भारतेन्दु युग के काव्य के विकास का दूसरा चरण द्विवेदी युग से आरम्भ हुआ। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के नाम पर इस युग का नाम 'द्विवेदी युग' पड़ा। इस युग की समय-सीमा सन् 1900 से 1920 तक मानी जाती है। डॉ. नगेन्द्र ने इस युग को 'जागरण सुधार काल' भी कहा है।
महावीरप्रसाद द्विवेदी और उनका युग
द्विवेदी युग (Dwivedi Yug) के प्रवर्तक कवि महावीरप्रसाद द्विवेदी का जन्म 1864 ई. में रायबरेली के दौलतपुर नामक ग्राम में हुआ। वर्ष 1903 में ये 'सरस्वती' पत्रिका के सम्पादक बने तथा वर्ष 1920 तक
इस पत्रिका के सम्पादक बने रहे।
गद्य लेखन के क्षेत्र में भी इन्होंने
विशेष सफलता प्राप्त की। इनके लिखे हुए व अनूदित गद्य-पद्य ग्रन्थों की संख्या लगभग 80 है। यह आधुनिक काल में हिन्दी गद्य व पद्य भाषा के परिमार्जक थे। काव्य भाषा के रूप में इन्होंने खड़ी बोली को अपनाया।
हजारी प्रसाद द्विवेदी की रचनाएं
द्विवेदी जी की रचनाएँ निम्नलिखित हैं:
🔷अबला विलाप
🔷कुमारसम्भवसार (अनूदित)
🔷सुमन
🔷गंगालहरी
🔷कान्यकुब्ज
🔷ऋतुतरंगिणी
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| चित्र: द्विवेदी युग (1900-1920) के विकास के प्रमुख चरण और साहित्यिक विशेषताएँ। साभार: |
महावीर प्रसाद द्विवेदी का साहित्यिक योगदान
द्विवेदी युग में गद्य और पद्य दोनों प्रकार की रचनाएँ रची गईं, दोनों की भाषा के रूप में खड़ी बोली का विकास हुआ। महावीरप्रसाद द्विवेदी ने भाषा के प्रति समन्वयकारी दृष्टि अपनाई, जिससे खड़ी बोली समृद्ध हो पाई। आचार्य द्विवेदी ने साहित्य के प्रति साहित्यकारों की नैतिक जवाबदेही को स्वीकार किया। उनका नैतिकतावादी उपयोगितावादी दृष्टिकोण इस युग के कवियों का स्वर बन गया। एक ओर महावीरप्रसाद द्विवेदी ने साहित्य के उद्देश्य एवं व्यापकता को निर्धारित किया, तो दूसरी ओर उसकी भाषा एवं उसके स्वरूप को भी। उन्होंने आगरा सम्मेलन में साहित्यकारों को सम्बोधित करते हुए कहा कि
"जो अपने आप को ब्रज क्षेत्र का मानते हों वे ब्रज भाषा का प्रयोग कर सकते हैं, परन्तु जो अपना जुड़ाव अखण्ड भारत से मानते हों उनकी भाषा निश्चिततः खड़ी बोली होनी चाहिए।"
उन्होंने श्रृंगार, रीति निरूपण और काव्य के दरबारी सरोकारों को भी आड़े हाथों लेते हुए कविता के व्यापक फलक की चर्चा की और इसमें किसी भी विषय को स्थान दिया जा सकता है, इस ओर इशारा किया। काव्य विशेष के रूप में व्यापकता को चर्चित करते हुए उन्होंने कहा कि
"चींटी से लेकर हाथी पर्यन्त जीव, रंक से लेकर राजा पर्यन्त मनुष्य, बिन्दु से लेकर सिन्धु पर्यन्त जल, अनन्त आकाश अनन्त पृथ्वी, अनन्त पर्वत सभी काव्य के विषय हो सकते हैं।"
द्विवेदी जी की मान्यता साहित्यिक सोद्देश्यता को प्रभावित करते हुए मैथिलीशरण गुप्त ने साहित्य को मनोरंजन, ही नहीं, बल्कि मानव जीवन के उद्देश्यों से जोड़ने की कोशिश की।
"केवल मनोरंजन ही नहीं कवि का कर्म होना चाहिए बल्कि उसमें उचित
उपदेश का भी मर्म होना चाहिए"
इस प्रकार महावीरप्रसाद द्विवेदी का
हिन्दी साहित्य में योगदान एक सृजक के रूप में उतना नहीं है, जितना एक विचारक, दिशा निर्देशक, चिन्तक तथा नियामक के
रूप में है। उनकी विचारधारा और आदर्शों को आगे बढ़ाते हुए इस युग के कवियों
ने नवीन काव्यधारा का आरम्भ किया तथा खड़ी बोली को प्रतिष्ठित किया। भाषा को परिष्कृत एवं संस्कारित करने के लिए द्विवेदी जी का
कार्य सदैव अविस्मरणीय है।
हिन्दी नवजागरण और सरस्वती
हिन्दी नवजागरण से तात्पर्य सन् 1857 के प्रथम संग्राम के बाद भारत के हिन्दी प्रदेशों में आए राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक जागरण से है। हिन्दी नवजागरण की सबसे प्रमुख विशेषता हिन्दी प्रदेश की जनता में स्वातन्त्र्य चेतना का जागृत होना है।
हिंदी नवजागरण के चरण -
◾पहला चरण सन् 1857 का विद्रोह
◾दूसरा चरण भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से प्रारंभ
◾तीसरा चरण महावीरप्रसाद द्विवेदी से प्रारंभ
हिन्दी नवजागरण में द्विवेदी जी की
महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।
भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन को गति व
दिशा देने में भी उनका विशेष योगदान उल्लेखनीय रहा।
सरस्वती पत्रिका का इतिहास और योगदान
'सरस्वती' पत्रिका हिन्दी साहित्य की प्रसिद्ध तथा प्रतिनिधि पत्रिका थी। इस पत्रिका का प्रकाशन वर्ष 1900
में आरम्भ हुआ। वर्ष 1903 में
'महावीर प्रसाद द्विवेदी'
इसके सम्पादक बने तथा वर्ष 1920 तक
लगातार सत्रह वर्षों तक इसका सम्पादन करते रहे। द्विवेदी जी ने इस
पत्रिका में ऐसे लेखों को प्रकाशित किया,
जिन्होंने नवजागरण की लहर को प्रसारित
करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
डॉ. रामविलास शर्मा ने
अपनी पुस्तक 'आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण' में 'सरस्वती' पत्रिका से उद्धरण
देकर इस बात को पुष्ट किया है।
आचार्य द्विवेदी से प्रेरणा लेकर तथा उनके आदर्शों को आगे बढ़ाने वाले अनेक कवि सामने आए, जिनमें मैथिलीशरण गुप्त, गोपालशरण सिंह, गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' और लोचनप्रसाद पाण्डेय प्रमुख हैं। द्विवेदी जी से प्रेरणा प्राप्त करके मैथिलीशरण 'गुप्त' जी ने 'साकेत' महाकाव्य की रचना की। साथ ही बहुत सारे कवि जो पहले ब्रजभाषा में कविता लिख रहे थे वे द्विवेदी जी तथा 'सरस्वती' पत्रिका से प्रेरित होकर नए विषयों पर खड़ी बोली में कविता करने लगे। इन कवियों में अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध, श्रीधर पाठक, नाथूराम शर्मा 'शंकर' तथा राय देवी प्रसाद 'पूर्ण' प्रमुख हैं। इन सभी कवियों की कविताएँ नवजागरण, राष्ट्रीयता, स्वदेशानुराग तथा स्वदेशी भावना से पूर्ण थी। द्विवेदी जी ने इस पत्रिका के द्वारा एक ओर तो भाषा के स्तर पर हिन्दी गद्य का संस्कार, परिष्कार एवं परिमार्जन किया तथा दूसरी ओर प्रेरक बनकर साहित्यकारों के मार्गदर्शन का कार्यभार सँभाला। इन्होंने साहित्यिक और राष्ट्रीय चेतना को स्वर प्रदान किया तथा इस पत्रिका के माध्यम से ज्ञानवर्धन करने के साथ-साथ नए साहित्यकारों को भाषा का महत्त्व भी समझाया तथा गद्य-पद्य के लिए राह निर्मित की।
इस पत्रिका ने जनता तक नवजागरण का सन्देश पहुँचाने का कार्य किया। खड़ी बोली को परिमार्जित, संस्कारित तथा व्याकरणिक शुद्धता प्रदान करने में 'सरस्वती' पत्रिका का योगदान अविस्मरणीय है। अतः 'सरस्वती' पत्रिका ने भाषा और साहित्य दोनों ही क्षेत्रों में परिष्कार किया। इसके माध्यम से ज्ञान का प्रचार-प्रसार हुआ, नए कवि तथा लेखक प्रकाश में आए, भाषा का संस्कार हुआ, समाज सुधार, देशप्रेम, चरित्र निर्माण आदि भावनाओं का विकास हुआ। देशभक्ति और राष्ट्रीय चेतना को विकसित करने में 'सरस्वती' पत्रिका का विशेष योगदान रहा। अतः नवजागरण परक चेतना को आगे बढ़ाने तथा जनमानस तक पहुँचाने में 'सरस्वती' पत्रिका ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
द्विवेदी युग की विशेषताएं (Characteristics of Dwivedi Yug)
द्विवेदी युगीन काव्य की प्रवृत्तियाँ निम्न हैं:-
1. देशप्रेम की भावना:
द्विवेदीयुगीन कवियों ने जनमानस के बीच राष्ट्रप्रेम की लहर चलाई। स्वतन्त्रता के प्रति जनमानस में चेतना का संचार किया। इस युग के रचनाकारों का राष्ट्रप्रेम भारतेन्दु युग की भाँति सामयिक रुदन से नहीं जुड़ा है, बल्कि समस्याओं के कारणों पर विचार करने के साथ-साथ उनके लिए समाधान ढूँढने तक जुड़ा है।
आओ मिलकर विचारें ये समस्याएँ सभी।।"
यह युग कारणों की जड़ तक जाने के पश्चात् उत्सर्ग और बलिदान के माध्यम से अपनी खोई हुई अस्मिता को प्राप्त करने के लिए प्रेरणा का माध्यम भी रहा है।
प्राणों का बलिदान देश की वेदी पर करना होगा।।"
गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' की कविताओं में भी देशभक्ति की लहर दिखाई देती है। उदाहरण से स्पष्ट है:
वह नर नहीं नर पशु निरा है और मृतक समान है।।"
मैथिलीशरण गुप्त की रचना 'भारत भारती' में भी राष्ट्रप्रेम से सम्बन्धित कविताओं के लिखने के कारण अंग्रेजी सरकार ने इनकी इस कृति को जब्त कर लिया।
2. सामाजिक समस्याओं का चित्रण:
यह युग सुधारवादी युग भी कहलाता है। इस युग के कवियों ने सामाजिक समस्याओं; यथा-दहेज प्रथा, नारी उत्पीड़न, छुआछूत, बाल विवाह आदि को अपनी कविता का विषय बनाया। प्रतापनारायण मिश्र नारी के वैधव्य जीवन और बाल विधवाओं की तरुण अवस्थाओं को देखकर रो पड़ते हैं:
"कौन करेजा नहीं कसकत, सुनी विपत्ति बाल विधवन की।"
नारी की दयनीय दशा का चित्रण मैथिलीशरण गुप्त जी करते हुए कहते हैं कि:
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।।"
इस काव्य धारा ने उपेक्षित नारियों को अपने काव्य में स्थान दिया। 'यशोधरा' के माध्यम से गौतम बुद्ध की पत्नी का, 'साकेत' के माध्यम से उर्मिला का, 'विष्णुप्रिया' के माध्यम से चैतन्य महाप्रभु की पत्नी का उत्सर्ग भाग योजित किया है।
प्रियतम के प्राणों को पल में स्वयं सुसज्जित करके।
भेज देती रण में, छत्र धर्म के नाते
सखी वे मुझको कहकर जाते।।"
अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' ने 'वैदेही वनवास' और 'प्रियप्रवास' के माध्यम से नारी उपेक्षाओं को उठाने की कोशिश की है।
3. नैतिकता एवं आदर्शवाद:
द्विवेदीयुगीन काव्य आदर्शवादी एवं नीतिपरक है। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी नैतिकता एवं आदर्श के प्रबल पक्षधर थे। रीतिकालीन श्रृंगारिकता यहाँ दिखाई नहीं पड़ती। 'हरिऔध' कृत 'प्रियप्रवास', मैथिलीशरण कृत 'साकेत', 'रंग में भंग', 'जयद्रथ वध' व रामनरेश त्रिपाठी कृत 'मिलन' आदर्शवादी कृतियाँ हैं। रीतिकाल में राधा-कृष्ण श्रृंगार के आलम्बन हैं, जबकि द्विवेदी युग में राधा लोक सेविका व समाज से सरोकार रखने वाली नारी सिद्ध होती है।
4. इतिवृत्तात्मकता:
इतिवृत्तात्मकता का अर्थ है वस्तु वर्णन या आख्यान की प्रधानता। आदर्शवाद तथा बौद्धिकता की प्रधानता के कारण द्विवेदी युग के कवियों ने वर्णन प्रधान इतिवृत्तात्मकता को अपनाया। इतिवृत्तात्मकता के कारण इस युग में इतिवृत्त (कथा) पर अधिक बल दिया जाने लगा और प्रबन्धात्मक रचनाएँ अधिक लिखी जाने लगीं। मैथिलीशरण गुप्त की रचनाएँ- 'साकेत', 'जयद्रथवध', 'पंचवटी', 'यशोधरा', द्वापर आदि प्रबन्धकाव्य हैं। इसी प्रकार अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की रचनाओं 'प्रिय प्रवास' तथा 'वैदेही वनवास' में इतिवृत्तात्मकता की प्रधानता है।
5. सभी काव्य रूपों का प्रयोग:
द्विवेदी युग में लगभग सभी काव्य रूपों का प्रयोग हुआ। प्रबन्ध, मुक्तक, प्रगीत प्रभृति सभी काव्यरूपों में रचना हुई। हिन्दी के अनेक श्रेष्ठ खण्डकाव्य इसी युग में लिखे गए। द्विवेदी युग में सभी कवि मुक्तक रचना की ओर प्रवृत्त हुए। छोटे-छोटे विषयों को लेकर स्वतन्त्र पद्यों की रचना हुई। जयशंकर प्रसाद तथा 'हरिऔध' ने समस्या पूर्तियों के रूप में भी अनेक सुन्दर मुक्तक लिखे हैं। रत्नाकर ने 'उद्धवशतक' की रचना की। छायावाद में जो प्रगीतों का प्रणयन हुआ उसकी शुरुआत इसी युग से हुई।
6. भाषा परिवर्तन:
इस युग में काव्य की मुख्य भाषा खड़ी बोली रही। इस युग के कवियों ने खड़ी बोली में काव्योपयुक्तता के सन्देह को दूर कर दिया। 'जयद्रथ वध' की प्रसिद्धि ने ब्रज भाषा के मोह का वध कर दिया। 'भारत भारती' की लोकप्रियता खड़ी बोली की विजय भारती सिद्ध हुई। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस युग की भाषा सुबोध, शुद्ध व रसानुरूप है।
7. छन्द विविधता:
इस युग में वर्ण्य विषय के समान छन्दों में भी विविधता स्पष्ट दिखाई देती है। इस युग के कवि दोहा, कविता या सवैया तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि रोला, छप्पय, कुण्डलिया, सार, गीतिका, हरिगीतिका, लावनी, वीर आदि छन्द भी प्रयुक्त हुए। मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' तथा जयशंकर प्रसाद ने छन्दों के प्रयोग में अपना अद्भुत कौशल परिचय दिया। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने छन्दों के विशेषीकरण का परामर्श दिया था।
निष्कर्षत :
इस युग के कवियों ने हिन्दी काव्य को श्रृंगारिकता से राष्ट्रीयता, रूढ़िवादिता से स्वच्छन्दता और जड़ता से प्रगति की ओर ले जाने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। द्विवेदीयुगीन चेतना, राष्ट्रीय प्रेम, सामाजिक चेतना, भक्ति, प्रकृति और भाषा सभी स्तरों पर प्रखर दिखाई पड़ती है। यहाँ राष्ट्रभक्ति राजभक्ति के आवरण में लिपटी नहीं है न ही इस युग के रचनाकारों ने काव्य विषय के रूप में विदेशी सत्ता को कहीं वरीयता दी। नवजागरणपरक चेतना से आविर्भूत राष्ट्रीय प्रेम भारत के गौरवपूर्ण अतीत से जुड़ा है, जो वर्तमान की पराधीनता को छिन्न-भिन्न करने के लिए अतीत को भारतीय संस्कृति के जीवन्त मूल्यों से प्रेरणा लेने की कोशिश में जुटा हुआ है।
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| चित्र: द्विवेदी युग (1900-1920) के विकास के प्रमुख चरण और साहित्यिक विशेषताएँ। साभार: |
द्विवेदी युग के प्रमुख कवि और रचनाएँ
हिंदी साहित्य के द्विवेदी युग के प्रमुख कवि और रचनाएँ निम्न है -
| क्रमांक | कवि का नाम और स्थान | जीवनकाल / रचनाकाल | प्रमुख काव्य-रचनाएँ |
|---|---|---|---|
| 1 | नाथूराम शर्मा ‘शंकर’ (अलीगढ़) | 1859-1932 | अनुराग रत्न, शंकर सरोज, गर्भरण्डा रहस्य, शंकर सर्वस्व |
| 2 | महावीर प्रसाद द्विवेदी (रायबरेली) | 1864-1938 | काव्य-मंजूषा, कविता कलाप, सुमन (1923), कान्यकुब्ज-अबला-विलाप, देवी स्तुति शतक |
| 3 | अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ | 1865-1947 | प्रियप्रवास (1914), वैदेही वनवास (1940), पारिजात, कृष्णशतक, रसिक रहस्य, पद्म प्रसून, बोलचाल, रसकलस |
| 4 | बाल मुकुन्द गुप्त (रोहतक) | 1865-1907 | स्फुट कविता (1905) |
| 5 | जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ | 1866-1932 | उद्धव शतक (1929), गंगावतरण (1927), हिंडोला, श्रृंगार लहरी, कलकाशी, समालोचनादर्श (अनुवाद) |
| 6 | लाला भगवानदीन ‘दीन’ (फतेहपुर) | 1866-1930 | वीर क्षत्राणी, वीर बालक, वीर पंचरत्न, नवीन बीन |
| 7 | राय देवी प्रसाद ‘पूर्ण’ (जबलपुर) | 1868-1915 | मृत्युंजय (1904), राम-रावण विरोध, स्वदेशी कुण्डल, वसंत-वियोग, धाराधर धावन (अनुवाद) |
| 8 | रामचरित उपाध्याय | 1872-1938 | राष्ट्रभारती, देवदूत, भारतभक्ति, रामचरित-चिंतामणि (1920), सूक्ति मुक्तावली, विचित्र विवाह |
| 9 | सैयद अमीर अली ‘मीर’ (सागर) | 1873-1937 | उलाहना पंचक, अन्योक्तिशतक |
| 10 | कामता प्रसाद गुरु (सागर) | 1875-1947 | भौमासुर-वध, विनय पचासा, शिवाजी, दासी रानी, पद्य पुष्पावली |
| 11 | सत्यनारायण ‘कविरत्न’ | 1880-1918 | भ्रमरदूत, प्रेमकली, हृदय तरंग, उत्तररामचरितम (अनुवाद) |
| 12 | गिरिधर शर्मा ‘नवरत्न’ (झालरापाटन) | 1881-1961 | मातृवंदना, हिंदी माघ (अनुवाद), हरमिट (अनुवाद) |
| 13 | गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ (उन्नाव) | 1883-1972 | कृषक-क्रन्दन, प्रेम प्रचीसी, राष्ट्रीय वीणा, त्रिशूल तरंग, करुणा कादंबिनी |
| 14 | रूप नारायण पांडेय (लखनऊ) | 1884 (जन्म) | पराग (1924), वन-वैभव |
| 15 | मैथली शरण गुप्त | 1886-1965 | साकेत (1931), भारत-भारती (1912), यशोधरा (1932), रंग में भंग (1909), जयद्रथ वध, पंचवटी, द्वापर |
| 16 | लोचन प्रसाद पाण्डेय (मध्य प्रदेश) | 1886-1959 | प्रवासी, मेवाड़ गाथा, महानदी, पद्य पुष्पांजलि, मृगी दुःखमोचन |
| 17 | श्रीधर पाठक | 1859-1928 | देहरादून (1915), भारत गीत (1928), जगत सचाई सार, कश्मीर सुषमा, एकांतवासी योगी (अनुवाद) |
| 18 | रामनरेश त्रिपाठी (जौनपुर) | 1889-1962 | मिलन (1917), पथिक (1920), मानसी (1927), स्वप्न (1929), कविता-कौमुदी |
| 19 | ठाकुर गोपाल शरण सिंह (रीवा) | 1891-1960 | माधवी, मानवी, संचिता, ज्योतिष्मती |
| 20 | मुकुटधर पाण्डेय (मध्य प्रदेश) | 1895-1984 | पूजा फूल, कानन कुसुम, प्रेम बंधन, आंसू, उद्गार |
द्विवेदी युग के अन्य कवि परिचय तथा उनकी रचनाएँ
द्विवेदी युग के अन्य कवि तथा उनकी रचनाओं का परिचय निम्नलिखित है:
1. नाथूराम शर्मा 'शंकर' (1859-1932 ई.)
नाथूराम शर्मा 'शंकर' का जन्म अलीगढ़ जिले के हरदुआगंज नामक स्थान पर सन् 1859 ई. में हुआ। ये हिन्दी, उर्दू तथा अंग्रेज़ी भाषाओं के अच्छे ज्ञाता थे तथा बचपन से ही कविता लिखा करते थे। आरम्भ में इनकी रचनाएँ भारतेन्दु युग की 'ब्राह्मण पत्रिका' में छपती थीं, फिर 'सरस्वती पत्रिका' में छपने लगीं। प्रारम्भ में ये ब्रजभाषा के कवि थे, लेकिन बाद में खड़ी बोली में लिखने लगे। उन्होंने देशप्रेम, स्वदेशी प्रयोग, समाज सुधार, हिन्दी अनुराग, विधवाओं तथा अछूतों को अपने काव्य का विषय बनाया। उन्हें 'भारतेन्दु प्रज्ञेन्दु', 'साहित्य सुधाकर' आदि उपाधियों से विभूषित किया गया।
इनकी प्रमुख रचनाएँ:
- अनुरागरत्न
- शंकर-सरोज
- गर्भरण्डा रहस्य
- शंकर सर्वस्व
2. राय देवीप्रसाद 'पूर्ण' (1868-1915 ई.)
राय देवीप्रसाद 'पूर्ण' का जन्म जबलपुर में सन् 1868 में हुआ। उन्होंने बी. ए. तक की शिक्षा जबलपुर से प्राप्त की। कुछ समय वकालत की, इसके अतिरिक्त वे सार्वजनिक कार्यों में उत्साह से भाग लेते थे। वे संस्कृत के अच्छे ज्ञाता थे तथा वेदान्त में उनकी विशेष रुचि थी। वे साहित्य के अध्ययन में दत्तचित्त रहे।
उनकी कविताएँ बड़ी सरस एवं भावपूर्ण हैं। ब्रजभाषा और खड़ीबोली दोनों पर उनका समान अधिकार था। उन्होंने श्रृंगार, भक्ति, देशभक्ति और देशप्रेम के साथ-साथ युगीन समस्याओं को भी अपनी कविता का विषय बनाया। उनकी कविता में सरलता, स्वाभाविकता और ओजस्विता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
इनकी प्रमुख रचनाएँ:
- राम-रावण विरोध
- मृत्युंजय
- स्वदेश-कुण्डल
- वसंत-वियोग
- अमलतास
- धाराधर धावन (कालिदास के 'मेघदूत' का ब्रजभाषा में अनुवाद)
3. गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' (1883-1972 ई.)
गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' का जन्म उन्नाव जिले के हड़हा नामक ग्राम में सन् 1883 ई. में हुआ। ये ब्रजभाषा में 'सनेही' उपनाम से और खड़ी बोली में 'त्रिशूल' उपनाम से रचनाएँ लिखते थे। 'त्रिशूल' उपनाम से वे राष्ट्रप्रेम की कविताएँ लिखते थे। उन्होंने 'सुकवि' नामक पत्रिका का संपादन भी किया। वे राष्ट्रीयता और समाज सुधार की भावनाओं के प्रबल समर्थक थे। उनकी कविता में राष्ट्रीय चेतना, ओज और जन-जागृति के स्वर प्रमुख रूप से सुनाई देते हैं।
इनकी प्रमुख रचनाएँ:
- कृषक-क्रन्दन
- प्रेम-पचीसी
- कुसुमांजलि
- राष्ट्रीय वीणा
- त्रिशूल-तरंग
- करुणा-कादम्बिनी
4. रामनरेश त्रिपाठी (1889-1962 ई.)
रामनरेश त्रिपाठी का जन्म जौनपुर जिले के कोइरीपुर नामक ग्राम में सन् 1889 ई. में हुआ। त्रिपाठी जी स्वच्छन्दतावादी काव्यधारा के प्रमुख कवि माने जाते हैं। उन्होंने खड़ी बोली के प्रचार-प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने 'कविता-कौमुदी' के आठ भागों का संपादन किया, जिसमें लोकगीतों और विभिन्न भाषाओं की कविताओं का संग्रह है। उनकी कविताओं में देशभक्ति, प्रकृति प्रेम और नैतिकता का सुंदर चित्रण मिलता है।
इनकी प्रमुख रचनाएँ:
- पथिक (1920)
- पाथेय
- मिलन (1917)
- स्वप्न (1929)
- मानसी (नोट: 'स्वप्न' पर उन्हें हिन्दुस्तानी अकादमी का पुरस्कार भी मिला)
5. लोचनप्रसाद पाण्डेय (1886-1959 ई.)
लोचनप्रसाद पाण्डेय का जन्म मध्य प्रदेश के संबलपुर (अब छत्तीसगढ़) में सन् 1886 ई. में हुआ। वे हिन्दी और ओड़िया दोनों भाषाओं के अच्छे विद्वान थे। उन्होंने साहित्य की अनेक विधाओं में लेखन कार्य किया। उन्हें 'साहित्य-वाचस्पति' की उपाधि से सम्मानित किया गया था।
इनकी प्रमुख रचनाएँ:
- प्रवासी
- मेवाड़-गाथा
- मृगी-दुखमोचन
- पद्य-पुष्पांजलि
- नीति-कविता
6. माखनलाल चतुर्वेदी (1889-1968 ई.)
माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के बाबई नामक ग्राम में सन् 1889 ई. में हुआ। वे एक महान कवि, पत्रकार और प्रखर वक्ता थे। उन्होंने 'प्रभा', 'कर्मवीर' और 'प्रताप' जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया। उनकी कविताओं में राष्ट्रभक्ति और आत्मोत्सर्ग की भावना प्रधान है, जिसके कारण उन्हें 'एक भारतीय आत्मा' कहा जाता है। 'हिमतरंगिणी' पर उन्हें हिन्दी का प्रथम साहित्य अकादमी पुरस्कार (1955) प्रदान किया गया।
इनकी प्रमुख रचनाएँ:
- हिमकिरीटिनी
- हिमतरंगिणी (हिन्दी का प्रथम साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1955)
- माता
- युगचरण
- समर्पण
- वेणु लो गूँजे धरा
7. सियारामशरण गुप्त (1895-1963 ई.)
सियारामशरण गुप्त, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के अनुज थे। इनका जन्म सन् 1895 ई. में चिरगाँव, झाँसी में हुआ। इनकी रचनाओं पर महात्मा गांधी के सिद्धांतों और सत्य-अहिंसा का गहरा प्रभाव है। इनके काव्य में करुणा, सरलता और मानवता के स्वर प्रमुख हैं।
इनकी प्रमुख रचनाएँ:
- मौर्य विजय
- अनाथ
- विषाद
- आद्रा
- आत्मोत्सर्ग
- पाथेय
- मृण्मयी
- बापू
- नकुल
8. सुभद्रा कुमारी चौहान (1904-1948 ई.)
सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म इलाहाबाद के निहालपुर गाँव में सन् 1904 ई. में हुआ। वे राष्ट्रीय चेतना की प्रमुख कवयित्री थीं। भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। उनकी 'झाँसी की रानी' कविता बहुत प्रसिद्ध है। 'जलियाँवाला बाग में वसन्त' कविता में इस नृशंस हत्याकाण्ड पर कवयित्री के करुण क्रन्दन से उसकी मूक वेदना मूर्तिमान हो उठी है।
इनकी प्रमुख रचनाएँ:
- मुकुल
- त्रिधारा
- झाँसी की रानी (प्रसिद्ध कविता)
- जलियाँवाला बाग में वसन्त
9. रामधारी सिंह 'दिनकर' (1908-1974 ई.)
दिनकर ने अपनी काव्य कृतियों में साम्राज्यवादी सभ्यता और ब्रिटिश सरकार के प्रति अपनी प्रखर ध्वंसात्मक दृष्टि का परिचय देते हुए क्रान्ति का आह्वान किया है। पराधीनता के प्रति प्रबल विद्रोह के साथ इसमें पौरुष अपनी भीषणता और भयंकरता के साथ गरजा है। स्वतन्त्रता की प्रथम शर्त कुर्बानी तथा समर्पण को काव्य का विषय बनाकर क्रान्ति व ध्वंस के स्वर से मुखरित उनकी कविताएँ नौजवानों के शरीर में उत्साह का संचार करती हैं।
इनकी प्रमुख रचनाएँ:
- हुँकार
- रेणुका
- विपथगा
10. श्यामनारायण पाण्डेय (1907-1991 ई.)
श्यामनारायण पाण्डेय जी ने वीर रस के उत्कृष्ट काव्यों की रचना की। इनके काव्यों में अद्भूत प्रवाह, ओज और सादगी है। इनकी राष्ट्रीयता अपने समय की सामासिक भारतीय राष्ट्रीयता की जगह ऐतिहासिक गौरव गाथाओं पर अधिक आधारित है।
इनकी प्रमुख रचनाएँ:
- हल्दीघाटी (महाराणा प्रताप के जीवन पर आधारित)
- जौहर (रानी पद्मिनी की जौहर कथा पर आधारित)
द्विवेदी युग: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: द्विवेदी युग का नाम किसके नाम पर पड़ा?
उत्तर: द्विवेदी युग का नाम प्रख्यात साहित्यकार, विचारक और 'सरस्वती' पत्रिका के यशस्वी संपादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर पड़ा।
प्रश्न 2: द्विवेदी युग की समय-सीमा क्या मानी जाती है?
उत्तर: हिन्दी साहित्य के इतिहास में द्विवेदी युग की समय-सीमा सामान्यतः सन् 1900 से 1920 तक मानी जाती है।
प्रश्न 3: डॉ. नगेन्द्र ने द्विवेदी युग को क्या नाम दिया है?
उत्तर: डॉ. नगेन्द्र ने इस युग की सुधारवादी और चेतनापरक प्रवृत्तियों के कारण इसे 'जागरण सुधार काल' कहा है।
प्रश्न 4: द्विवेदी युग की मुख्य भाषा क्या थी?
उत्तर: द्विवेदी युग की सबसे बड़ी उपलब्धि काव्य भाषा के रूप में 'खड़ी बोली' की प्रतिष्ठा थी। इस युग में ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली को व्याकरणिक रूप से शुद्ध और परिमार्जित किया गया।
प्रश्न 5: द्विवेदी युग के प्रमुख कवि कौन-कौन हैं?
उत्तर: इस युग के प्रमुख कवियों में मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध', श्रीधर पाठक, रामनरेश त्रिपाठी, माखनलाल चतुर्वेदी और गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' प्रमुख हैं।
प्रश्न 6: 'सरस्वती' पत्रिका के संपादक के रूप में महावीर प्रसाद द्विवेदी का कार्यकाल क्या था?
उत्तर: आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने वर्ष 1903 से 1920 तक लगातार सत्रह वर्षों तक 'सरस्वती' पत्रिका का संपादन किया।
प्रश्न 7: 'इतिवृत्तात्मकता' से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: इतिवृत्तात्मकता का अर्थ है किसी विषय या कथा का विस्तार से वर्णन करना। द्विवेदी युग के काव्य में कल्पना की तुलना में तथ्यों और कथा के वर्णन (आख्यान) पर अधिक जोर दिया गया, जिसे इतिवृत्तात्मकता कहा जाता है।
निष्कर्ष
संक्षेप में कहें तो, द्विवेदी युग केवल कविताएँ लिखने का दौर नहीं था, बल्कि यह हिन्दी भाषा के 'गढ़ने' और संवारने का समय था। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने न केवल भाषा को व्याकरण की शुद्धता दी, बल्कि साहित्य को दरबारों और महलों से बाहर निकालकर समाज की सच्ची समस्याओं और राष्ट्रप्रेम से जोड़ा।
आज हम जिस परिष्कृत खड़ी बोली का प्रयोग कर रहे हैं, उसकी नींव इसी युग में रखी गई थी। चाहे वह मैथिलीशरण गुप्त की राष्ट्रीय भावना हो या 'हरिऔध' का प्रबंध काव्य, इस काल की रचनाएँ आज भी हमें अपने गौरवशाली अतीत की याद दिलाती हैं और भविष्य के लिए प्रेरित करती हैं। यदि आप हिन्दी साहित्य के विद्यार्थी हैं या साहित्य में रुचि रखते हैं, तो द्विवेदी युग को समझे बिना आधुनिक हिन्दी के विकास की कहानी अधूरी है।


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