुज्ज्ञै।
समौ असमौ जांनहि न लज्ज पंकै आलुज्झै ।।
सामंत मंत जानै नहीं मत्त गहें इक मरन कौ।
सुरतान सेन पहिले बंध्यौं फिर बंध्यौ तौ करन कौ।।
सन्दर्भ - पूर्ववत्।
प्रसंग - प्रस्तुत पद्यांश में पृथ्वीराज अपने सैनिकों को सामन्त के मत के विषय में बता रहे हैं।
व्याख्या - रघुवंशी राम वाह! वाह ! कहता हुआ चिल्लाकर उठा और व्यंग्यपूर्वक बोला, सभी सामन्तों सुनो, शाह (गोरी) के आने से तुम सबका साहस जाता रहा। हाथी तथा शेर की तरह वीर पुरुष अगर कहीं रुँघ जाएँ तो वहीं युद्ध में जूझ पड़ता है। वह समय-असमय का विचार नहीं करता और लज्जा के कीचड़ में नहीं फँसता। सामन्तों का एक ही मत होता है- मरना और इसके अतिरिक्त वे दूसरा नहीं जानते। सुल्तान (गोरी) की सेना को मैंने पहले भी पकड़ लिया था और अबकी बार न पकड़ लूँ तो कर्ण (एक राजपूत सामन्त) का पुत्र न कहलाऊँ।
फिरे हय बष्वर पष्वर से। मनों फिरि इंदुज पंष कसे।
सोइ उपमा कवि चन्द कथे। सजे मनों पोन पवग रथे।।
उर पुट्ठिय सुट्ठिय दिट्ठियता। विपरीत पलंग तताधरिता।
लगै उड़ि छित्तिय चौन लयं। सुने खुर केह अबत्तनयं ।।
अग बंधि सु हेम हमेल घनं। तव चमर जोति पर्वन रुनं।
ग्रह अट्ठ सतारक पीत पगे। मनो सुत के उर भांज उगे।।
पय मंडिहि अंसु धरै उलटा। मनो विट देषि चली कुलटा।
मुष कठिन घूंघट अस्सु बली। मनो घूंघट दै कुल बद्ध चली
तिनं उपमा बरनं न घनं। पुजै नन बग्ग पवंन मनं ।।
सन्दर्भ - पूर्ववत्।
प्रसंग - गोरी से युद्ध की निश्चितता जानकर युद्ध की तैयारियाँ होने लगी। अतः प्रस्तुत पद्यांश में घोड़ों की शोभा का वर्णन किया गया है
व्याख्या - घोड़े अपने बाखर-पाखर (जिरह बख्तर) सहित ऐसे फेरे गए मानो गरुड़ अपने पंखों को समेटकर उड़ रहे हो। कवि चन्द उसकी उपमा करते हुए कहते हैं कि वे (घोड़े) सूर्य के सारथी (प्लवंग) के घोड़ों की तरह सरपट दौड़ते प्रतीत होते हैं। उनकी छाती और पुढे इतने सुन्दर दिखते हैं, मानो पलंग उलटकर रखे हो। जब ये चौकड़ी भरकर पृथ्वी पर चलते हैं, तो उनके सोने के खुर दिखाई पड़ते हैं। उनके आगे सोने की हमेलें बंधी हैं, जो उनके चमकते हुए चंवर (कलगी) के साथ हवा में हिलते हैं, उनकी छाती पर हमेले ऐसे लगते हैं, मानो आठ ग्रह पीली पग बाँधे तारामण्डल सहित चमक रहे हो। घोड़े चलते हुए अपने पैर ऐसे बनाते हैं, जैसे कोई व्याभिचारिणी स्त्री (कुलटा) अपने नायक को देखकर चलती है। घोड़ों के मुख पर पड़ी झालरें ऐसी प्रतीत होती हैं कि मानो घूंघट डालकर कुलवधुएँ चल रही हो। उनकी उपमाओं का वर्णन नहीं किया जा सकता। घोड़ों की सरपट चाल की तुलना कैसे की जाए, यह मन में नहीं आता।
(12)
तहाँ नेज गडयौ ठठुक्के पुण्डीरं।
करी आनि साहाब सा बंधि गोरी।
धके धींग धींगं धकावै सजोरी।।
दोऊ दीन दीनं कढी वंकि अस्सी।
किधी मेघ में बीज कोटिन्निकस्सी ।।
किये सिप्परं कोर ता सेल अग्गी।
किधी बद्दरं कोर नागिन्न नग्गी।।
मनो घेरनी घुम्मि पारेव तुट्टै ।।
हबक्कै जु मेछं भ्रमंतं जु छुट्टै।
उरं फुट्टि बरछी बरं छब्बि नासी।
लटक्कै जुरंनं उड़ हंस हल्लै।
रसं भीजि सूरं चवग्गांन षिल्लै।।
लगे सीस नेजा भ्रमैं भेज तथ्यं।
भषै बाइसं भाप दीपत्ति सथ्यं।।
करें मार मारं महाबीर धीरं।
भये मेघधारा बरष्यंत तीरं ।।
परे पंच पुंडीर सा चंद कढयौ।
तबै साहि गोरीस चिन्हाव चढयौ।।
सन्दर्भ - पूर्ववत्।
प्रसंग - यहाँ शहाबुद्दीन गोरी की सेना का चिनाब नदी को पार करना तथा वहाँ चन्द पुण्डीर के साथ हुए युद्ध का वर्णन है
व्याख्या - शाह गोरी के मीर सेनानायक जैसे ही चिनाब नदी पार करके आए, वहाँ पुण्डीर बरछी गाड़े डटा हुआ था, उसने शाह गोरी को पकड़ कर लाने की अपनी सेना को आज्ञा दी। धक्का-मुक्की करते हुए बलपूर्वक सेना (गोरी की) आगे बढ़ी।
दोनों सेनाओं ने अपने-अपने धर्म का नाम लेकर टेढ़ी तलवारें खीच ली। उनके ऐसा करते ही लगा कि बादलों से करोड़ों बिजलियाँ निकली हों। ढालों को छेदकर तलवारों की नोके आगे निकल गईं, जैसे बादलों में पर्वतों की अनगिनत चोटियाँ घुस गई हो।
म्लेछों (गोरी की सेना) ने उत्साह से पुण्डीर की सेना पर ऐसे घेरा डाला, मानो घेरनी पक्षी किसी कबूतर को घेरकर उस पर झपटा हो। छातियों को फोड़कर बरछी उनकी शोभा को नष्ट करती हुई इस प्रकार निकल आई, जैसे जाल से निकली हुई कोई आधी मछली हो। जिस प्रकार एक-दूसरे से मिले हुए हंस आदि पक्षी शोर मचाकर आगे की ओर बढ़ते हैं, उसी प्रकार क्रोध में डूबे (रौद्र रस में डूबे) शूरवीर चौगान खेलते हुए प्रतीत हो रहे हैं। सर में बरछी लगते ही, वहीं पर भेजा निकल पड़ता है, जिसे कौए प्रसन्नता के साथ भात के समान खा रहे हैं।
महावीर धैर्यशाली योद्धा मारो मारो (का स्वर) कर रहे हैं। तीरों की वर्षा (युद्ध भूमि में) की झड़ी लगी हुई है, तभी चन्द पुण्डीर के पाँच वीरों के गिरते (मरते) ही पुण्डीर युद्ध करना छोड़ देता है और शाह गोरी चिनाब नदी के तट से आगे बढ़ जाता है।
बर मंगल पंचमी दिन सु दीनौ प्रिथिराजं।
राह केतु जप दीन दुष्ट टारे सुभ काजं ।।
अष्ट चक्र जोगिनी भोग भरनी सुधिरारी।
गुरु पंचमि रवि पंचम अष्ट मंगल नृप भारी।।
कैइन्द्र बुद्ध भारथ्य भल कर त्रिशूल चक्राबलिय।
सुभ घरिय राज बर लीन बर चढ्यौ उदै क्रूरह बलिय।।
सन्दर्भ - पूर्ववत् ।
प्रसंग - प्रस्तुत छन्द कवि के ज्योतिष विद्या के ज्ञान को स्पष्ट करता है। यहाँ बताया गया है कि युद्ध की निश्चितता जानकर पृथ्वीराज चौहान ने शुभ मुहूर्त में गोरी पर चढ़ाई करने का आदेश दिया।
व्याख्या - मंगलवार की पंचमी तिथि को पृथ्वीराज ने गोरी पर चढ़ाई करने की आज्ञा दी। पृथ्वीराज ने दुष्ट फल से बचने के लिए राहु-केतु का जप कराया। इस तिथि को शुभफल देने वाली अष्टचक्र योगिनी तथा हनन कार्य के लिए शुभ भरणी नक्षत्र युद्ध में शुभ फल प्रदान करने वाले थे। पाँचवे स्थान में शुभ फल देने वाले गुरु तथा सूर्य थे तथा आठवे स्थान में उपस्थित मंगल राजा पर भारी था, जोकि जप के बाद शुभ फल देने वाला था। युद्ध हितकारी बुध मध्य स्थान में थे, जोकि जिनके हाथ में त्रिशूल चिन्ह और मणि बन्ध में चक्र था, उनके लिए शुभ थे। ऐसी शुभ घड़ी का लाभउठाकर क्रूर और बलवान ग्रह, सूर्य या मंगल के उदय होने पर महाराज पृथ्वीराज ने चढ़ाई कर दी।
भय प्रात रत्तिय जु रत्त दीसय, चंद मंदय चंदयौ।
भर तमस तामस सूर बर भरि, रास तामस छंदयौ।।
बर बज्जियं नीसांन धुनि घन, बीर बरनि अकूरयं।
घर धरकि धाइर करषि काइर, रसमि सूरस कूरयं।।
गज घंट घन किय रुद्र भनकिय, षनकि संकर उद्दयौ।
रन नंकि भेरिय कन्ह हेरिय, दंति दांन धनं दयौ।।
सुनि वीर सद्दइ सबद पठ्ठइ, सद्द सद्दइ छंडयौ।
सत्राह सूरज सज्जि घाटं, चंद ओपम राजई।
तिह ठौर अदभुत होत त्रप दल, बंधि दुज्जन षंडयौ।।
(कै। मुकुर में प्रतिब्यंब राजय, (कै) सत्त धन ससि साजई।।
बर बीर धार जुगिंद पंतिय, कब्बि ओपम पाइयं।
तजि मोहमाया छोह कल बर, धार तिथ्यह धाइयं ।।
बर फल्लि बंबर टोप औपत, रीस सीसत आइये।
नष्षित्र हस्त कि भांन चंपक, कमल सूरहि साइये।।
संसार संकर बंधि गज जिमि, अप्प बंधन हथ्ययं।
उनमत्त गज जिमि नंषि दीनी, मोहमाया सथ्थ्य।।
सो प्रबल महजुग बंधि जोगी, मूनि आरम देवयो।
सामंत धनि जिति षित्ति कीनी, पत्त तरु जिमि भेवयो।
सन्दर्भ - पूर्ववत्।
प्रसंग - प्रस्तुत पद्यांश में युद्ध के मैदान का दृश्य वर्णित किया गया है
व्याख्या - जैसे ही प्रातःकाल हुआ और रात रक्तमय (उषा काल) दिखने लगी अर्थात् धीरे-धीरे रात का समय खत्म होने लगा तो तामसिक वृत्ति वाले योद्धा क्रोध से भर गए। नगाड़ों के बजने की ध्वनि सुनते ही वीरों में वीर रस का संचार हो गया। पृथ्वी काँपने लगी और करखा (चारणों द्वारा) गाते ही कायरो की दृष्टि भी वीर व रौद्र रस से परिपूर्ण हो गई। हाथियो के घण्टे बजने लगे और उनकी जंजीरे खनखनाने लगीं। युद्ध के नगाड़े बज उठे जैसे ही कन्ह (पृथ्वीराज के चाचा) धन व हाथियों का दान करने लगे। नगाड़ों का शोर सुनते ही वीरो ने गरजना और ब्राह्मणों ने मन्त्रोच्चार करना प्रारम्भ कर दिया।
राजा पृथ्वीराज की सेना उस स्थान पर दुर्जनों का नाश करने के लिए अद्भुत रूप से सुसज्जित होने लगी। वीरों के कवच इस तरह चमक रहे थे, जिस प्रकार सूरज के निकलते ही घाट सुशोभित होते हैं। कवि चन्द को ऐसी उपमा सुन्दर लगी। वीरों के शिरस्त्राणों पर लगे हुए उड़ते तुरें उनके सिर पर इस प्रकार गिरते थे, मानो सूर्य के हस्त नक्षत्र में स्थित होने से चम्पा व कमल के फूल बिखरे हों। वीरों की पंक्तियाँ योगियों की पंक्तियों के समान दिखाई पड़ती थी। कवि को ऐसी उपमा जान पड़ी कि मानो वे योगी (योद्धा) माया मोह को त्यागकर तलवार की धार रूपी तीर्थ पर जा रहे हो। संसार की श्रृंखलाओं में स्वयं को हाथी की तरह जंजीरों से बंधा पाकर अपनी प्रबल तपस्या से मोह रूपी जंजीरों को तोड़कर, जिस पर योगी देवतुल्य आनन्द को प्राप्त करता है। उसी तरह सामन्तों का स्वामी अर्थात् वीर राजा वृक्ष के पत्तों के समान पृथ्वी को कुचलकर विजय प्राप्त करता है।
गहि गोरी सुरतान, षान हुस्सेन उपारयौ।
षां ततार निसुरत्ति, साहि झोरी कारि डारयौ।।
चामर छत्र रषत्त, बषत लुट्टे सुलतानी।
जै जै जै चहुआन, बजी रन जुग जुग बानी।।
गजि बंधि बंधि सुरतांन कों, गय ढिल्ली ढिल्ली नृपति।
नर नाग देव अस्तुति करें, दीपति दीप दिवलोक पति।।
सन्दर्भ - पूर्ववत्।
प्रसंग - प्रस्तुत पद्यांश में गौरी को पकड़ने तथा उसके शेष वीरों को मारने पकड़ने का वर्णन है-
व्याख्या - सुल्तान गोरी को पकड़ लिया गया, हुसैन खान को मार दिया गया तथा तातार खाँ को झोली बनाकर बाँध लिया गया। सुल्तान का चंवर, छत्र और डेरा-डण्डा सब लूट गया। पृथ्वीराज चौहान की रणभूमि में जगह-जगह पर जय-जयकार होने लगी। सुल्तान (गोरी) को पृथ्वीराज हाथी पर बाँधकर दिल्ली ले गए। नर, नाग और देवताओं ने स्तुति की कि महाराज का तेज पृथ्वी पर इन्द्र के समान बना रहे।
पृथ्वीराज रासो के चार संस्करण प्रसिद्ध है-
प्रथम संस्करणः
इस संस्करण का प्रकाशन नागरी प्रचारिणी सभा काशी से हुआ था। इसकी हस्तलिखित प्रतियाँ उदयपुर के संग्रहालय में सुरक्षित हैं। इस संस्करण में 69 समय (सर्ग) तथा 16306 छंद हैं। इसका प्रकाशन 1585 ई. में लिखित प्रति के आधार किया गया था।
द्वितीय संस्करणः
इस संस्करण का प्रकाशन नहीं हुआ है किंतु अबोहर और बीकानेर में इसकी प्रतियां सुरक्षित हैं जो 17 वीं शताब्दी में लिखित हैं। यह संस्करण 7000 छंदों वाला है।
तृतीय संस्करणः
यह लघु संस्करण है जिसमें 3500 छंद और मात्र 19 समय (सर्ग) है। इस संस्करण की हस्तलिखित प्रतियाँ भी बीकानेर में सुरक्षित हैं।
चतुर्थ संस्करणः
यह संस्करण सबसे छोटा है जिसमें मात्र 1300 छंद हैं। इसी को डॉ. दशरथ शर्मा आदि कुछ विद्वान मूल रासो मानते हैं।
पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता को लेकर भी विद्वानों मत
पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता को लेकर भी विद्वानों में मतैक्य नहीं है।
अप्रमाणिक मानने वाले विद्वान-आचार्य रामचंद्र शुक्ल, डॉ. रामकुमार वर्मा, कविराजा श्यामदास, गौरीशंकर हीराचंद ओझा, डॉ. बूलर, मुंशी देवी प्रसाद आदि ने रासो को सर्वथा अप्रमाणिक माना है।
प्रमाणिक मानने वाले विद्वान-मिश्रबंधु, कर्नल टॉड, डॉ. श्यामसुंदर दास, मोहन लाल विष्णुलाल पंड्या आदि ने नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, द्वारा प्रकाशित ग्रंथ को प्रामाणिक माना है।
अर्द्धप्रमाणिक मानने वाले विद्वान - डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी, दशरथ ओझा, मुनी जिनविजय ने यह माना है कि पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि चन्दवरदाई ने ही 'पृथ्वीराज रासो' लिखा था, किंतु उसका मूल रूप आजकल उपलब्ध नहीं हैं।
डॉ. बूलर ने सर्वप्रथम कश्मीरी कवि जयानक की रचना 'पृथ्वीराज विजय' के आधार पर सन् 1875 ई. में 'पृथ्वीराज रासो को अप्रमाणिक ग्रंथ घोषित किया था।
डॉ. बच्चन सिंह का कहना है कि "यह (पृथ्वीराज रासो) एक राजनीतिक महाकाव्य है, दूसरे शब्दों में राजनीति की महाकाव्यात्मक त्रासदी है।'
रेवा तट (पृथ्वीराज रासो) से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य
पृथ्वीराज रासो में 68 छंद और 69 समय है जिसका 27 वां समय रेवा तट है।
इस समय में पृथ्वीराज रासो के रेवा तट (नर्मदा नदी) के समीप वन में शिकार खेलने जाने तथा वहां शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी से युद्ध का विस्तृत वर्णन है।
रेवा तट पर युद्ध में पृथ्वीराज की विजय होती है फलस्वरुप मोहम्मद गोरी को बंदी बना लिया जाता है।
चंदरवदाई ने 'पृथ्वीराज रासो' महाकाव्य में मूलतः वीर और श्रृंगार रस का प्रयोग किया है किंतु अन्य रसों यथा-रौद्र, भयानक आदि की भी अभिव्यंजना की गयी हैं।
रेवा तट में पद्मावती के विवाह का भी प्रसंग आया है।
रंभा तथा मेनका (अप्सराएँ) के मध्य संवाद का भी उल्लेख है।
पृथ्वीराज रासो के संदर्भ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के कथन :-
- चंदबरदाई हिंदी के प्रथम महाकवि माने जाते हैं और इनका पृथ्वीराज रासो हिंदी का प्रथम महाकाव्य है।
- यह ग्रंथ ना तो भाषा के इतिहास के और ना साहित्य के इतिहास के जिज्ञासुओं के काम का है यह पूरा ग्रंथ वास्तव में जाली है।
- भाषा की कसौटी पर यदि ग्रंथ को कसते हैं तो और भी निराश होना पड़ता है क्योंकि वह बिल्कुल बेठिकाने हैं उसमें व्याकरण आदि की कोई व्यवस्था नहीं है।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी :- पृथ्वीराज रासो को शुक शुकी संवाद के रूप में रचित माना है।
बच्चन सिंह के अनुसार :- यह एक राजनीतिक महाकाव्य है दूसरे शब्दों में यदि कहें तो राजनीति की महाकाव्यत्मक त्रासदी है।
डॉ. नगेंद्र ने पृथ्वीराज रासो को 'घटना कोश' कहकर पुकारा है।
पृथ्वीराज रासो को चंदबरदाई के पुत्र जल्हड़ ने पूरा किया ऐसा माना जाता है।
'रेवा तट' के प्रामाणिकता के संबंध में विद्वानों के मत-
- प्रामाणिक:- श्याम सुंदर दास, मिश्रबंधु, पंड्या और टॉड ।
- अर्द्ध प्रामाणिक :- मुनिजन विजय, हजारी प्रसाद द्विवेदी।
- अप्रामाणिक :- आचार्य रामचंद्र शुक्ल, बुलहर, मुरारदीन।
पृथ्वीराज रासो में प्रायः सभी महत्वपूर्ण अलंकार यथा-अनुप्रास, यमक, रूपक, वक्रोक्ति, लेष, उपमा, उत्पेक्षा, अतिशयोक्ति, भ्रांतिमान, मानवीकरण, विभावनादि का सुंदर व सहज प्रयोग हुआ है।
'रेवा तट' समय में उल्लिखित स्थान -
- कनवज्ज (कन्नौज)
- गजनी (अफगानिस्तान में)
- ढिल्ली (दिल्ली)
- देवगिरि
- लाहौर
रेवा तट में प्रयुक्त छंद -
- दूहा
- छंद कंठशोभा
- कवित्त
- अरिल्ल
- भुजंगी
- छंद दंडमाली
- गाथा
- छंद मोतीदाम
- साटक
- छंद रसवाला
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: चन्दबरदाई कौन थे?
उत्तर: चन्दबरदाई हिंदी साहित्य के आदिकाल के प्रसिद्ध कवि थे। वे पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि और मित्र थे। उनकी प्रसिद्ध रचना पृथ्वीराज रासो है, जिसे हिंदी का प्रथम महाकाव्य माना जाता है।
प्रश्न 2: पृथ्वीराज रासो क्या है?
उत्तर: पृथ्वीराज रासो चन्दबरदाई द्वारा रचित एक वीरगाथा काव्य है, जिसमें पृथ्वीराज चौहान के जीवन, युद्धों और वीरता का वर्णन किया गया है।
प्रश्न 3: रेवा तट सर्ग किस ग्रंथ से लिया गया है?
उत्तर: रेवा तट सर्ग चन्दबरदाई द्वारा रचित पृथ्वीराज रासो का एक महत्वपूर्ण सर्ग है, जिसमें नदी तट से संबंधित प्रसंग का वर्णन किया गया है।
प्रश्न 4: चन्दबरदाई की प्रमुख रचना कौन-सी है?
उत्तर: चन्दबरदाई की प्रमुख और प्रसिद्ध रचना पृथ्वीराज रासो है।
प्रश्न 5: पृथ्वीराज रासो की भाषा क्या है?
उत्तर: पृथ्वीराज रासो की भाषा ब्रजभाषा, अपभ्रंश और राजस्थानी के मिश्रण से बनी है।
प्रश्न 6: चन्दबरदाई किस काल के कवि थे?
उत्तर: चन्दबरदाई हिंदी साहित्य के आदिकाल (वीरगाथा काल) के प्रमुख कवि थे।


0 टिप्पणियाँ