कामायनी – जयशंकर प्रसाद का अमर महाकाव्य | प्रतीकात्मकता, विषयवस्तु और सारांश

 ‘कामायनी’ जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित हिंदी साहित्य का अमर महाकाव्य है, जो मानव जीवन की भावनाओं, विचारों और मनोभावों का अद्भुत प्रतीकात्मक चित्रण प्रस्तुत करता है। इसमें श्रद्धा, इड़ा, मनु जैसे पात्रों के माध्यम से मानव सभ्यता की विकास यात्रा को दर्शाया गया है। इस लेख में कामायनी का सारांश, विषयवस्तु, प्रतीकात्मकता और कवि प्रसाद की काव्य दृष्टि का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत है।

    कामायनी जयशंकर प्रसाद

    कामायनी – जयशंकर प्रसाद

    कामायनी हिंदी भाषा का एक महान महाकाव्य है, जिसके रचयिता प्रसिद्ध कवि जयशंकर प्रसाद हैं। इसे आधुनिक छायावादी युग की श्रेष्ठ और प्रतिनिधि रचना माना जाता है। यह प्रसाद जी की अंतिम काव्य-कृति है, जो सन् 1935 ई. में प्रकाशित हुई। हालांकि, इसका लेखन कार्य लगभग 7–8 वर्ष पहले ही शुरू हो गया था।

    यह महाकाव्य कुल 15 सर्गों में विभाजित है, जो ‘चिंता’ से आरंभ होकर ‘आनंद’ पर समाप्त होते हैं। इसमें मानव मन की विविध भावनाओं और वृत्तियों को क्रमिक रूप से प्रस्तुत किया गया है। इस कारण यह कृति केवल काव्यात्मक सौंदर्य ही नहीं, बल्कि मानव जीवन के आरंभ से लेकर अब तक के मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक विकास का चित्रण भी करती है।

    कलात्मक दृष्टि से ‘कामायनी’ छायावादी काव्यकला का श्रेष्ठतम उदाहरण है। इसमें मानव चित्त की विभिन्न वृत्तियों को पात्रों के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जैसे—लज्जा, सौंदर्य, श्रद्धा और इड़ा। इनका मानवीकरण हिंदी साहित्य को एक अनुपम धरोहर प्रदान करता है।

    ‘कामायनी’ की दार्शनिक पृष्ठभूमि प्रत्यभिज्ञा दर्शन पर आधारित है, साथ ही इसमें अरविन्द दर्शन और गांधी दर्शन की झलक भी मिलती है।

    कामायनी के सर्ग (अध्यायों) 

    कामायनी 15 सर्ग (अध्यायों) का महाकाव्य है। ये सर्ग निम्नलिखित हैं-

    कामायनी के 15 सर्ग :

      1. चिन्ता
      2. आशा
      3. श्रद्धा
      4. काम
      5. वासना
      6. लज्जा
      7. कर्म
      8. ईर्ष्या
      9. इड़ा (तर्क, बुद्धि)
      10. स्वप्न
      11. संघर्ष
      12. निर्वेद (त्याग)
      13. दर्शन
      14. रहस्य
      15. आनन्द

    कमायनी के संबंध में विद्वानों के कथन

    डॉ नागेन्द्र के अनुसार - कामायनी मानव चेतना का महाकाव्य है। यह आर्ष ग्रंथ है।

    गजानन माधव मुक्तिबोध ने कामायनी को फेंटेसी रचना कहा कहा है। 

    नन्ददुलारे वाजपेयी कहते है कि कामायनी नये युग का प्रतिनिधि काव्य है।

    रामधारी सिंह ‘दिनकर’: कामायनी आधुनिक सभ्यता का प्रतिनिधि महाकाव्य है।

    डॉ नगेन्द्र के अनुसार : कामायनी समग्रतः में समासोक्ति का विधान लक्षित करती है।

    हजारी प्रसाद दिवेदी : कामायनी वर्तमान हिन्दी कविता में दुर्बल कृति है।

    आचार्य रामचंद्र शुक्ल : कामायनी में प्रसाद ने मानवता का रागात्मक इतिहास प्रस्तुत किया है। जिस प्रकार निराला ने तुलसीदास के मानस विकास का बड़ा दिव्य और विशाल रंगीन चित्र खिंचा है।

    कामायनी पर लिखे गये ग्रन्थ

    जयशंकर प्रसाद – नन्द दुलारे वाजपेयी

    कामायनी एक पुनर्विचार – मुक्तिबोध

    कामायनी का पुनर्मूल्यांकन – रामस्वरुप चतुर्वेदी

    कामायनी की विशेषताएं

    कामायनी हिंदी साहित्य के छायावादी युग का एक प्रमुख महाकाव्य है, जिसकी रचना जयशंकर प्रसाद ने की थी। यह आधुनिक हिंदी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में से एक मानी जाती है। इसकी प्रमुख भाव पक्षीय तथा कला पक्षीय विशेषताएं निम्‍न लिखित है: - 

    भावपक्षीय विशेषताएं -

    प्रसाद के काव्य का भावपक्षी विशेषताए इस प्रकार है।

    1. प्रकृति चित्रण :- मानवीय सौंदर्य के चित्रण के साथ ही साथ प्रसाद प्रकृति सौंदर्य के चित्रण में भी कुशल है लहर में सूर्योदय का एक सुंदर चित्रण इस प्रकार है

    अंतरिक्ष में अभी सो रही है उषा मधुबाला । 
    अरे खुली भी नहीं अभी तो प्राची की मधुशाला ॥ 

    प्रकृति की मानवीकरण इस पंक्ति में दृष्टव्य है बीती विभावरी जाग री। अंबर पनघट में डुबो रही तारा घट उषा नागरी। तू अब तक सोई है अली आंखों में भारी विभाग री।

    2. सौंदर्य निरूपण :- सौंदर्य अनुभूति प्रसाद के काव्य की प्रमुख विशेषताएं उनके लहर आंसू और कमानी आदि काव्य में सौंदर्य के अभिन्न चित्रण चित्र प्राप्त होते हैं प्रसाद जी मानव सौंदर्य के बहुत बड़े प्रशंसक है कामायनी में मनु और श्रद्धा के सौंदर्य का वर्णन अनेक स्थलों पर बड़ा ही

    आकर्षण बन पड़ा है मनु के सौंदर्य का वर्णन करते हुए वह कहते हैं और वह मुख्य पश्चिम के व्यंग बीच जब गिरते हो घनश्याम अरुण रवि मंडल उनका भेद दिखाई देते हो छवि धाम

    3. मानवतावादी दृष्टिकोण :- प्रसाद के काव्य में मानवतावादी विचार की विजय दिखाई दिखाई पड़ती है प्रसाद जो और जिन जियो और जीने दो के सिद्धांत को मानने वाले हैं

    वे यथार्थ व व्यवहार और व्यवहार है उनका व्यवहार और उनका चिंतन समग्र मानव जीवन मानव सहज शारीरिक शारीरिक मानसिक क्षमता और मानव की मूल आदर्श प्रिया तीनों के सामंजस्य से तैयार हुआ है फिर इस चिंतन को उन्होंने अधिकांश साहित्य या कल की मांग के अनुसार भाव और रस के से परिधि परिणत कर एक स्वस्थ तृप्तिकारी संजीवनी के रूप में प्रस्तुत किया है

    4. नारी की माता का प्रकाश :- प्रसाद के पूर्व रीतिकाल में नारी के प्रति बाद ही दिन और सब कुछ दृष्टिकोण था प्रसाद जी ने अपने काव्य में नारी को महत्व प्रदान की और उसे श्रद्धा की साक्षात प्रतिमा कहा

    प्रसाद के अमर महाकाव्य कामायनी की नई का श्रद्धा भी इसी कोठी की नई है वह श्रद्धा गया विश्वास त्याग सौंदर्य एवं विश्व बंधुत्व का मूर्ति मां प्रतीक है वास्तव में श्रद्धा के रूप में प्रसाद ने अपनी नारी विषयक दृष्टिकोण को विशद रूप में अंकित किया है

    नारी! तुम केवल श्रद्धा हो
    विश्वास-रजत-नग पगतल में।
    पीयूष-स्रोत-सी बहा करो
    जीवन के सुंदर समतल में।

    प्रसाद जी नारी के मंगल के रूप के उपासक है और उसे जीवन में इतना महत्वपूर्ण मानते हैं कि न केवल भौतिक अपितु आध्यात्मिक आनंद का मार्ग भी वही दिखाई दिखती है कामायनी के रहस्य में स्वर्ग के समस्त रहस्य की व्याख्या श्रद्धा की ही करती है।

    5. रस योजना :- प्रसाद जी की रचनाओं में रस परिपक्व का गौर स्थान है भावों तथा कलाओं के बुद्धि ग्रस्त बुद्धिगम्य ना हो के होना होने के कारण रस परिपक्व में बड़ा बड़ा पर पड़ी है फिर भी रस परिपक्व की दृष्टि से प्रसाद के काव्य में श्रृंगार शांत तथा करुण रस की प्रधानता है

    कला पक्षीयविशेषताएं -

    प्रसाद के काव्य में कला पक्षीय विशेषताओं संक्षिप्त में इस प्रकार है।

    1. भाषा :- प्रसाद की भाषा के दो रूप हैं व्यावहारिक एवं संस्कृति निश्चित प्रारंभिक रचनाओं में व्यावहारिक व्यावहारिक भाषा का प्रयोग किया गया है किंतु जैसे प्रभाव की गंभीरता बड़ी है उनकी भाषा संस्कृत निष्ठ हो गई है वस्तुतः उनकी भाषा संस्कृत के तत्सम शब्दों से युक्त है फिर भी उसमें प्रसाद का माधुरी है व्यवहारों एवं मुहावरों तथा कथाओं का भी सर्वाथा प्रभाव ही है शब्द चयंत श्रेष्ठ है एक-एक शब्द नागिन की तरह जडा है तथा भाव का विषय के अनुकूल है।

    प्रसाद जी ने शब्द निर्माण का कार्य विशेष रूप से किया है शब्दों के संक्षिप्त कारण पर उनकी विशेष दृष्टि थी।

    2. शैली :- उनकी काव्य शैली सर्वदा नवीन है वह अपनी शैली के स्वयं निर्माता है उनकी शैली रस स्वाभाविक प्रभाव पूर्ण एवं संवेदनशील है गीत गीतात्मक शैली में लिखे गए हैं अभिव्यांजनों को सरस बनाने के लिए शैली को अपनाना पड़ता है और उसका स्वरूप विषय के अनुकूल हो ही होना चाहिए काव्य में प्रसाद का मधु एवं माधुर्य गुना से संबंधित सामान्य को विशेष प्रधान स्थान मिला है

    3. अलंकार योजना :- प्रसाद भाव शिल्पी है इस कारण उनके काव्य में अलंकारों का गौर स्थान है प्रसाद के काव्य में प्रयुक्त अधिकांश अलंकार उपमा उत्प्रेक्षा और रूपक आदि हैं उनके उपमान बिल्कुल नवीन है इससे अलंकार योजना में एक अनूठापन आ गया है।

    4. छंद विधान :- प्रसाद जी ने अपने आरंभ रचना 'घनाचारी 'में लिखा है कि बाद की खड़ी बोली की रचनाओं में अतुकांत छंद का प्रयोग किया गया है। कामायनी में रोल, छंदों का प्रयोग किया गया है।

    कामायनी - 'श्रद्धा' सर्ग का सारांश

    जब मनु चिन्तित और किसी के प्रति अन्तः पिपासा (प्यास) से व्याकुल थे, तभी सामने से एक नारी के मुख से निकला मधुर प्रश्न सुनाई पड़ता है "अरे संसार-समुद्र के इस तट पर तरंगों से फेंकी हुई मणि की भाँति तुम कौन हो? मनु का हृदय मधुर रस से भर गया। सामने देखते हैं तो गान्धार देश के मुलायम भेड़ों के चर्म से कमी हुई एक सुन्दर बाला खड़ी है। मनु ने पूछा कि तुम कौन हो?

    प्रत्युत्तर में वह बाला कहती है कि "मैं ललित कलाओं को सीखने की उत्सुकता वश इधर-उधर घूमा करती थी। मन में कौतूहल जाग्रत था और मैं हृदय से सुन्दर सत्य को खोज रही थी। घूमती हुई हिमगिरि पर पहुँच गई और धीरे-धीरे पैर ऊपर बढ़ते गए तथा शैलमालाओं का यह श्रृंगार देखकर आँखों की भूख मिट गई।

    मैं यहीं रहने लगी। एक दिन अपार सिन्धु उमड़कर पहाड़ से टकराने लगा और यह अकेला जीवन निरुपाय ही बच गया। इधर से निकलते हुए आज मैंने यहाँ बलि का कुछ अन्न देखा तो जीवों के कल्याण की बिन्ता में रत यह दान देखकर समझी कि अभी कोई प्राणी जीवित बचा है। हे तपस्वी तुम इतने थके व्यथित और हताश क्यों हो रहे हो? मनु विवाद के साथ बोले, " तुम्हारी ये बातें मन में उत्साह की तरंगें उत्पन्न करती हैं, किन्तु जीवन कितना निरुपाय है? श्रद्धा के बहुत स्नेह से जीवन की महत्ता एवं प्रकृति के नियम के बारे में समझाने से मनु जीवन के प्रति आशावान हो जाते हैं। इसी श्रद्धा को प्रस्तुत महाकाव्य में 'कामायनी' कहा गया है। श्रद्धा रति-पति काम की पुत्री हैं।

    कामायनी - 'लज्जा' सर्ग का सारांश

    चाँदनी रात है। मनु ने श्रद्धा को देखकर अत्यन्त प्रेमपूर्ण उद्‌गार व्यक्त किया। मनु के अत्यन्त कोमल और आन्तरिक उद्‌गारों से श्रद्धा प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाती। इस सर्ग में श्रद्धा और लज्जा का आपसी वार्तालाप वर्णित है। यहाँ श्रद्धा के समर्पित भाव के बीच में अचानक कुछ भाव उपस्थित हो जाता है। उसी के मानवी रूप को कवि ने 'लज्जा' कहा है। इसके आने पर श्रद्धा की स्थिति बदल जाती है। वह कौतूहल में भर उसे पूछती है, फिर लज्जा उत्तर देती है। अन्त में लज्जा उसे महत्त्वपूर्ण सीख देती है। इस सर्ग में पग-पग पर मनोभावों को मूर्त रूप दिया गया है। अतः इस पूरे सर्ग की वायवीय स्थिति होने पर भी प्रसाद ने अत्यन्त रमणीय एवं मनोरम प्रस्तुति की है।

    लज्जा का स्वरूप पहले पहल अस्पष्ट है। पर मन में भर जाने से उसमें परिवर्तन हो रहा है। श्रद्धा इसे समझ नहीं पाती। अतः पूछ रही है- तुम कौन हो? मेरा सारा शरीर रोमांच से भर रहा है। अंग-अंग मोम की तरह कोमल हो रहा है। पलकें मेरी झुक रही हैं। मनु को छूने में भी झिझक हो रही है। अजब-सी परवशता भर रही है। मैं कुछ भी करने में स्वतन्त्र नहीं।

    यह सुनकर लज्जा उसे समझा रही है। मेरे आने से इतना चमत्कृत होने की जरूरत नहीं। मेरे कारण स्त्रियों के स्वेच्छाचारिणी होने पर अंकुश लगता है। प्रेम पथ पर आगे जाने से पहले कुछ विचार कर लो, यौवन तो दूर तक बहा ले जाएगा, बड़ी शक्ति है इसमें। पर मैं रोक कर सदाचार का मार्ग दिखाती हूँ। मर्यादा में रहने की ओर संकेत देती रहती हूँ।

    यह सुनकर श्रद्धा कहती है- मैं तुम्हें समझ रही हूँ। अब बोलो कि कौन सी राह ठीक है? नारी होने के नाते स्वभावतः दुर्बल हूँ। मेरा मन कमजोर हो रहा है। मुझे पुरुष पर विश्वास कर उसका आश्रय पाने में जीवन सार्थक लगता है। अतः मैं मनु के आगे सर्वस्व समर्पित करना चाह रही हूँ। बदले में कुछ पाने की आकांक्षा नहीं। अब लज्जा समझ रही है कि श्रद्धा को कुछ भी नहीं समझाया जा सकता। इसमें समर्पण का भाव जम गया। इसने पहले पूरा सोच-विचार नहीं किया। अब तो चाहे जो समस्या आए, सर्वस्व अर्पण कर न्यौछावर करना होगा। जीवन का यही मार्ग है। तभी जीवन पथ सुन्दर समतल होकर अमृत स्रोत की तरह प्रवाहित होगा।

    कामायनी- 'इड़ा' सर्ग का सारांश

    श्रद्धा को छोड़ने के पश्चात् मनु अपरिभाषित सुख की खोज में वन-वन भटकते हैं। घूमते हुए वे एक उजड़े नगर में पहुंच जाते हैं। पास ही वेग वती सरस्वती नदी बह रही थी। प्रत्यय की स्मृतियाँ मनु को दुःखी कर रही थी और चारों ओर सारस्वत प्रदेश थमा सा पड़ा था। मनु को याद आया कि जीवन के नए विचारों को लेकर सुर-असुरों में युद्ध चल रहा था। एक दीन देह को पूजता था तो दूसरा अहंकार में अपने को कुशल समझ रहा था। दोनों ही विश्वासहीन थे।

    स्वयं को मनु श्रद्धा विहीन जानकर उदास हो गए। तभी उनके कानों में काम की ध्वनि सुनाई पड़ी कि मनु तुम श्रद्धा को भूल गए? तुमने उस पूर्ण आत्म-विश्वासमयी को रूई सा हल्का समझ उड़ा दिया। तुमने वासना की तृप्ति को ही स्वर्ग मानकर स्त्री को केवल भोग की वस्तु माना और उसका अपमान कर दिया। तुम भूल गए कि पुरुषत्व के मोह व अहंकार के कारण नारी की भी सत्ता है। यह वाणी मनु को शूल के समान चुभ रही थी। वे सोचने लगे कि काम के कारण ही मैं इस भ्रम जाल में फंसा था, जिससे मेरी सुख शान्ति चली गई। मनु के अन्दर अन्तर्द्वन्द्व चल रहा था। उधर काम फिर मनु को भला-बुरा कहता है तथा सारी गलती मनु की ही मानता है, लेकिन मनु अहंकार वंश अपनी गलती स्वीकार नहीं करते। काम उन्हें शाप देता है कि अब तुम्हारे मस्तिष्क और हृदय दोनों एक-दूसरे के विपरीत हो जाएँगे।

    इतने में सूर्योदय हो जाता है और वहाँ एक सुन्दर बाला प्रकट होती है, जो अत्यन्त ही सुन्दर और कोमल थी। उसके हाथ में एक कर्म कलश था तथा दूसरे हाथ में विचारों के नभ को अवलम्बन दिया था। मनु उससे उसका परिचय पूछते हैं। वह अपना नाम इड़ा बताती है। इड़ा मनु को कहती है कि यह मेरा सारस्वत प्रदेश है, जो उजड़ चुका है। मैं इस आशा में यहाँ पड़ी हूँ कि कोई आकर इसके पुनर्निर्माण में मेरी सहायता करे। मनु संसार को नश्वर बताकर इड़ा को समझाते हैं कि यह सारी सृष्टि नाशवान परन्तु मनुष्य फिर भी मूर्थों की तरह इसे सृष्टि समझ बैठता है। इड़ा मनु को सांत्वना देती है और कहती है कि मनुष्य को अपने सुख की प्राप्ति के लिए बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए। इड़ा मनु को अपनी बुद्धि के अनुसार सारस्वत नगर का शासन सम्भालने के लिए कहती है। इड़ा की प्रेरणा दायिनी वाणी सुनकर मनु के हृदय में नवस्फूर्ति का संचार होता है और वे अपने कर्म में लीन हो जाते हैं तथा सारस्वत नगर के पुनर्निर्माण का कार्य अपने हाथों में लेते हैं।

    कामायनी का महाकाव्यत्व

    'श्रद्धा' सर्ग के कुछ पदों की व्याख्या

    कौन तुम संसृति जल निधि तीर, 
    तरंगों से फेंकी मणि एक। 
    कर रहे निर्जन का चुपचाप, 
    प्रभा की धारा से अभिषेक ।। 
    मधुर विश्रांत और एकान्त, 
    जगत का सुलझा हुआ रहस्य। 
    एक करुणामय सुन्दर मौन, 
    और चंचल मन का आलस्य।।

    व्याख्या -

    निर्जन स्थान में मनु को बैठे हुए देखकर श्रद्धा कहती है कि जिस प्रकार समुद्र की लहर किसी मणि को उछालकर किनारे पर फेंक देती है और वह उस सुनसान स्थान को अपनी चमक से जगमगा देता है, उसी तरह इस एकान्तिक स्थान में तुम कौन हो, जो इस स्थान को अपनी सुन्दरता से सुशोभित कर रहे हो? श्रद्धा आगे कहती है कि तुम इस मधुर और एकान्त स्थान पर इस जगत के सुलझे हुए रहस्य के समान लग रहे हो। अर्थात् प्रलय के बाद इस संसार में कौन शेष है, यह तुम्हें देखकर इस रहस्य का भेद खुल रहा है। तुम बहुत ही सुन्दर हो और तुम्हारा यह शान्त रहना मेरे मन में करुणा को जगा रहा है। तुम्हारे चंचल मन में आलस्य का समावेश प्रतीत हो रहा है।

    विशेष -

    • सम्पूर्ण पद में लाक्षणिकता का प्रयोग किया गया है।
    • 'तरंगों से फेंकी मणि एक' में रूपकातिशयोक्ति अलंकार है।
    • 'चंचल मन का आलस्य' में विरोधाभास अलंकार है।
    • उक्ति वक्रता और लालित्य का समावेश हुआ है।

    और देखा वह सुन्दर दृश्य, 
    नयन का इन्द्रजाल अभिराम। 
    कुसुम-वैभव में लता समान, 
    चन्द्रिका से लिपटा घनश्याम।। 
    हृदय की अनुकृति बाह्य उदार, 
    एक लम्बी काया, उन्मुक्त। 
    मधु पवन क्रीड़ित ज्यों शिशु साल, 
    सुशोभित हो सौरभ संयुक्त ।।

    व्याख्या -

    मनु ने श्रद्धा को देखा तो वह देखते ही रह गए। वे उसके ऐन्द्रिक सौन्दर्य के जाल में फँस गए और एकटक उसे देखते रहे। उन्हें लगा कि वह फूलों के समूह में कोई लता है या चाँदनी से लिपटा हुआ कोई नीला मेघ है। श्रद्धा के शरीर को देखकर ऐसा लग रहा था मानो शरीर ने हृदय का ही अनुकरण कर रखा हो। श्रद्धा का शरीर लम्बा था। वह स्वतन्त्र रूप से विचरण करने वाली थी। ऐसा लगता था मानो साल के छोटे वृक्ष से मधुर पवन क्रीड़ा कर रही है और वह सुगन्ध से सुशोभित हो रहा हो।

    विशेष -

    • कवि की मौलिक कल्पना अद्भुत है-चन्द्रिका से लिपटा घनश्याम।
    • 'नयन का इन्द्रजाल अभिराम' में रूपकातिशयोक्ति, 'कुसुम-वैभव' में उपमा अलंकार तथा 'मधु पवन क्रीड़ित ज्यों शिशु साल' में उत्प्रेक्षा अलंकार है।
    • श्रृंगार रस की भावाभिव्यंजना हुई है।
    • चित्रोपमता प्रत्यक्ष है।

    नित्य यौवन छवि से हो दीप्त, 
    विश्व की करुण कामना मूर्ति।
    स्पर्श के आकर्षण से पूर्ण, 
    प्रकट करती ज्यों जड़ में स्फूर्ति।। 
    उषा की पहली लेखा कांत, 
    माधुरी से भीगी भर मोद। 
    मद भरी जैसे उठे सलज्ज, 
    भोर की तारक द्युति की गोद।।

    व्याख्या - 

    श्रद्धा का सौन्दर्य इस तरह चमक रहा था, मानो वह नवीन यौवन के सौन्दर्य से परिपूर्ण है। वह संसार के लिए करुणा की जीवंत मूर्ति लग रही थी। उसे देखकर केवल स्पर्श करने का मन करता था। श्रद्धा के दिव्य सौन्दर्य को देखकर ऐसा लगता था मानो उसे देखने मात्र से ही जड़ में चेतना का भाव प्रकट हो जाएगा। कहने का तात्पर्य यह है कि श्रद्धा के सौन्दर्य को देखकर हृदय में वासनारूपी कामना की लहर उठने के बजाय उसकी ऐसी दिव्यता का आभास होता था कि उसे देखकर निर्जीव वस्तुएँ भी सजीव हो जाएँगी।

    श्रद्धा को देखकर ऐसा लगता था जैसे वह प्रभात की पहली किरण हो, जो मधुरता से सरस और प्रसन्नता से भरी हई थी और ऐसा लगता है जैसे यह प्रभात के तारों की गोद में सोई हुई थी, जो मस्ती से भरी हुई और लज्जा पे युक्त होकर अभी उठकर आई हो।

    विशेष -

    • यहाँ लाक्षणिकता का प्रयोग किया है।
    • यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग किया है।
    • यहाँ प्रतीकात्मकता दृष्टव्य है।

    'लज्जा' सर्ग के कुछ पदों की व्याख्या

    कोमल किसलय के अंचल में 
    नन्हीं कलिका ज्यों छिपती-सी, 
    गोधूली के धूमिल पट में 
    दीपक के स्वर में दिपती-सी। 
    मंजुल स्वप्नों की विस्मृति में 
    मन का उन्माद निखरता ज्यों 
    सुरभित लहरों की छाया में 
    बुल्ले का विभव बिखरता ज्यों 
    वैसी ही माया में लिपटी 
    अधरों पर उँगली धरे हुए, 
    माधव के सरस कुतूहल का 
    आँखों में पानी भरे हुए। 
    नीरव निशीथ में लतिका-सी 
    तुम कौन आ रही हो बढ़ती ? 
    कोमल बाँहे फैलाए-सी 
    आलिंगन का जादू पढ़ती?

    व्याख्या -

    श्रद्धा के मन में लज्जा का उद्भव हो रहा है। उसके समर्पण भाव के आगे एक और भाव लज्जा उपस्थित हो रहा है। अतः श्रद्धा कहती है कि जिस प्रकार किसी वृक्ष की कोमल कोंपलों के बीच में कोई नन्हीं कली छिपी रहती है तथा शाम के धुँधले में कोई दीपक मन्द गति से दीप्त होता है।

    जिस प्रकार किसी सुन्दर स्वप्न को याद करते हुए मन में आनन्द की लहरें उठती हैं और लहरों में बुलबुलों की सामर्थ्य बढ़ती जाती है तथा माधव (कृष्ण) के होंठों पर माया में लिपटी हुई ऊँगली के समान माधव के कौतूहल को अपनी आँखों में समेटे हुए इस एकान्त सुनसान रात में लता के समान तुम कौन आ रही हो, जो अपनी कोमल बाँहों को फैलाए हुए जादू सा करती हुई मुझे आलिंगनबद्ध कर रही हो?

    कहने का तात्पर्य यह है कि लज्जा का अनुभव होते ही यहाँ श्रद्धा को अपनी स्थिति में परिवर्तन होता महसूस हो रहा है।

    विशेष -

    • यहाँ लाक्षणिकता का प्रयोग किया गया है।
    • यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग किया गया है।


    संध्या की लाली में हँसती, 
    उसका ही आश्रय लेती-सी, 
    छाया प्रतिमा गुनगुना उठी 
    श्रद्धा का उत्तर देती-सी। 
    "इतना न चमत्कृत हो बाले 
    अपने मन का उपकार करो, 
    मैं एक पकड़ हूँ जो कहती 
    ठहरो कुछ सोच-विचार करो।

    व्याख्या -

    श्रद्धा के प्रश्नों को सुनकर उसकी ही छाया-मात्र मानो साकार हो उठी। संध्या की लालिमा में उसके (श्रद्धा के) साए में आती हुई उसकी छाया मानो बोल उठी और श्रद्धा के प्रश्नों का उत्तर देते हुए बोली कि हे सुन्दरी, तुम अपने मन में उठते इन अतिरिक्त भावों के बारे में सोचते हुए इतना चमत्कृत मत हो अर्थात् आश्चर्य न करो। अपने मन पर उपकार करते हुए मेरी बात सुनो। जो मैं तुम्हारे समर्पण भाव के सामने बाधा बन रही हूँ जरा ठहरकर उन बातों पर ध्यान दो, जिनके बारे में मैं तुम्हें बता रही हूँ।

    विशेष -

    • यहाँ प्रस्तुत पद में मानवीकरण अलंकार दृष्टव्य है।
    • यहाँ लाक्षणिकता का प्रयोग किया गया है।

    मैं रति की प्रतिकृति लज्जा हूँ 
    मैं शालीनता सिखाती हूँ, 
    मतवाली सुन्दरता पग में 
    नूपुर सी लिपट मनाती हूँ, 
    लाली बन सरल कपोलों में 
    आँखों में अंजन सी लगती, 
    कुंचित अलकों सी घुंघराली 
    मन की मरोर बनकर जगती, 
    चंचल किशोर सुन्दरता की मैं 
    करती रहती रखवाली, 
    मैं वह हलकी सी मसलन हूँ 
    जो बनती कानों की लाली।

    व्याख्या -

    लज्जा, श्रद्धा से कहती है कि हे श्रद्धा, मैं रति (कामदेव की पत्नी) की ही प्रतिकृति हूँ। मुझे लज्जा कहते हैं। मैं किसी भी स्त्री को स्वच्छन्द होने से रोकती हूँ। मैं एक नारी को शालीनता सिखाती हूँ और मतवाली होती सुन्दरता के पैरों में नूपुर की भाँति लिपट जाती हूँ अर्थात् मेरे होने से या मेरी उपस्थिति के कारण ही एक सुन्दर मतवाली स्त्री स्वेच्छाचारिणी नहीं हो पाती। मैं उसे गलत रास्तों पर जाने से रोक लेती हूँ। मैं सदाचार का मार्ग दिखाती हूँ। मैं सुन्दरी के सामान्य गालों पे लाली बनकर आती हूँ तथा आँखों में अंजन (काजल) की भाँति उभर आती हूँ। कभी घुँघराले बालों की सिकुड़न बनकर और कभी मन में मरोड़ बन कर जगती हूँ।

    लज्जा कहती है कि हे श्रद्धा किशोरावस्था की सुन्दरता के कारण उत्पन्न होने वाली चंचलता की मैं रखवाली करती हूँ। मैं कानों की वह लाली हूँ, जो हल्का-सा मसलने पर भी कानों पर उभर आती हूँ।

    विशेष -

    • यहाँ कवि ने लज्जा के कारण स्त्री में होने वाले स्वाभाविक परिवर्तनों जैसे गालों पर लालिमा आना, एक स्त्री का अपने नायक से मरोड़ करते रहना आदि का चित्रोपम शैली में सुन्दर वर्णन किया है।
    • यहाँ श्रृंगार रस की मनोहारी छटा दृष्टव्य है।
    • यहाँ उपमा अलंकार का प्रयोग किया गया है।

    'इड़ा' सर्ग के कुछ पदों की व्याख्या

    किस गहन गुहा से अति अधीर।
    झंझा प्रवाह सा निकला यह जीवन विक्षुब्ध महा समीर।
    ले साथ विकल परमाणु पुंज नभ, अनिल, अनल, क्षिति और नीर।
    भयभीत सभी को भय देता भय की उपासना में विलीन।
    प्राणी कटुता को बाँट रहा जगती को करता अधिक दीन।
    निर्माण और प्रतिपद विनाश में दिखलाता अपनी क्षमता। 
    संघर्ष कर रहा सा सब से, सब से विराग सब पर ममता।
    अस्तित्व चिरन्तन धनु से कब यह छूट पड़ा है विषम तीर।
    किस लक्ष्य-भेद को शून्य चीर?

    व्याख्या -

    मनु ने अपने भटकते हुए जीवन की तुलना तेज आँधी (झंझा) से की है। वे कहते हैं कि जिस प्रकार तेज आँधी का झोंका किसी गहरी गुफा से निकलकर तीव्रता से चलता जाता है, उसी तरह मेरा जीवन भी तीव्र क्षोभ व वेदना में इधर-उधर भटक रहा है। जिस प्रकार आँधी के साथ धूल, मि‌ट्टी उड़ते रहते हैं उसी प्रकार ये आकाश, वायु, अग्नि, पृथ्वी और जल विक्षुब्ध होकर मुझे बेचैन कर रहे हैं। जो व्यक्ति स्वयं भय की उपासना में लीन होकर भयभीत होता रहता है, वह दूसरों को भी भयभीत करता रहता है। मेरा जीवन भी भयभीत होकर भय की साधना में ही लीन है।

    बेचैन व्यक्ति अपनी कटुता को संसार में बाँटता रहता है, उसी तरह मैं भी कर रहा हूँ और कटुता फैलाकर इस संसार में दीनता फैला रहा हूँ। मैंने भी श्रद्धा के साथ गृहस्थी का निर्माण किया और फिर उसे उजाड़ भी दिया। भले ही मैंने इससे अपनी सामर्थ्य व शक्ति का प्रदर्शन किया है, परन्तु आज फिर भी मैं अशान्त होकर इस निर्जनता में भटक रहा हूँ। यह लक्ष्यहीन तीर न जाने कब मेरे अस्तित्व से छूट पड़ा है और न जाने किस लक्ष्य को यह भेदेगा अर्थात् मैं लक्ष्यहीन होकर इस निर्जन प्रदेश में विचरण कर रहा हूँ।

    विशेष -

    • कवि ने इस पद में सांगरूपक अलंकार, उपमा अलंकार का प्रयोग किया है।
    • मनु की बेचैनी का चित्रोपम शैली में अद्भुत वर्णन किया गया है।
    • यहाँ लाक्षणिकता का प्रयोग किया है।

    जीवन निशीथ के अलंकार।
    तू नील तुहिन जल-निधि बन कर फैला है कितना वार पार। 
    किली चेतनता की किरने हैं डूब रहीं ये निर्विकार।
    कितना मादक तम, निखिल भुवन भर रहा भूमिका में अभंग। 
    तू मूर्तिमान हो छिप जाता प्रतिपल के परिवर्तन अनंग। 
    ममता की क्षीण अरुण रेखा खिलती है तुझमें ज्योति कला। 
    जैसे सुहागिनी की उर्मिल अलकों में कुंकुमचूर्ण भला। 
    रे चिरनिवास विश्राम प्राण के मोह जलद छाया उदार। 
    माया रानी के केशभार।।

    व्याख्या -

    मनु अपने नैराश्य जीवन की व्यथा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि अरे जीवन में छाए अंधकार तू नीले तुषार कणों से भरे सागर के समान एक सिरे से दूसरे सिरे तक मेरे जीवन में फैला है। इस निराशा में कोई भी आशा की किरण दिखाई नहीं दे रही। जिस प्रकार घने अँधेरे में तारे टिमटिमाते हुए उसी में खो जाते से दिखते हैं उसी तरह इस जीवन की घोर निराशा में मेरी चेतना पूर्ण रूप से लुप्त हो गई है।

    निराशा से पूर्ण जीवन में आशा का संचार ऐसा प्रतीत होता है जैसे अंधकार को समाप्त करने वाली उषा की लालिमा फूट पड़ी हो या किसी सुहागिन स्त्री के काले बालों में सिन्दूर की लालिमा चमक रही हो। मनु कहते हैं कि मेरे जीवन में छाई यह निराशा श्रद्धा के स्नेह एवं ममता को पाकर कुछ पल के लिए दूर अवश्य हुई थी, किन्तु अब फिर से मेरा जीवन निराशा से भर गया है।

    जिस प्रकार रात का घना अँधेरा सबको सुलाकर विश्राम देता है, उसी प्रकार तू भी मुझे अकर्मण्य बनाकर विश्राम देती है। जैसे अंधकार काले बादलों की छाया जैसा लगता है उसी प्रकार निराशा मोह रूपी बादलों की छाया है। तात्पर्य यह है कि मानव हृदय में जितना मोह होता है, जीवन में उतना ही अधिक निराशा का संचार होता है।

    विशेष -

    • जैसे सुहागिनी... भला में उदाहरण तथा जीवन-निशीथ व मोह-जलद में रूपक अलंकार है।
    • यहाँ लाक्षणिकता व प्रतीकात्मक शैली का प्रयोग किया है।

    यों सोच रहे मनु पड़े श्रान्त।
    श्रद्धा का सुख साधन निवास जब छोड़ चले आए प्रशान्त। 
    पथ-पथ में भटक अटकते वे आए इस ऊजड़ नगर प्रान्त। 
    बहती सरस्वती वेग भरी निस्तब्ध हो रही निशा श्याम। 
    नक्षत्र निरखते निर्निमेष वसुधा की वह गति विकल वाम। 
    वृत्रघ्नी का वह जनाकीर्ण उपकूल आज कितना सूना। 
    देवेश इन्द्र की विजय कथा की स्मृति देती थी दुख दूना। 
    वह पावन सारस्वत प्रदेश दुःस्वप्न देखता पड़ा क्लान्त। 
    फैला था चारों ओर ध्वान्त।

    व्याख्या -

    थके हुए मनु सारस्वत प्रदेश में पड़े हुए यह सोच रहे थे कि वे श्रद्धा के निवास स्थान को छोड़कर चले आए थे। वह अत्यन्त शान्ति प्रदान करने वाला था। श्रद्धा से रूठकर वे इधर-उधर भटकते हुए अन्त में वे सारस्वत प्रदेश जो एक उजाड़ नगर के रूप में था, में आ गए थे। यहाँ सरस्वती नदी प्रबल वेग से बह रही थी तथा अंधकार से भरी हुई शान्त निशा का आगमन हो रहा था। बिना पलकों को झपकाए वे पृथ्वी की इस विकल गति अर्थात् नदी को देख रहे थे। सरस्वती नदी (वृत्रघ्नी) का वह किनारा जो पहले लोगों की भीड़-भाड़ से भरा रहता था, आज प्रलय के कारण नष्ट हो जाने से कितना निर्जन एवं सूना सूना सा लग रहा था।

    इसी सरस्वती नदी के किनारे देवराज इन्द्र ने वृत्रासुर का वध किया था और असुरों पर विजय प्राप्त की थी। इन्द्र की उस विजय कथा का स्मरण आते ही मनु का दुःख और भी बढ़ गया। सारस्वत प्रदेश एक उजड़े हुए प्रान्त की भाँति तथा एक थके हुए व्यथित व्यक्ति की भाँति बुरे स्वप्नों को देखता हुआ सा लग रहा था जिसके चारों ओर अँधेरा ही अँधेरा व्याप्त था।

    कामायनी से संबंधित प्रश्न

    प्रश्न 1. जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित 'कामायनी' में कुल कितने सर्ग हैं?

    1. दस
    2. बारह
    3. बीस
    4. पन्द्रह 

    उत्तर - 4. पन्द्रह


    प्रश्न 2. 'कामायनी' में चिंता सर्ग किस क्रम पर है?

    1. पहला
    2. तीसरा
    3. आठवां
    4. दसवां

    उत्तर - 1. पहला


    प्रश्न 3. 'चिंता' सर्ग का पहला पद किस प्रकार का मंगलाचरण है?

    1. भक्ति निर्देशात्मक
    2. वस्तु निर्देशात्मक
    3. भाव निर्देशात्मक
    4. इनमें से कोई नहीं|

    उत्तर - 2. वस्तु निर्देशात्मक


    प्रश्न 4. प्रलय से बचने के लिए मनु ने जिस नौका का आश्रय लिया था उसे किसने अपनी पूँछ से झपाटे से हिमालय पर्वत पर पहुँचा दिया था?

    1. मगरमच्छ ने
    2. घड़ियाल ने
    3. मत्स्य ने
    4. महामत्स्य ने

    उत्तर - 4. महामत्स्य ने


    प्रश्न 5. चिंता सर्ग में किस संस्कृति के विनाश का वर्णन किया गया है?

    1. यक्ष संस्कृति
    2. असुर संस्कृति
    3. देव संस्कृति
    4. नाग संस्कृति

    उत्तर - 3. देव संस्कृति


    प्रश्न 6. देवजाति ने केवल किसका संग्रह किया था ?

    1. योग का
    2. तप का
    3. सुख का
    4. कामिनियों का

    उत्तर - 3. सुख का


    प्रश्न 7. मनु ने कुछ न सुनने वाली बहरी किसे कहा है?

    1. आशा को
    2. श्रद्धा को
    3. इड़ा को
    4. चिंता को

    उत्तर - 4.  चिंता को


    प्रश्न 8. 'देव-दंभ के महामेध' में कौन-सा अलंकार है?

    1. उपमा
    2. विरोधाभास
    3. रूपक
    4. उत्प्रेक्षा

    उत्तर - 3. रूपक


    प्रश्न 9. कामायनी का इड़ा सर्ग किस स्थान क्रम पर है ?

    1. तीसरा
    2. पांचवा
    3. सातवाँ
    4. नवां

    उत्तर - 4. नवां


    प्रश्न 10. इड़ा किसका प्रतीक है ?

    1. मन
    2. हृदय
    3. बुद्धि
    4. कर्म

    उत्तर - 3.  बुद्धि

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