भारत-भारती: जीवन परिचय, सारांश, व्याख्या व प्रश्नोत्तर

'भारत-भारती' राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित आधुनिक हिंदी साहित्य की एक कालजयी कृति है, जिसका प्रकाशन वर्ष 1912 में हुआ था। यह काव्य ग्रंथ स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारतीय जनता में राष्ट्रीय चेतना और देशप्रेम जागृत करने के लिए एक महत्वपूर्ण माध्यम बना, जिसके कारण महात्मा गांधी ने गुप्त जी को 'राष्ट्रकवि' की उपाधि दी थी।

    मैथिलीशरण गुप्त का संक्षिप्‍त जीवन परिचय

    विवरण जानकारी
    पूरा नाम मैथिलीशरण गुप्त
    जन्म 3 अगस्त, 1886
    जन्म भूमि चिरगाँव, झाँसी, उत्तर प्रदेश
    मृत्यु 12 दिसंबर, 1964
    मृत्यु स्थान चिरगाँव, झाँसी
    पिता सेठ रामचरण गुप्त
    माता काशीबाई
    कर्म-क्षेत्र नाटककार, लेखक, कवि
    मुख्य रचनाएँ
    • पंचवटी
    • साकेत
    • जयद्रथ वध
    • यशोधरा
    • द्वापर
    • झंकार
    • जयभारत
    भाषा ब्रजभाषा
    पुरस्कार-उपाधि पद्मभूषण, हिन्दुस्तानी अकादमी पुरस्कार, मंगला प्रसाद पारितोषिक, साहित्य वाचस्पति, डी.लिट्. की उपाधि।
    पद राष्ट्रकवि, सांसद
    अन्य जानकारी
    • 1952 में गुप्त जी राज्य सभा के सदस्य मनोनीत हुए। 
    • 1954 में उन्हें 'पद्मभूषण' अलंकार से सम्मानित किया गया।

    भारत भारती मैथिलीशरण गुप्त

    मैथिलीशरण गुप्त (1886-1964 ई.) का जीवन परिचय

    मैथिलीशरण गुप्त, द्विवेदी युग के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। इनका जन्म चिरगाँव, झाँसी में सन् 1886 में हुआ था इनकी अनेक रचनाएँ कलकत्ता से निकलने वाले पत्र 'वैश्योपकारक' में छपती थीं कालान्तर में इनका परिचय महावीरप्रसाद द्विवेदी से हुआ और इनकी रचनाएँ 'सरस्वती' पत्रिका में प्रकाशित होने लगीं । द्विवेदी जी के आदेश व उपदेश से इनकी रचनाएँ निखरी। द्विवेदी जी, गुप्त जी के गुरु व प्रेरक सिद्ध हुए

    गुप्त जी की प्रथम पुस्तक 'रंग में भंग' का प्रकाशन वर्ष 1909 में हुआ, परन्तु इन्हें प्रसिद्धि 'भारत-भारती' वर्ष 1912 से मिली 'भारत-भारती' ने हिन्दी भाषियों में जाति, देश के प्रति गर्व और गौरवपूर्ण भावनाएँ प्रबुद्ध कीं तभी ये राष्ट्रकवि के रूप में प्रसिद्ध हुए इन्हें राष्ट्रकवि की उपाधि गांधी जी ने प्रदान की। गुप्त जी को सन् 1952 में राज्यसभा का सदस्य भी नियुक्त किया गया

    गुप्त जी रामभक्त कवि थे। 'मानस' के पश्चात् रामकाव्य का दूसरा ग्रन्थ 'साकेत' है, जिसकी रचना गुप्त जी ने की कविता और निजी जीवन में उन्होंने अंग्रेजियत या संस्कृतज्ञता का आतंक नहीं माना और न ही उनकी अवज्ञा की साधारण बोलचाल की खड़ी बोली, हिन्दी के जातीय मात्रिक छन्द, गृहस्थ जीवन में प्रचलित पौराणिक आख्यान और कुल मिलाकर अपनी साधारणता में विनम्र आत्मविश्वास- ये ही वे बुनियादी तत्त्व हैं, जिनसे गुप्त का रचनात्मक व्यक्तित्व निर्मित हुआ

    इनका स्रोत किसी प्रकार के अर्जित अभिजात्य में न होकर अपने सामान्य आस्तिक हिन्दू गृहस्थ जीवन में था इन तत्त्वों के संयोग में राष्ट्रीय भाव धारा स्वयं विकसित होती है मैथिलीशरण गुप्त की राष्ट्रीयता पराधीनता के दौर में विकसित होकर भी आत्मीय भाव से सहज है । उसमें आक्रामकता का अभाव है। वैष्णव भावना की निष्ठा है ये कई विशेषताएँ मिलकर महात्मा गांधी की राष्ट्रीयता के समतुल्य चलती हैं इसीलिए गांधी जैसे राष्ट्रपिता हैं, वैसे ही मैथिलीशरण गुप्त राष्ट्रकवि हैं

    मैथिलीशरण गुप्त की राष्ट्रीय भावना में न दैन्य है और न पाखण्ड प्रबन्ध काव्य के इतिवृत्तपरक रूप को स्वीकार कर, उन्होंने पारम्परिक हिन्दू पौराणिक गाथाओं को भक्तिकालीन कवियों के समानान्तर प्रस्तुत किया इनके काव्य सृजन में निम्न प्रवृत्तियाँ दृष्टव्य होती हैं: कठोर नीतिमत्ता, आदर्शवादिता, वर्ण्य विषय में विस्तार, राष्ट्रीयता प्रधान, राजनीतिक चेतना, सांस्कृतिक पुनरुत्थान, मानव गरिमा, मानवतावादी, सामन्ती शोषकों के आत्मनिरीक्षण पर बल, गांधीवाद का प्रभाव, नारी दृष्टि सर्वधर्म समभाव, पौराणिकता और आधुनिकता का सम्मिश्रण, स्वाधीनता, युगीन चरित्र-चित्रण, मर्यादावाद पर दुःख कातरता, इतिवृत्तात्मकता, खड़ी बोली का प्रयोग, वैष्णव संस्कार, समन्वित काव्य शिल्प आदि

    मैथिलीशरण गुप्त जी की रचनाएँ

    गुप्त जी के नाटक: 

    • तिलोत्तमा
    • अनघ
    • चन्द्रहास

    गुप्त जी के काव्य ग्रन्थ: 

      1. रंग में भंग (1909), 
      2. जयद्रथ वध (1910), 
      3. भारत भारती (1912), 
      4. किसान (1917), 
      5. शकुन्तला (1923), 
      6. पंचवटी (1925), 
      7. अनघ (1925), 
      8. हिन्दू (1927), 
      9. शक्ति (1928), 
      10. गुरुकुल (1929), 
      11. विकटभट (1929), 
      12. साकेत (1932), 
      13. यशोधरा (1933), 
      14. द्वापर (1936), 
      15. सिद्धराज (1936), 
      16. नहुष (1940), 
      17. कुणालगीत (1942), 
      18. काबा और कर्बला (1942), 
      19. पृथ्वी पुत्र (1950), 
      20. जयभारत (1952), 
      21. विष्णुप्रिया (1957)

    गुप्त जी के अनूदित काव्य: 

    • प्लासी का युद्ध,
    • मेघनाद वध,
    • वृत्त संहार

    गुप्त जी का कला पक्ष 

    अपनी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति के लिए कवि को कुछ बाह्य उपादानों का सहारा लेना पड़ता है । ये उपादान ही कला पक्ष के अन्तर्गत आते हैं। गुप्त जी के काव्य का कला पक्ष-शैली छन्द, भाषा, अलंकार आदि की समृद्धि का परिचायक है । भाषा कवि की अनुभूति और उद्देश्य को जनसाधारण तक पहुँचाने का माध्यम होती है। गुप्त जी भाषा के पारखी हैं उन्होंने जिस समय काव्य क्षेत्र में पदार्पण किया, उस समय तक खड़ी बोली और ब्रजभाषा का विवाद समाप्त हो चुका था और खड़ी बोली ने काव्य जगत् में अपना स्थान सुदृढ़ कर लिया था । गुप्त जी ने खड़ी बोली को ही अपने काव्य का माध्यम बनाया। गुप्त जी की भाषा सुगठित, सरल, परिष्कृत है वह प्रसाद, ओज व माधुर्य तीनों गुणों से युक्त हैं

    गुप्त जी द्वारा अपने काव्य में वैदर्भीं काव्यात्मक गीति शैली तथा माधुर्य, ओज व प्रसाद तीनों गुणों का समावेश किया है गुप्त जी ने अपने काव्य में शब्द शक्ति के अभिधा गुण को अपनाया, क्योंकि इन्होंने अपना ध्यान सहज अभिव्यक्ति पर केन्द्रित रखा कहीं-कहीं भाषा के क्रमिक विकास के लिए उन्होंने लक्षणा तथा व्यंजना की शब्द-शक्ति का भी सफल प्रयोग किया है

    गुप्त जी ने अपने काव्य में विविध शैलियों का प्रयोग किया। 'साकेत', 'जयद्रथ वध' और 'सिद्धराज' प्रबन्धात्मक शैली में हैं उन्होंने अपने काव्य में अलंकृत, उपदेशात्मक शैली का भी प्रयोग किया है यशोधरा, साकेत व कुणाल गीत नाट्य शैली में तथा भारत-भारती व पंचवटी विवरणात्मक शैली में लिखे गए हैं । गुप्त जी की अलंकार योजना अनूठी है। उन्होंने लगभग दोनों प्रकार के शब्दालंकार व अर्थालंकारों का प्रयोग किया है उन्होंने अलंकारों की सहायता से ही अपनी कल्पना शैली को मनोरम बनाया है । गुप्त जी ने लगभग अपने सभी काव्य छन्दबद्ध लिखे। उन्होंने वर्णिक और मात्रिक दोनों प्रकार के छन्दों का प्रयोग किया वर्णिक में मालिनी, वसन्ततिलका तथा मन्दाक्रान्ता और मात्रिक में दोहा, आर्या, त्रोटक, सवैया, गीतिका, मनहरण आदि छन्द इन्हें प्रिय रहे हैं

    भारत-भारती का सारांश

    भारत-भारती काव्य का गुप्त जी ने वर्ष 1912 में सृजन किया तथा वर्ष 1914 में यह प्रकाशित हुआ भारत-भारती की रचना के प्रयोजन में गुप्त जी ने लिखा है- "कोई दो वर्ष हुए, मैंने 'पूर्व दर्शन' नाम की एक तुकबन्दी लिखी थी। उस समय चित्त में आया था कि हो सका तो कभी इसे पल्लवित करने की चेष्टा करूँगा। इसके कुछ ही दिन बाद उक्त राज (राजा रामपाल सिंह) का एक कृपा पत्र मुझे मिला, जिसमें उन्होंने मौलाना हाली के मुसददस को लक्ष्य करके इस ढंग की एक कविता पुस्तक हिन्दुओं के लिए लिखने का मुझसे अनुग्रहपूर्वक अनुरोध किया।"

    भारत-भारती में गुप्त जी ने स्वदेश प्रेम को दर्शाते हुए वर्तमान और भावी दुर्दशा से उबरने के लिए समाधान खोजने का सफल प्रयास किया है इस रचना में कई सामाजिक आयामों पर विचार करने का विमर्श किया गया है भारतीय साहित्य में 'भारत-भारती' सांस्कृतिक नवजागरण का ऐतिहासिक दस्तावेज है

    भारत-भारती के कुछ पदों की व्याख्या 

    'भारत भारती' को तीन खण्डों में बाँटा गया है: अतीत खण्ड, वर्तमान खण्ड तथा भविष्यत् खण्ड

    प्रथम खण्‍ड - अतीत खण्ड 

    (1)

    संसार में किसका समय है एक-सा रहता सदा
    है निशि-दिवा-सी घूमती सर्वत्र विपदा-सम्पदा। 
    जो आज एक अनाथ है, नरनाथ कल होता वही
    जो आज उत्सव-मग्न है, कल शोक से रोता वही।
    चर्चा हमारी भी कभी संसार में सर्वत्र थी
    वह सद्गुणों की कीर्ति मानो एक और कलत्र भी 
    इस दुर्दशा का स्वप्न में भी क्या हमें कुछ ध्यान था
    क्या इस पतन ही को हमारा वह अतुल उत्थान था।

    व्याख्या -

    गुप्त जी कहते हैं कि इस संसार में कभी भी किसी का समय एक समान नहीं रहता अर्थात् इस संसार में दिन-रात, सुख-दुःख, विपत्ति-सम्पत्ति आदि साथ-साथ चलते रहते हैं यदि आज कोई राजा है, तो कल वो रंक भी हो सकता है गुप्त जी कहते हैं यदि आज कोई अनाथ है, कल वह सनाथ भी हो सकता है उसके पति-पत्नी, पुत्र, बन्धु-बांधव आदि हो सकते हैं कवि कहता है कि यदि आज कोई व्यक्ति उत्सवों में आनन्द मग्न है तो कल वह किसी असामयिक दुर्घटना-वश शोकग्रस्त भी हो सकता है तात्पर्य यही है कि यहाँ गुप्तजी ने समय के परिवर्तन का समर्थन किया है उनके अनुसार समय की परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं

    दूसरे पद्यांश में गुप्त जी भारत के समृद्ध अतीत और उसकी वर्तमान दशा के विषय पर विचार कर रहे हैं गुप्त जी कहते हैं इस पूरे संसार में कभी हमारे देश भारत की चर्चा हर स्थान पर थी । उसका यश चारों ओर फैला था। हमारे देश के शासकों, सामान्य व्यक्तियों ऋषियों, मुनियों, विद्वानों के सद्‌गुणों का यश पूरे संसार में इस तरह फैला हुआ था कि मानो हमारे देश के उन महान् व्यक्तियों की कीर्ति उनकी सहचरी हो, परन्तु गुप्त जी देश की वर्तमान दुर्दशा से त्रस्त हैं अपने देश के अतीत की कीर्ति को याद करते हुए एक ओर तो उनका मन गौरव का अनुभव करता है, वहीं दूसरी ओर वे देश की वर्तमान दशा से दुःखी भी हैं वे कहते हैं आज जो दुर्दशा हमारे देश की हो रही है उसके विषय में हमने सपने में भी नहीं सोचा था वे चिन्ता ग्रस्त होकर कहते हैं कि क्या जो हमने पहले वह कीर्ति, प्रसिद्धि और उन्नति प्राप्त की थी, वह आज होने वाले इस पतन के लिए ही की थी कहने का तात्पर्य यह है कि जिस तरह से हमारा पहले गौरव बढ़ा था, उतनी ही तेजी से आज हमारा देश पतन की ओर अग्रसर है

    विशेष -

    • प्रस्तुत पद्यांशों में एक ओर तो कवि ने समय की परिवर्तनशीलता के विषय में बताया है, तो दूसरी ओर उन्होंने देश के पतन पर चिन्तन किया है  
    • प्रस्तुत पंक्तियाँ गुप्त जी के राष्ट्रकवि होने का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं  
    • उपमा और उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग है

    (2)

    आरम्भ जब जो कुछ किया, हमने उसे पूरा किया
    था जो असम्भव भी उसे सम्भव हुआ दिखला दिया। 
    कहना हमारा बस सही था विघ्न और विराम से- 
    करके हटेंगे हम कि अब मरके हटेंगे काम से।।
    यह ठीक है, पश्चिम बहुत ही कर रहा उत्कर्ष है
    पर पूर्व-गुरु उसका यही पुरु वृद्ध भारतवर्ष है। 
    जाकर विवेकानन्द-सम कुछ साधु जन इस देश से 
    करते उसे कृतकृत्य हैं अब भी अतुल उपदेश से।

    व्याख्या -

    गुप्त जी भारत के समृद्ध अतीत से परिचय कराते हुए कहते हैं कि भारतीयों ने जो भी कार्य आरम्भ किया उसे पूर्ण करके ही दम लिया अर्थात् हमने किसी भी कार्य को कभी भी अधूरा नहीं छोड़ा जो कार्य विश्व में अन्य के लिए असम्भव था, उसे हमने सम्भव करके दिखलाया । हम विघ्नों, आपत्तियों, विपत्तियों से कभी नहीं डरे। अपने कार्य को अधूरा छोड़कर हमने कभी भी बीच में आराम करने के विषय में नहीं सोचा हमने या तो कार्य को पूर्ण ही किया या उसके लिए स्वयं को बलिदान ही कर दिया कहने का तात्पर्य यही है कि हमारा अतीत उद्यम और परिश्रम की स्याही से लिखा गया है इसलिए हमारे पूर्वज कठिन-से-कठिन कार्य को भी करने में समर्थ रहे

    गुप्त जी कहते हैं कि यह बात ठीक है कि पश्चिम (यूरोप) के लोग लगातार प्रगति कर रहे हैं, परन्तु यह भी अकाट्य सत्य है कि भारत प्राचीन समय से ही पूरे विश्व का गुरु रहा है कहने का तात्पर्य यह है कि जिन क्षेत्रों में आज पाश्चात्य लोग अपनी उन्नति का डंका बजा रहे हैं, उन क्षेत्रों में भारत प्राचीन काल में बहुत उन्नत रहा है, आध्यात्मिक रूप से भारत ने जो उन्नति की है वह विश्व की अपेक्षा सर्वोत्कृष्ट है इसी कारण भारत को विश्वगुरु, धर्मगुरु आदि सम्मानजनक उपाधियों से पुकारा जाता है हमारे देश के महान् सन्त-मुनि, जैसे स्वामी विवेकानन्द आदि अन्य देशों (अमेरिका आदि) में जाकर वहाँ अतुलनीय श्रेष्ठ आध्यात्मिक उपदेश देते हैं, जिसे ग्रहण करके वहाँ के लोग हमारे देश के प्रति श्रद्धा से भरकर शीश नवाते हैं और उसका सम्मान करते हैं

    विशेष -

    • यह सत्य है कि भारत पुरातन काल से ही अपनी श्रेष्ठ आध्यात्मिक उपलब्धि के कारण अन्य देशों के लिए पूजनीय रहा है  
    • ओज गुण तथा अभिधा शब्द शक्ति का प्रयोग है


    द्वितीय खण्‍ड - वर्तमान खण्ड 

    (3)

    जिस लेखनी ने है लिखा उत्कर्ष भारतवर्ष का
    लिखने चली अब हाल वह उसके अमित अपकर्ष का। 
    जो कोकिला नन्दन-विपिन में प्रेम से गाती रही
    दावाग्नि-दग्धारण्य में रोने चली है अब वही।

    व्याख्या -

    गुप्त जी 'वर्तमान खण्ड' लिखते समय उसके आरम्भ में कहते हैं कि जिस कलम ने 'अतीत खण्ड' में भारत देश की उन्नति, उत्कर्ष की प्रशंसा में लिखा, अब वही कलम उसी देश की अपकीर्ति व पतन का हाल लिखने चली है तात्पर्य यही है कि गुप्त जी भारत की वर्तमान दशा से अत्यन्त आहत हैं (जिस समय 'भारत-भारती' ग्रन्थ लिखा गया, उस समय भारत अंग्रेजों का गुलाम था), इसलिए भारत के समृद्ध प्राचीन काल की गाथा लिखते समय जो सुख उन्हें प्राप्त हुआ था, उससे ज्यादा दुःख उन्हें भारत की वर्तमान दुर्दशा को लिखते समय हो रहा है गुप्त जी कहते हैं कि जिस नन्दन वनरूपी देश में कोयल बड़े प्रेम से आनन्दमग्न होकर गाती फिरती थी अब वह देश वन में लगने वाली आग के समान दग्ध वन हो गया है, जिस कारण वही कोयलें अब देश में रोती फिर रही हैं कहने का तात्पर्य यह है कि जिस देश में उन्नति और समृद्धि हर समय फलती फूलती थी, सभी लोग आनन्दपूर्वक रहते थे अब वही देश अपनी दुर्दशा के कारण आग के जंगल के समान हो गया है, जिसके निवासी अब अपने बुरे हाल पर रोते फिरते हैं

    विशेष -

    • गुप्त जी ने यहाँ राष्ट्र के प्रति अपने अमिट प्रेम का परिचय दिया है, जो देश की दुर्दशा के कारण अत्यन्त आहत है
    • रूपक और अनुप्रास अलंकार का प्रयोग है

    (4)

    रहता प्रयोजन से प्रचुर पूरित जहाँ धन-धान्य था
    जो 'स्वर्ण-भारत' नाम से संसार में सम्मान्य था
    दारिद्रय-दुर्धर अब वहाँ करता निरन्तर नृत्य है 
    आजीविका-अवलम्ब बहुधा भृत्य का ही कृत्य है।

    व्याख्या -

    गुप्त जी कहते हैं कि जिस देश में विभिन्न प्रयोजनों के कारण से धन-धान्य प्रचुर मात्रा से परिपूर्ण था तथा जो भारत सम्पूर्ण संसार में सोने की चिड़िया या स्वर्ण भारत के नाम से सम्मानित था उसी देश में अब प्रचण्ड रूप से निर्धनता नृत्य करती रहती है कहने का तात्पर्य यही है कि जो देश धन-धान्य से परिपूर्ण तथा स्वर्ण भारत के नाम से जाना जाता था, उसी देश में अब लोग भूखे मरते हैं तथा चहुँ ओर गरीबी का ही निवास है गुप्त जी कहते हैं इस गुलाम हुए देश में अब मुख्य रूप से आजीविका या भरण-पोषण का साधन केवल और केवल एक 'नौकर' का ही कार्य रह गया है अर्थात् वर्तमान समय में भारत में अब अंग्रेजों की गुलामी करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प शेष नहीं रह गया है

    विशेष - 

    • प्रस्तुत पद्यांश देश की तत्कालीन परिस्थितियों का साक्षी है; जिसमें देश की उस समय की दारिद्रय पूर्ण दशा का वर्णन किया गया है  
    • 'दारिद्रय-दुर्धर अब वहाँ करता निरन्तर नृत्य है' में मानवीकरण अलंकार है तथा अनुप्रास अलंकार का प्रयोग भी हुआ है


    तृतीय खण्‍ड - भविष्यत् खण्ड 

    (5)

    हतभाग्य हिन्दू-जाति! तेरा पूर्व-दर्शन है कहाँ
    वह शील, शुद्धाचार, वैभव देख, अब क्या है यहाँ
    क्या जान पड़ती वह कथा अब स्वप्न की-सी है नहीं
    हम हों वहीं, पर पूर्व-दर्शन दृष्टि आते हैं कहीं?

    व्याख्या -

    गुप्त जी हिन्दू जाति को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि हे दुर्भाग्यशाली हिन्दुओं! तुम्हारा वह प्राचीन दर्शन कहाँ है? अर्थात् जो प्रगतिशील पुरातन स्थिति थी, वो अब दिखाई नहीं देती । तुम्हारा वह शील, शुद्ध आचरण तथा वैभवपूर्ण साम्राज्य अब दिखाई नहीं देता। कहने का तात्पर्य यही है कि हे हिन्दुओं! जो तुम्हारा प्राचीन गौरवशाली इतिहास था अब वो दिखाई नहीं पड़ता हे हिन्दुओं, तुम्हारी प्रगतिशील व वैभवशाली जो कथा थी, क्या वह अब स्वप्न समान नहीं हो गई है? गुप्त जी कहते हैं कि हे हिन्दू जाति प्राचीनकाल में जो हमारा वैभवपूर्ण गौरव रहा है, वह अब क्या कहीं दिखाई देता है? अर्थात् हिन्दू-जाति का वह पुरातन गौरवपूर्ण इतिहास वर्तमान समय में अब कहीं दिखाई नहीं देता

    विशेष -

    • हिन्दू जाति के हो रहे तत्कालीन पतन के विषय में कवि चिन्तनशील है

    (6)

    किस भाँति जीना चाहिए, किस भाँति मरना चाहिए
    सो सब हमें निज पूर्वजों से याद करना चाहिए। 
    पद-चिह्न उनके यत्न-पूर्वक खोज लेना चाहिए
    निज पूर्व-गौरव-दीप को बुझने न देना चाहिए।

    व्याख्या -

    गुप्त जी कहते हैं कि हे भारतवासियों हमे अपने जीवन को किस प्रकार जीना मरना चाहिए, उसके लिए हमे सबसे पहले अपने पूर्वजों द्वारा किए सत्कर्मों को याद कर उनका अनुसरण करना चाहिए कहने का तात्पर्य यह है कि हमे अपने जीवन में अपने पूर्वजो को आदर्श बनाना चाहिए तथा प्रयत्न करते हुए अपने उन वीर तथा सदाचारी पुरुषों के किए गए कार्यों को अपना अनुगामी बनाकर उनके पद-चिह्नों पर ही चलना चाहिए गुप्त जी कहते हैं वे जो हमारे प्राचीन गौरव रूपी दीप हैं उनको बुझने नहीं देना चाहिए अर्थात् हमारे पूर्वजो ने सत्य तथा शुद्ध आचरण का जो पाठ हमें पढ़ाया है, हमें उसे सर्वदा याद रखकर उसका अनुसरण करना चाहिए तथा उनके आदर्श को अपने आचरण में लाकर उसे हमेशा के लिए जीवन्त रखना चाहिए

    विशेष -

    • गुप्त जी आने वाली पीढ़ी को अपने पूर्वजों के सच्चे आदर्शों का अनुकरण करने की सीख दे रहे हैं  
    • 'निज पूर्व-गौरव-दीप' में रूपक अलंकार है

    भारत-भारती के संबंध में विभिन्‍न विद्वानों के मत

    आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार, "यह पुस्तक पहले पहल हिन्दी प्रेमियों का सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली है।" भारत भारती की लोकप्रियता का यह आलम था कि यह रचना उस समय प्रभात फेरियों, राष्ट्रीय आन्दोलनों, शिक्षा संस्थानों आदि में गाई जाने लगी थी  

    आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के अनुसार, "यह काव्य वर्तमान हिन्दी साहित्य में युगान्तर उत्पन्न करने वाला है। इसमें यह संजीवनी शक्ति है, जो किसी भी जाति को उत्साह जागरण की शक्ति का वरदान दे सकती है।"

    डॉ. बच्चन सिंह— 'हिंदी भाषाभाषी क्षेत्र में इतने व्यापक स्तर पर राष्ट्रीय–सांस्कृतिक चेतना जगाने का जो काम अकेले भारत भारती ने किया, उतना अन्य पुस्तकों ने मिलकर भी नहीं किया।'

    भारत भारती के महत्त्वपूर्ण तथ्य

    मैथिलीशरण गुप्त की सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति।

    ✅ संवत् 1968 (सन् 1911) रामनवमी के दिन काव्य–सृजन प्रारंभ तथा संवत् 1969 (सन् 1912) जन्माष्टमी के दिन पूर्ण।

    ✅ सर्वप्रथम संवत् 1969 (सन् 1912) में प्रकाशित।

    ✅ अब तक इसके 20 से भी अधिक संस्करण प्रकाशित।

    ✅ स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उत्तर भारत में राष्ट्रीयता के प्रचार एवं प्रसार की दृष्टि से पर्याप्त महत्त्वपूर्ण।

    ✅ गुप्त जी के प्रिय हरिगीतिका छंद में रचित काव्य–कृति हैं।

    भारत भारती तीन खण्डों में विभक्त हैं :-

    1. अतीत खण्ड
    2. वर्तमान खण्ड
    3. भविष्यत् खण्ड

    अतीत खण्ड - इसमें भारत के प्राचीन गौरव, भारतीयों की वीरता, आदर्श, विद्या–बुद्धि, कला–कौशल, सभ्यता–संस्कृति, साहित्य, दर्शन, स्त्री–पुरुष आदि का गुणगान।

    वर्तमान खण्ड - इसमें भारत की साहित्य, संगीत, धर्म, दर्शन में हुई अधोगति, रईसों की भोगलिप्सा, तीर्थ–मंदिरों में व्याप्त अनाचार, पतनोन्मुख समाज और स्त्रियों की दुर्दशा का चित्रण।

    भविष्यत् खण्ड - इसमें देश की उन्नति की मंगल–कामना एवं भारतीयों को उद्बोधन।

    भारत-भारती से संबंधित महत्‍पूर्ण प्रश्‍नोत्तर 

    1. ‘भारत–भारती’ में कवि गुप्त ने हिंदू जाति को ‘हतभाग्य’ क्यों कहा है?





    ANSWER= (B) वह अपने पूर्वजों के आदर्श खो चुकी है।

    2. ‘भारत–भारती’ में कवि गुप्त ने भारतवासियों का उद्भव किससे माना है?





    ANSWER= (A) ऋषिगणों से

    3. ‘भारत–भारती’ में किस भावना की रूपरेखा प्रस्तुत है?





    ANSWER= (B) राष्ट्रीय भावना

    4. 'भारत-भारती' काव्य का प्रकाशन कब हुआ?





    ANSWER= (C) 1912 ई.

    5. “करते तुलसीदास भी कैसे मानस नाद? महावीर का यदि उन्हें मिलता नहीं प्रसाद।” उक्त पंक्तियों के रचनाकार हैं –





    ANSWER= (C) मैथिलीशरण गुप्त

    6. किस साहित्यकार ने राष्ट्र (मातृभूमि) को सगुणमूर्ति सर्वेश की कहकर उसकी वंदना की है?





    ANSWER= (A) मैथिलीशरण गुप्त

    7. 'भारत-भारती' की रचना का उद्देश्य है-





    ANSWER= (D) इनमें से सभी।


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