साकेत 'साकेत' लिखने की प्रेरणा 'गुप्त' जी को महावीरप्रसाद द्विवेदी से मिली। इसे लिखने में उन्हें लगभग 15 वर्ष लगे । इसका प्रारम्भ 1916 ई. में तथा समाप्ति 1932 ई. में हुई । साकेत का नामकरण स्थान के आधार पर किया गया है। साकेत अयोध्या का ही दूसरा नाम है ।
गुप्त जी ने साकेत की रचना में अपना ध्यान स्थान पर ही केन्द्रित रखा है । घटनाओं का केन्द्र भी अयोध्या ही है। इस महाकाव्य में कथा कुल बारह सर्गों में विभक्त है । गुप्त जी ने साकेत में वैदर्भी काव्यात्मक गीति शैली का प्रयोग किया है । कवि ने अपना मूल ध्यान तो उर्मिला (लक्ष्मण की पत्नी) पर ही केन्द्रित किया है । चूँकि, उर्मिला काव्य में उपेक्षित रही है। किसी ने भी उस पर काव्य रचना का प्रयास नहीं किया ।साकेत महाकाव्य की व्याख्या
प्रथम सर्ग- देवी शारदा की स्तुति से काव्य आरम्भ । साकेत नगरी की भव्यता का वर्णन । राजा और प्रजा का पारस्परिक संबंध एवं सद्भावना, राजा दशरथ के पुत्र- राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का वर्णन । राजा दशरथ की एक मात्र अभिलाषा राम का शीघ्र राज्याभिषेक करना । रात्रि के अंतिम चरण और प्रभात-आगमन के समय लक्ष्मण द्वारा दाम्पत्य हास-परिहास के बीच राजमहल में नवीन वस्त्र धारण किए खड़ी उर्मिला को राम के राज्याभिषेक की सूचना देना ।
दूसरा सर्ग- राम के राज्याभिषेक की सूचना सुनकर मंथरा की उदासी और चिंता । मंथरा द्वारा कैकेयी के मन में संशय पैदा करते हुए कहना कि भरत जैसे भाई की अनुपस्थिति में राम का राज्याभिषेक । कैकेयी का क्रोध । दशरथ से वरदानस्वरूप राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास और भरत का राज्याभिषेक माँगना ।
तीसरा सर्ग- राम के चौदह वर्ष के वनवास और भरत के राज्याभिषेक की सूचना का राम और लक्ष्मण तक पहुँचना । राम की सहज स्वीकृति परन्तु लक्ष्मण का क्रोधाग्नि में जलना । लक्ष्मण के साथ वन जाने के प्रस्ताव को राम की स्वीकृति । दशरथ की बार-बार मूर्छा । राम की उन्हें सांत्वना ।
चौथा सर्ग- राम का माता को संपूर्ण घटना और निर्णय से अवगत कराना । कौशल्या का सीता के वन-गमन से अत्यधिक पीड़ित होना । राम का सीता को वन न जाने के लिए बहुत समझाना परन्तु सीता का न मानना और कहना –
अत्यंत मार्मिक प्रसंग क्योंकि यहाँ पर उर्मिला की स्थिति अत्यंत करुण एवं उपेक्षित । लक्ष्मण भाई और भाभी की सेवा के लिए उर्मिला को छोड़कर जा रहे हैं । उर्मिला का हाड़-मांस युक्त स्त्री के रूप में नहीं अपितु त्याग और समर्पण की देवी के रूप में चित्रित । कर्तव्य की महत्ता उसे महान बना देती है । वह अपनी भावनाओं को अपने अन्दर ही दफ़न कर मन को समझाती है- 'हे मन! तू प्रिय-पथ का विघ्न न बन ।'
पाँचवां सर्ग- राम, सीता और लक्ष्मण का वन-गमन । नगरवासियों की पीड़ा । माता कैकेयी के कुटिल-कर्म की निंदा । अयोध्या की सीमा को पार कर क्रमशः तमसा, गोमती और गंगा नदियों के तट पर पहुँचना । निषादराज द्वारा गंगा पार कराना । उसके बाद प्रयाग पार कर चित्रकूट पहुँचना ।
छठा सर्ग- विरहिणी उर्मिला की मूर्छित करुण दशा । । राजा दशरथ और रानियाँ शोक-संतप्त । सुमंत को अकेले लौटा देखकर राजा दशरथ की व्याकुलता में वृद्धि और मृत्यु ।
सातवाँ सर्ग-भरत और शत्रुघ्न की ननिहाल से वापसी । भरत किसी अमंगल की आशंका से बेचैन । महल में आकर सारी सूचनाएँ सुनकर भरत पर वज्रपात । भरत का स्वयं को अपराधी मानना और शोक के कारण अचेत होना । गुरु वशिष्ठ का भरत को धैर्य बँधाना । अगले दिन राजा दशरथ का दाह- संस्कार ।
आठवाँ सर्ग- चित्रकूट का दृश्य । राम का एक वृक्ष की छाया में पड़ी हुई शिला पर बैठना । भरत,शत्रुघ्न का आगमन । दोनों का दौड़कर राम,सीता के चरणों में लेटना । श्वेत वस्त्रों में माँ को देख कर राम का करुणा से चीत्कार करना । मुनि वशिष्ठ का उन सभी को धैर्य बँधाना । राम का दिवंगत पिता को श्रद्धांजलि अर्पण । कैकेयी का राम से अयोध्या लौटने का अनुरोध । शोक और आत्मग्लानि से परिपूर्ण कैकेयी । भरत का राम की चरण-पादुका लेकर अयोध्या लौटना । इस बीच सीता द्वारा लक्ष्मण एवं उर्मिला का कुटी में क्षणिक मिलन करवाना पर दोनों की अंतर्व्यथा अनभिव्यक्त ।
नवम सर्ग- साकेत के नवम सर्ग में उर्मिला की विरह-व्यथा की अभिव्यक्ति । नवम सर्ग की सम्पूर्ण कथा उर्मिला के अश्रुओं से गीली है । उर्मिला मन- मंदिर में आराध्य स्वामी की प्रतिष्ठा करके स्वयं आरती की ज्वाला बन कर जलती है ।
दशम सर्ग -उर्मिला का अतीत की स्मृतियों में डूबना ।
एकादश सर्ग- शत्रुघ्न द्वारा साकेत नगरी की व्यवस्थाओं का वर्णन । हनुमान द्वारा लक्ष्मण के शक्ति लगने और मूर्छित होने की कथा कहना ।
द्वादश सर्ग- भरत का सेना तैयार करना । उर्मिला का वीरोचित रूप । वशिष्ठ द्वारा युद्ध का दृश्य दिखाना । भरत मिलाप । उर्मिला और लक्ष्मण का पुनः मिलन ।
राम के चिर-परिचित आख्यान की नवीन प्रस्तुति ।
साकेत नवम सर्ग की व्याख्या
साकेत के नौवें सर्ग में उर्मिला के विरह का वर्णन किया गया है ।
- राजा जनक में संन्यासी और गृहस्थी दोनों के गुण विद्यमान थे । वे राजा भी थे, योगी भी थे और अनासक्त भी। उनकी चार पुत्रियाँ थीं- सीता, उर्मिला, मांडवी और श्रुतिकीर्ति । राम राजसिंहासन को त्यागकर और अयोध्या को तपोवन-सी बनाकर लक्ष्मण को साथ लेकर वन चले गए । भरत उनके प्रेम के कारण राजा होकर भी योगी का-सा जीवन बिताने लगे। सीता राम के साथ वन चली गई । विरह की अनन्त ज्वाला में उर्मिला ने अपने धर्म और मर्यादा का सदैव ध्यान रखा । अतः उसने अपने आदर्श और त्याग से उस कलंक को धो दिया, जो रानी कैकेयी ने अपने निन्दनीय कर्म से लगा दिया था ।
- लक्ष्मण के वन चले जाने पर उर्मिला विरह में पागल-सी हो गई । वह विरह-वेदना के कारण प्रियतम के प्रति व्याकुल हो गई है कि स्वयं को एकदम अनाथ और असहाय समझ बैठती है । वह तो सभी पदार्थों का भोग केवल इसलिए करना चाहती है, ताकि वह जीवित रहे और चौदह वर्षों की अवधि को पार करके अपने प्रियतम के दर्शन कर सके ।
- जब वह यह देखती है कि उसके दुःख को देखकर उसकी तीनों सासें बिलख पड़ती हैं, देवरों के सिर दुःख के कारण झुक जाते हैं और उसकी बहनें भी उसके दुःख से दुखी हैं, तो वह और भी अधिक दुःखी हो उठती है । अपनी दीन-हीन दशा पर उसे भारी व्यथा होती है, क्योंकि उसी के कारण तो परिवार के सारे जन दुःखी और व्याकुल हैं । वह शलभ को दीपक की लौ पर जलते देखती है, तो यही निष्कर्ष निकालती है कि प्रेम की पूर्णता दोनों ओर से प्रेम-पालन में ही होती है, जैसे कि पतंगे के साथ साथ दीपक भी जलता रहता है ।
- ग्रीष्म ऋतु की भीषणता भी उसकी विरह-वेदना को उद्दीप्त करती है । सब प्राणियों को प्यासे देखकर उसकी उदारता सजग हो उठती है, पर वह इससे विचलित नहीं होती, क्योंकि वह जानती है कि ग्रीष्म के ताप से ही फसलों में परिपक्वता आती है ।
- तत्पश्चात् वर्षा-ऋतु का प्रारम्भ होता है। आकाश में उमड़-घुमड़कर घोर विरहिणी घन छा जाते हैं और समूची पृथ्वी जल से भीगकर शीतल बन जाती है । पर विरहिणी उर्मिला को अपनी वेदना से फिर भी मुक्ति नहीं मिलती है । उर्मिला अपने प्रिय से मिलने के लिए इतनी आतुर है कि वर्षाकाल में उड़ते हुए खंजन उसे ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे उसके प्रियतम ने उधर मनभाये अपने नेत्र फिरा दिये हों; अर्थात् वे लौटकर वापस घर आ रहे हों ।
- वसन्त ऋतु में नवीन पुष्प खिल गए हैं, कोयल मधुर वाणी में गीत गाने लगी है, भौरों की टोलियाँ खिलती हुई कलियों पर मण्डराने लगी हैं । सर्वत्र सुषमा ही सुषमा बिखर गई है। वसन्त ऋतु में खिलती हुई कलियों को देखकर उर्मिला को अपने सुख-सम्पन्न दिनों की याद आ जाती है और वह सोचती है कि इन कलियों के समान वह भी कभी खिलती हुई और महकती हुई कली थी, पर अब उसे उसका प्रिय भ्रमर लक्ष्मण छोड़कर चला गया है । उसकी सभी आशा रूपी कलियाँ बिखर गई हैं। इसलिए उसे कोयल की कूक भी लू की तरह लगती है ।
- अपने अपार विरह में उर्मिला को अपने प्रियतम के हित का ध्यान सदा बना रहता है, इसलिए वह उन्हें रोककर अपने मन को संकीर्ण नहीं बनने देना चाहती । वह अपने रुदन को भी गीत के समान मधुर मानती है । कभी वह सोचती है कि अपने वनवास की अवधि पूर्ण करके उसके प्रियतम आ गए हैं, पर वह उनसे मिलने में संकोच कर रही है । वह यह भी स्वीकार करती है कि प्रभु की इच्छा के सम्मुख समर्पण कर देना ही मनुष्य का सबसे बड़ा पुरुषार्थ है । जिसने दुःख दिया है, वही सुख भी देगा, यही साकेत का मूल सार है ।
साकेत महाकाव्य की व्याख्या
साकेत महाकाव्य के कुछ प्रमुख पदों की व्याख्या इस प्रकार है -
(1)
सौ पुत्रों से अधिक जिनकी पुत्रियाँ पूतशीला,
त्यागी भी हैं शरण जिनके, जो अनासक्त गेही,
राजा-योगी जय जनक, वे पुण्यदेही, विदेही।
व्याख्या -
कवि गुप्त जी राजा जनक के विलक्षण गुणों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि राजा जनक की जय हो, जिन्होंने अपनी पवित्र लीला को दो वंशों (रघु व निमि) में प्रकट कर अपने अद्भुत गुणों से गौरवान्वित किया । तात्पर्य यही है कि राजा जनक ने अपनी पुत्रियों का विवाह रघुवंश में करके अपने दोनों वंशों का गौरव बढ़ा दिया । इस योगी जनक की शीलवान पुत्रियाँ सौ पुत्रों से भी अधिक अपने वंश के गौरव को बढ़ाने वाली हैं । त्यागी पुरुष भी जनक की शरण में आश्रय पाते हैं, जो अनासक्त होकर भी गृहस्थी हैं, गृहस्थ धर्म का पालन करते हैं, वे राजा जनक योगी हैं, अत्यन्त धर्मात्मा है तथा सांसारिक विषयों से विमुख होने वाले हैं ।
विशेष -
- प्रस्तुत पद्यांश मंगलाचरण है ।
- व्यतिरेक अलंकार, यमक तथा विरोधाभास का प्रयोग है ।
(2)
कठिन है कविते, तब भूमि ही, पर यहाँ श्रम भी सुख-सा रहा।
व्याख्या -
गुप्त जी कहते हैं कि वे समय रहते राम की वन्दना न कर सके । अपनी इस दशा पर प्रायश्चित करते हुए कवि कहते हैं कि मुझे खेद है कि मेरा जीवन असफल होकर व्यर्थ हो गया जो मैं श्री राम के युगल चरण की वन्दना न कर सका । मैं उन पगों को जल से पखारकर अपनी कविता के दो पदों को रसयुक्त भी न बना पाया । हे कविते! तुम्हारी भूमि कठिन है। ऐसे महान् काव्य की रचना कठिन नहीं है । काव्य प्रतिभा न होते हुए भी मुझे श्रम से काव्य की रचना करने में वही सुख प्राप्त हो रहा है, जो काव्य प्रतिभा होने पर कविता रचने में होता ।
विशेष -
- यहाँ इस कविता के द्वारा कवि की शालीनता प्रकट हो रही है ।
- श्लेष अलंकार तथा धर्मलुप्तोपका अलंकार है ।
(3)
भरत ने उनके अनुराग से, भवन में वन का व्रत ले लिया!
व्याख्या -
अयोध्या को त्याग से अपनाकर राम ने वन को भी तपोवन के समान दुःख देने वाला बना दिया । भाव यह है- राम ने सहर्ष राजसिंहासन का त्याग कर दिया । उनके इस अपूर्व त्याग ने अयोध्यावासियों को बहुत अधिक प्रभावित किया । इस प्रकार अपने त्याग के द्वारा राम ने अयोध्यावासियों का हृदय जीत लिया और भरत ने राम के प्रेम के कारण राजभवन में रहकर भी वन का व्रत ले लिया अर्थात् वे राजभवन में रहकर भी वन-निवासी योगियों का-सा जीवन बिताने लगे ।
विशेष -
- उर्मिला के विरह का वर्णन करने से पूर्व कवि पृष्ठभूमि के रूप में उन घटनाओं का उल्लेख कर रहा है, जो उसके विरह का कारण बनीं । यद्यपि इन घटनाओं का सविस्तार वर्णन पिछले सर्गों में हो चुका है, तथापि इनका यहाँ पर पुनः उल्लेख इसलिए आवश्यक समझा गया है जिससे कि उर्मिला का विरह और अधिक प्रभावशाली बन जाए ।
- "अवध को अपनाकर त्याग से" में लक्षणा शब्द-शक्ति है, क्योंकि 'अवध' से तात्पर्य 'अवध-निवासियों' से है । विरोधाभास और यमक अलंकार का प्रयोग है।
(4)
और पाकर ताप उसके प्रिय-विरह-विक्षेप से,
वर्ण-वर्ण सदैव जिनके दो विभूषण कर्ण के,
क्यों न बनते कविजनों के ताम्रपत्र सुवर्ण के ?
व्याख्या -
कवि उर्मिला का विरह वर्णन करते हुए कहता है कि जिस प्रकार संजीवनी नामक जड़ी के रस का लेप करने से और उसे रासायनिक रीति से तपाने से ताँबा सोना बन जाता है, जिसके अनेक आभूषण बनाकर कानों में पहने जाते हैं, जो बहुत ही सुन्दर प्रतीत होते हैं, उसी प्रकार रात-दिन बिलखने वाली विरहिणी उर्मिला के आँसुओं के रस के लोप से और लक्ष्मण के विरह से उत्पन्न भावोन्माद के सन्ताप से कवियों का एक-एक अक्षर कानों को सुखद प्रतीत होगा । कहने का तात्पर्य यह है कि उर्मिला के सात्विक और आदर्श विरह में वह शक्ति है कि यदि कोई कवि इसका वर्णन करे तो उसकी रचना स्वयमेव सरस और रमणीय बन जाती है । अतः उर्मिला का विरह सामान्य विरहिणी का विरह नहीं है, वरन् उस आदर्श नारी का विरह है, जो साधारण कवियों की कविता को भी सहज ही असाधारणता प्रदान कर देती है ।
विशेष -
- कला पक्ष का अतिशय प्रभाव भाव पक्ष पर भारी पड़ा है।
- श्लेष और काकुवक्रोक्ति अलंकार का प्रयोग है ।
(5)
अपूर्व आलाप वही हमारा, यथा विपंची-दिर दार दारा।
व्याख्या -
गुप्त जी यहाँ उर्मिला की विवशता तथा उसके विरह के महत्व का वर्णन करते हुए कहते हैं कि अभी प्रियतम से मिलन दूर था, क्योंकि वे अभी चौदह वर्ष के लिए वन गए हुए हैं । ऐसी स्थिति में केवल विलाप ही उर्मिला के वश में था । जैसे 'दिर, दार, दारा' आदि स्वर वीणा से निकलकर अपूर्ण करुण रस की रचना करते हैं उसी प्रकार उर्मिला का विलाप ही उसका अपूर्ण आलाप है ।
विशेष -
- कवि का यह मानना है कि वियोग से ही सफल गीत की रचना होती है ।
- विरोधाभास तथा ध्वन्यार्थव्यंजना अलंकार का प्रयोग है ।
(6)
जाऊँगी कैसे भला देकर यह निःश्वास?
कहाँ जायेंगे प्राण ये लेकर इतना ताप?
प्रिय के फिरने पर इन्हें फिरना होगा आप।
व्याख्या -
विरह से पीड़ित उर्मिला अपनी सखी से कहती है कि मैं अयोध्या में हर्ष और उल्लास लेकर आई थी अर्थात् जब मैं यहाँ दुल्हन के रूप में आई थी, तो मेरे हृदय में ही हर्ष और उल्लास की भावनाएँ नहीं थीं, वरन् मेरे ससुर के परिवार वालों के मन में भी ये ही भावनाएँ थीं । अब भला इन लोगों को निराश और दुःख देकर मैं कैसे मर सकती हूँ अर्थात् मैं नहीं चाहती कि इस विरह-दुःख से मेरा प्राणान्त हो जाए और मेरे परिवार के जनों को अपार दुःख हो अर्थात् मैं इस विरह-दुःख को अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ सहन करूँगी । विरह का इतना दुःख लेने पर तो मेरे प्राण मरकर भी शान्ति नहीं पा सकते, क्योंकि यदि ये मर भी गए तो प्रियतम के लौटने पर इन्हें फिर से लौटना पड़ेगा ।
विशेष -
- अपने प्रियतम के प्रति उर्मिला की गहन आस्था स्पष्ट हुई है ।
- मरकर भी पुनः मिलने की आशा में करुण विप्रलम्भ होता है। अतः यहाँ करुण विप्रलम्भ अलंकार है ।
(7)
कहते हैं घन क्या ही घोर !
नाच नाच गाते हैं मोर,
उठती है गहरी गुंजार,
ओ गौरव-गिरि, उच्च-उदार !
व्याख्या -
चित्रकूट की सुन्दरता के विषय में वर्णन करती हुई उर्मिला कहती है कि 'हे चित्रकूट! जब तेरे चारों ओर घिरकर बादल गरजते हैं वह गर्जन बहुत ही सुहावना प्रतीत होता है । उस गर्जन को सुनकर चारों ओर मोर नाचने लगते हैं। भौरे गहरे गुंजायमान करने लगते हैं । हे चित्रकूट तुम महान् गौरवशाली और बड़े ही उदार हो ।
विशेष -
- प्रकृति का मानवीकरण किया गया है ।
- पुनरुक्ति अलंकार का प्रयोग है (नाच नाच गाते हैं मोर) ।
साकेत के महत्वपूर्ण तथ्य
⭐‘साकेत’ महाकाव्य 1931 ई० में प्रकाशित । साकेत के सृजन में 16 वर्ष (1912-13 से 1929) का समय लगा।
⭐ सर्गबद्ध (कुल सर्ग 12) प्रबंधात्मक रचना ।
⭐ मैथिलीशरण गुप्त को आधुनिक काल का तुलसी स्वीकार किया गया है ।
⭐ काव्य की भाषा खड़ीबोली ।
⭐साकेत का कथानक रामकथा पर आधारित किंतु रामकथा का वर्णन करना कवि का उद्देश्य नहीं ।
⭐ साकेत का मुख्य उद्देश्य रामकथा में उपेक्षित स्त्री-पात्रों, विशेषकर उर्मिला के व्यक्तित्व के अनछुए पक्ष को अभिव्यक्त करना है ।
⭐ श्री राम के प्रति अपनी अनन्य भक्ति को अभिव्यक्त करना भी कवि का उद्देश्य-
- राम तुम्हारा वृत्त स्वयं ही एक काव्य है,
- कोई कवि बन जाय सहज संभाव्य है।
⭐साकेत के प्रेरणा स्रोत निबंध – रवीन्द्रनाथ टैगोर कृत 'काव्येर उपेक्षिता' एवं महावीरप्रसाद द्विवेदी कृत 'कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता'
⭐रवीन्द्रनाथ टैगोर-"संस्कृत साहित्य में काव्य-यज्ञशाला की प्रान्त-भूमि में जो कितनी ही नारियाँ अनादृत होकर खड़ी हैं, उनमें प्रधान स्थान उर्मिला का है । हाय! अव्यक्त वेदना-देवी उर्मिला, एक बार तुम्हारा उदय प्रातःकालीन तारा की भाँति महाकाव्य के सुमेरु-शिखर पर हुआ था । उसके बाद अरुण-लोक में तुम्हारे दर्शन नहीं हुए । कहाँ तुम्हारा उदयाचल है और कहाँ अस्ताचल -यह प्रश्न करना भी सब भूल गए ।"
साकेत के संबंध में विद्वानों के महत्वपूर्ण कथन
डॉ. नगेन्द्र - "साकेत जीवन काव्य है । उसमें एक व्यक्ति का जीवन अनेक अवस्थाओं और व्यक्तियों के बीच अंकित है ।"
डॉ. नगेन्द्र - "साकेत में गुप्त जी के कवि-जीवन का पूर्ण वैभव मिलता है । अतः उसका कलेवर अलंकृत है । उसमें शकुंतला का वन्य-सौन्दर्य नहीं, उर्वशी का नागरिक-विलास है । यहाँ उनकी प्रतिभा ने कविता नयी- नयी श्रृंगार-सामग्री से चित्र-विचित्र सजाया है ।"
शिवदान सिंह चौहान –"साकेत रचकर गुप्त जी ने महाकाव्यों की परम्परा में युगांतर स्थापित कर दिया ।
डॉ. धीरेन्द्र वर्मा –"नवम सर्ग को एक नन्हा सूरसागर समझना चाहिए। एक नया गोपिका-विरह सामने आता है।"
डॉ. वासुदेवनंदन प्रसाद –"वास्तव में उर्मिला वेदना और मंगल-कामना की जीती-जागती तस्वीर है। उसे जीवन से बाहर प्राचीन विरहिणियों की कोटि में रखकर देखना उचित नहीं। उसका तप और त्याग अनुकरणीय है। उसके चरित्र- निर्माण में नैतिकता, धर्म-समाज, आदर्श और राष्ट्रीय- चेतना का समावेश है।"
आचार्य नंददुलारे वाजपेयी - “साकेत महाकाव्य ही नहीं यह आधुनिक हिन्दी का युग प्रवर्तक महाकाव्य है।”
साकेत महाकाव्य से संबंंधित महत्वपूर्ण प्रश्न
1. निम्नलिखित में से कौनसी कृति गुप्त जी की प्रबंध-कृति है?
2. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान मैथिलीशरण गुप्त की कौनसी कृति लोकप्रिय हुई?
3. मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी प्रारंभिक कविताएँ किस भाषा में लिखीं?
4. मैथिलीशरण गुप्त को राष्ट्र कवि की पदवी किसके द्वारा प्रदान की गई?
5. 'साकेत' जैसी अनुपम कृति के लिए मैथिलीशरण गुप्त को निम्नलिखित में से कौनसा सम्मान प्राप्त हुआ?
6. 'साकेत' कृति की रचना के मूल में कवि का क्या उद्देश्य है?
7. 'साकेत' महाकाव्य की भाषा है –
8. 'साकेत' में कुल कितने सर्ग हैं?
9. 'साकेत' के मूल में किसकी प्रेरणा निहित रही?
10. 'साकेत' के सृजन में कवि को कितने वर्ष का समय लगा?


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