'मैं नीरभरी दुःख की बदली' कविता की व्‍याख्‍या | महादेवी वर्मा

‘मैं नीर भरी दुःख की बदली’ महादेवी वर्मा की प्रसिद्ध छायावादी कविता है, जो ‘सांध्यगीत’ काव्य-संग्रह में संकलित है। इस कविता में कवयित्री ने अपने जीवन और स्त्री-पीड़ा की तुलना नीर से भरी बदली से करते हुए विरह-वेदना, करुणा, क्षणभंगुरता और मानवीय संवेदना को मार्मिक रूप में अभिव्यक्त किया है। 

प्रस्तुत पोस्ट में कविता का सारांश, पद-व्याख्या, काव्य-विशेषताएँ, अलंकार, दार्शनिक भाव, तथा परीक्षा-उपयोगी महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर सरल भाषा में दिए गए हैं। यह सामग्री BA-MA, UGC NET और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत उपयोगी है।

मैं नीर भरी दुख की बदली सारांश

     'मैं नीरभरी दुःख की बदली' कविता का सारांश

    इस कविता में महादेवी वर्मा ने अपनी तुलना बदली से करते हुए कहा है कि मेरा जीवन हर समय दुःख की बदलियों में घिरा रहता है। जिस प्रकार बदली में जल भरा होता है, उसी तरह महादेवी की आँखें सदैव दुःख के जल से भरी होती हैं। जैसे बदली के बरसने से संसार को सुख मिलता है, उसी तरह महादेवी वर्मा की आँखों से गिरते आँसुओं को देखकर लोगों को सुख मिलता है। जिस तरह रिमझिम बरसते बादलों से संगीत झरता है और लोगों के मन से वह अपने तार जोड़ लेता है। हालाँकि बदली अपने पीछे कोई चरण-चिह्न नहीं छोड़ती, किन्तु गर्मी से परेशान जब संसार को उसकी याद आती है, तो उसे एक शान्ति सी मिलती है और निराश मन उत्साह से भर जाता है, उसी तरह व्यक्ति के इस संसार से चले जाने पर उसका कोई निशान शेष नहीं रहता, परन्तु उसकी यादें लोगों को सदैव उत्प्रेरित करती हैं।

    अन्त में महादेवी कहती है कि बदली इस खुले आकाश में जहाँ चाहे छा सकती है, परन्तु फिर भी कोई कोना उसका नहीं हो पाता और उसे आकाश छोड़कर जाना पड़ता है। उसी तरह उनको भी एक दिन यह संसार छोड़कर जाना है।

    'मैं नीर भरी दुःख की बदली' के कुछ पदों की व्याख्या

    (1)
    मैं नीर भरी दुःख की बदली 
    स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसा, 
    क्रन्दन में आहत विश्व हँसा, 
    नयनों में दीपक-से जलते, 
    पलकों में निर्झरिणी मचली !

    व्याख्या -

    महादेवी वर्मा कहती हैं कि जिस प्रकार बदली में जल भरा रहता है, उसी तरह मेरे जीवन की बदलियों में दुःख भरा हुआ है। कवयित्री कहती है कि उसके स्पन्दन में वह चिर निःस्पन्दन बसा है, जो सदा से स्पन्दन रहित है, स्थिर है, बादलों की गर्जना में पीड़ित और चोट खाए हुए संसार के लोगों की पीड़ा ही अभिव्यक्त होती है। ऐसा लगता है कि यह गर्जन किसी की पीड़ा के स्वर नहीं हैं, बल्कि कोई जोर से हँस रहा है, परन्तु यह वास्तव में, किसी एक प्रेमी का रुदन या क्रन्दन है।

    कवयित्री कहती हैं कि मुझ विरहिणी की आँखों में सदा दीपक से जलते रहते हैं। ये दीपक विरह में अग्नि या आशा के हो सकते हैं। पलकों से आँसू किसी नदी के समान बहने को तैयार रहते हैं। कवयित्री अपनी विरह वेदना को आँसुओं के रूप में प्रवाहित करना चाहती है। ठीक उसी तरह जैसे बदली अपने आप से जल के कणों को बहाना चाहती है।

    विशेष -

    • यहाँ महादेवी वर्मा ने अपने जीवन की तुलना बदली से करके अपनी विरह-वेदना को अभिव्यक्ति दी है।
    • रूपक, उपमा तथा सम्पूर्ण पद में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग हुआ है।
    • विप्रलम्भ श्रृंगार रस का प्रयोग किया गया है।
    • लक्षणा शब्द शक्ति का प्रयोग किया गया है।

    (1)
    मेरा पग-पग संगीत भरा, 
    श्वासों से स्वप्न-पराग झरा, 
    नभ के नव रंग, बुनते दुकूल, 
    छाया में मलय-बयार पली ! 
    मैं क्षितिज-भृकुटि पर छिर धूमिल, 
    चिन्ता का भार बनी अविरल, 
    रज-कण पर जल-कण हो बरसी, 
    नवजीवन-अंकुर बन निकली !

    व्याख्या -

    कवयित्री आगे कहती है कि मुझ नीर भरी बदली के पग-पग पर संगीत भरा हुआ है। यह संगीत बिजली की कड़क या बादल के गर्जन के रूप में हो सकता है। बादलों के साथ चलने वाली हवाएँ उसकी साँसें हैं, जिनसे स्वप्न पराग झरता है। बादलों से लोगों के सपने जुड़े हैं; जो बादलों के उमड़ने-घुमड़ने से झरता है। नवरंगों से युक्त इन्द्रधनुषी चमक ही मानो बादलों के रंग भरे कपड़े हैं। बादलों की छाया में मलय-पवन, आशय ग्रहण करती है अर्थात् जब बादल घुमड़कर आते हैं तो वे अपने साथ शीतल सुगन्धित हवा को भी लाते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि महादेवी वर्मा को अपने प्रियतम की यादें ही मलय पर्वत से आने वाली शीतल सुगन्धित वायु ही प्रतीत होती हैं।

    कवयित्री आगे कहती है धुएँ समान बादल जब क्षितिज पर छाते हैं तो ऐसा लगता है मानो क्षितिज की भौहों पर चिन्ता का अविरल भार बढ़ गया हो। जब मिट्टी के कणों पर जल की बूंदे बरसती हैं, तो अंकुर के फूटने पर ऐसा लगता है मानो नव-जीवन निकल आया हो।

    कहने का तात्पर्य यह है कि जब कवयित्री की आँखों से विरह की पीड़ा में आँसू निकल पड़ते हैं तो उसे थोड़ी देर बाद कुछ शान्ति मिलती है, जिससे उसे लगता है कि जन-जीवन के अंकुर फूट पड़े हैं।

    विशेष -

    • मूर्त बादलों की तुलना अमूर्त चिन्ता के भार से की गई है, जोकि एक छायावादी कविता का लक्षण है।
    • महादेवी की करुणा और उसकी अभिव्यक्ति चरम पर है।
    • उपमा, रूपक व पुनरुक्ति प्रकाश आदि अलंकारों का प्रयोग।
    • लाक्षणिकता का प्रयोग।
    • विप्रलम्भ श्रृंगार रस का प्रयोग किया गया है।

    (3)
    पथ को न मलिन करता आना, 
    पद-चिहन न दे जाता जाना, 
    सुधि मेरे आगम की जग में, 
    सुख की सिहरन हो अन्त खिली। 
    विस्तृत नभ का कोई कोना, 
    मेरा न कभी अपना होना, 
    परिचय इतना, इतिहास यही,
    उमड़ी कल थी मिट आज चली।

    व्याख्या -

    नीर की बदली के रूप में कवयित्री कहती है कि संसार में उसके आने से न तो मार्ग गन्दा होता है और न कोई पद-चिह्न शेष रह जाते हैं। कवयित्री कहती है कि उसकी यादें सुख भरी हैं और उन विचारों से तन और मन सिहर जाता है। इतना विशाल आकाश है, लेकिन उसका कोई भी कोना मेरा नहीं हो सकता अर्थात् मेरे भाग्य में यही लिखा है कि नभ का कोई भी कोना मेरा नहीं हो सकता। फिर भी मैं उमड़ती हूँ, घुमड़ती हूँ और बरस जाती हूँ। मेरा परिचय और इतिहास केवल इतना ही है कि कुछ दिन पहले में उमड़-घुमड़कर आसमान में छायी थी और आज मैं पूर्ण रूप से बरसकर मिट गई। कहने का तात्पर्य यही है कि कवयित्री का इस संसार में कोई नहीं है। उसके संसार में होने या न होने पर किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता, रह जाती हैं तो केवल और केवल यादें, जिन्हें लोग याद करते हैं और पुलकित होते हैं। कवयित्री के भाग्य में केवल यही लिखा है कि कल वह संसार में आई थी और आज वह मिट जाएगी।

    विशेष -

    • यहाँ कवयित्री का जीवन के प्रति निराशावादी दृष्टिकोण स्पष्ट हुआ है।
    • मानव की इस जग में वस्तुस्थिति यही है कि आज है और कल नहीं होगा।
    • उत्प्रेक्षा, उपमा व अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
    • विप्रलम्भ श्रृंगार रस का प्रयोग किया गया है।
    • लाक्षणिकता का प्रयोग किया गया है।

    'मैं नीर भरी दुख की बदली' कविता के महत्‍वपूर्ण तथ्‍य

    🦆 'सांध्यगीत' कविता-संग्रह में संकलित कविता।

    🦆 'सांध्यगीत' में 1934 से 1936 के मध्य रचित उनकी कविताएँ संकलित ।

    🦆 बौद्ध दर्शन के दुखवाद, क्षणभंगुरता, मानवीय करुणा के भावों से प्रभावित कविता।

    🦆 कवयित्री अपनी पीड़ा को तो व्यक्त करती ही हैं, साथ ही विश्व की पीड़ा को भी अपने भीतर महसूस कर अभिव्यक्त करती हैं।

    🦆 'नीर भरी दुख की बदली' के माध्यम से कवयित्री ने स्व से पर की अपनी यात्रा को बड़ी खूबसूरती से अभिव्यक्त किया है। 

    🦆 कुछ विद्वानों ने इस कविता को विरह वेदना से तो कुछ ने इसे नारी-जीवन की पीड़ा से जोड़ा है।

    मैं नीरभरी दुःख की बदली' कविता के महत्‍वपूर्ण प्रश्‍नोउत्तर 

    प्रश्‍न 1. मैं नीर भरी दुख की बदली।' महादेवी वर्मा का उपयुक्त गीत उनके किस काव्य संग्रह से सम्बद्ध है?

    1. (A) नीहार
    2. (B) रश्मि
    3. (C) नीरजा
    4. (D) सांध्यगीत

    उत्तर - 4. सांध्यगीत


    प्रश्‍न 2. मैं नीर भरी दुख की बदली' का प्रतिपाद्य है -

    (A) इसमें रहस्यवादी ढंग से जीवन की नश्वरता की बात की गई है।
    (B) इसमें स्त्री के सामाजिक प्रदेय और श्रेय को रेखांकित किया गया है।
    (C) स्त्री का जीवन दुख में ही बीतता रहा है।
    (D) स्त्री अपने आँसुओं को व्यर्थ नहीं जाने देती है। वह उसी से नया सृजन करती रही है। नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर का चयन कीजिए :

    1. (A) और (C)
    2. (B) और (D)
    3. (A) और (B)
    4. (C) और (D)

    उत्तर - 4. (C) और (D)


    प्रश्‍न 3. महादेवी जी का वह काव्य संग्रह कौन सा है जिसमें उनके दार्शनिक विचार अधिक प्रौढ़ रूप में उभर कर आए हैं।

    1. रश्मि
    2. नीरजा
    3. सांध्य-गीत
    4. कामायनी

    उत्तर - 3.  सांध्य-गीत


    प्रश्‍न 4.  "मैं नीर भरी दुख की बदली" कविता का मुख्य विषय क्या है?

    1. प्रकृति का सौंदर्य
    2. व्यक्तिगत पीड़ा और संवेदना
    3. समाज में स्त्री की स्थिति
    4. आशावादी दृष्टिकोण

    उत्तर - 2. व्यक्तिगत पीड़ा और संवेदना


    प्रश्‍न 5. मैं नीर भरी दुख की बदली!' कविता में कितनी मात्रा की पंक्तियों का उपयोग हुआ है?

    1. 12
    2. 14
    3. 16
    4. 18

    उत्तर - 3. 16


    प्रश्‍न 6. कवयित्री महादेवी वर्मा अपने को 'नीर भरी दुख की बदली' क्यों कहती हैं?

    1. क्योंकि उनके आँसू बिना रुके बहते रहते हैं।
    2. क्योंकि वे केवल खुश रहने का प्रयास करती हैं
    3. क्योंकि वे सदा अपने प्रियतम के साथ होती हैं
    4. क्योंकि वे अपने दुःख को अन्यथा मानती हैं

    उत्तर - 1. क्योंकि उनके आँसू बिना रुके बहते रहते हैं।


    प्रश्‍न 7. कविता "मैं नीर भरी दुख की बदली" किस साहित्यिक शैली का उदाहरण है?

    1. रहस्यवादी शैली
    2. छायावादी शैली
    3. यथार्थवादी शैली
    4. प्रतीकवादी शैली

    उत्तर - 2. छायावादी शैली

    मैं नीर भरी दुख की बदली! कविता - महादेवी वर्मा


    मैं नीर भरी दुख की बदली!


    स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसा

    क्रन्दन में आहत विश्व हँसा

    नयनों में दीपक से जलते,

    पलकों में निर्झारिणी मचली!


    मेरा पग-पग संगीत भरा

    श्वासों से स्वप्न-पराग झरा

    नभ के नव रंग बुनते दुकूल

    छाया में मलय-बयार पली।


    मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल

    चिन्ता का भार बनी अविरल

    रज-कण पर जल-कण हो बरसी,

    नव जीवन-अंकुर बन निकली!


    पथ को न मलिन करता आना

    पथ-चिह्न न दे जाता जाना;

    सुधि मेरे आगन की जग में

    सुख की सिहरन हो अन्त खिली!


    विस्तृत नभ का कोई कोना

    मेरा न कभी अपना होना,

    परिचय इतना, इतिहास यही-

    उमड़ी कल थी, मिट आज चली!

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