यह मन्दिर का दीप इसे नीरव जलने दो – सारांश, व्याख्या और रहस्यवाद | महादेवी वर्मा

 ‘यह मन्दिर का दीप इसे नीरव जलने दो’ महादेवी वर्मा की रहस्यवादी कविता है, जो उनके काव्य-संग्रह दीपशिखा में संकलित है। इसमें कवयित्री ने आत्मा को दीप और शरीर को मंदिर का प्रतीक मानते हुए परमात्मा के प्रति अपनी एकाग्र भक्ति और साधना की भावना व्यक्त की है। कविता में शांति, एकांत और आध्यात्मिक एकाग्रता की आवश्यकता पर बल दिया गया है तथा आत्मा-परमात्मा के मिलन की तड़प को मार्मिक रूप से चित्रित किया गया है। 

यह मन्दिर का दीप सारांश

    'यह मन्दिर का दीप इसे नीरव जलने दो' कविता का सारांश

    'यह मन्दिर का दीप इसे नीरव जलने दो' छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा की एक रहस्यवादी अभिव्यक्ति है। कवयित्री चाहती है कि उसके प्राण रूपी दीपक को अपने अज्ञात प्रियतम (परमात्मा) की आराधना के लिए जलने दो। उनका कहना है कि मन्दिर में किसी भी तरह की हलचल न करें, जिससे मेरा दीप प्रकम्पित होकर बुझ न जाए। तात्पर्य यही है कि महादेवी जी ने साधना के लिए शान्ति और एकाग्रता की चाह की है। कवयित्री कहती है कि सांसारिक गतिविधियों के समान घण्टे और घड़ियाल बजाकर मेरी साधना में विघ्न मत डालिए इनसे मेरे चित्त को स्थिरता प्राप्त नहीं होती और साधना भंग हो जाती है।

    कवयित्री कहती हैं कि मेरे इस प्राण रूपी दीप को इस गहन एकान्तिक अन्धकार में पुजारी बनकर जलने उन्होंने अपने प्राणों में क्रान्ति रूपी तेल भर दिया है, जिसके कारण मेरे इस प्राण रूपी दीप को जलने में सहायता मिलेगी। वे कहती हैं कि मैंने अपने प्राणों को जीवन दीप की भाँति जलने के लिए प्रेरित किया है। यह जीवन दीप अपने प्रियतम का सन्देश लाया है, जोकि यहाँ उपस्थित ही नहीं है। अतः शान्तिपूर्वक मुझे अपने प्रियतम की साधना में चिर लीन होने दो, जिससे मैं उन्हें बुलाकर अपने सन्देश को उन तक पहुँचा दूँ।

    अतः इस कविता में छायावाद की प्रमुख विशेषता रहस्यवाद परिलक्षित होती है। अपने अज्ञात प्रियतम के लिए प्रेम की चिर साधना में लीन होना केवल छायावादी कवियों की ही प्रकृति रही है।

    'यह मन्दिर का दीप' के कुछ पदों की व्याख्या

    (1)

    यह मन्दिर का दीप इसे नीरव जलने दो 
    रजत शंख घड़ियाल स्वर्ण वंशी-वीणा स्वर 
    गए आरती वेला को शत-शत लय से भर 
    जब था कल कंठों का मेला, 
    विरह से उपल तिमिर था खेला 
    अब मन्दिर में इष्ट अकेला, 
    इसे अजिर का शून्य गलाने को गलने दो

    व्याख्या -

    कवयित्री कहती है कि मैंने अपने प्राणरूपी दीपक को अपने इस शरीररूपी मन्दिर में अपने प्रियतम परमात्मा की आराधना के लिए उसके सम्मुख जलाकर रख दिया है। मेरे इस दीपक को शान्ति के साथ जलने दो। मेरे मन-मन्दिर में कोई भी किसी भी प्रकार की हलचल उत्पन्न कर उसकी लौ को प्रकम्पित न करे, वरन् निश्चल और शान्त रूप से उसे जलने दिया जाए।

    मेरे इस साधनारत जीवन में आने वाले विविध भाव उन मधुर ध्वनियों के समान हैं, जो आरती के समय शंख, घड़ियाल, वंशी, वीणा आदि से निःसृत स्वरों से मन्दिर के आँगन को दिन में कई बार गुंजारित कर जाती है। जिस प्रकार आरती के समय इन वाद्ययन्त्रों से निःसृत होने वाली ध्वनियाँ मन्दिर में विविध स्वर भर देती हैं, उसी प्रकार प्राण-मन्दिर में आरती के समय अनेक भाव-ध्वनियों की गर्जना हो जाती है। जिस समय इस मन्दिर में अनेक भावरूपी भक्त मधुर स्वरों में अपने भक्ति से परिपूर्ण स्वरों में स्तुति पाठ कर रहे थे, उसी समय मेरे प्राणों की तपस्या को भंग करने के लिए मेरे सामने सर्वत्र विरहान्धकार छा गया तथा ओलों के रूप में दुःखों ने आकर मेरे ऊपर वर्षा की, किन्तु मेरे प्राणरूपी दीपक ने मुझे बचने का सही स्थान दिखा दिया, जिससे मेरी साधना भंग होते-होते बच गई।

    अब मेरे इस देहरूपी मन्दिर में प्राणरूपी दीपक को अपने स्वरूप को गलाते हुए संसाररूपी आँगन में उसका अन्धकार दूर करने के लिए निर्विकार तथा शान्तभाव से जलने दो अर्थात् मेरे इस प्राण की साधना में किसी प्रकार का विघ्न उपस्थित मत करो।

    विशेष -

    • यहाँ पर महादेवी ने साधना अथवा भक्ति के लिए चित्त की एकाग्रता और शान्ति को आवश्यक बताया है। मन्दिर के घण्टे, घड़ियाल इस दिशा में कोई सहायता नहीं पहुँचाते, वरन् विघ्न ही उत्पन्न करते हैं।
    • शुद्ध परिष्कृत खड़ी बोली, सांगरूपक, पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास अलंकार का प्रयोग किया गया है।

    (2)

    झंझा है दिग्भ्रान्त रात की मूर्छा गहरी 
    आज पुजारी बने, ज्योति का यह लघु प्रहरी 
    जब तक लौटे दिन की हलचल 
    तब तक यह जागेगा प्रतिपल 
    रेखाओं में भर आभा-जल 
    दूत-साँझ को इसे प्रभाती तक चलने दो

    व्याख्या -

    महादेवी कहती हैं कि आँधियों के कारण दिशाएँ भ्रमित हो रही हैं। राह के गहन अन्धकार में एक मूर्च्छा होने जैसी नीरवता छाई हुई है। ऐसी स्थिति में हे प्रियतम! ये मेरा जीवनरूपी दीप पुजारी बनकर इस मन्दिर का लघुतम पहरेदार बन गया है। जब तक दिन निकलेगा और संसार में हलचल होगी तब तक यह दीप यूँ ही जलता रहेगा। अपनी रेखाओं में प्रकाश का जल भरकर अर्थात् अपने प्राणों में क्रान्ति भरकर यह जीवन दीप यूँ ही जलता रहेगा और मेरा यह जीवन उस दूत के समान है, जो अपने स्वामी का सन्देश लाया है, परन्तु वे मेरे प्रियतम अभी उपस्थित नहीं हैं।

    विशेष -

    • प्रस्तुत पद्यांश में रहस्यवादी भावना का प्रयोग किया गया है।
    • धर्मविहीन लुप्तोपमा तथा सांगरूपक अलंकार का प्रयोग किया है।

    यह मन्दिर का दीप कविता के महत्‍वपूर्ण तथ्‍य 

    विषयवस्तु -

    • इस कविता में उस असीम शक्ति या परमात्मा के प्रति कवयित्री की अपार भक्ति व अलौकिक प्रेम का चित्रण हुआ है।
    • यह दीप-आत्मा और मंदिर-जीवन (शरीर/परमात्मा) के प्रतीक का चित्रण है।

    विशेष -

    • अद्वैतवादी दर्शन का प्रभाव
    • निराशावादी होकर भी जीने की लालसा का चित्रण
    • जीवन रूपी मंदिर की कल्पना
    • आत्मा रूपी दीप की रक्षा हर कोई करना चाहता है
    • जीवन एवं मृत्यु के बीच की कठिनाई का चित्रण

    यह मन्दिर का दीप कविता के महत्‍वपूर्ण प्रश्‍नोउत्तर

    प्रश्‍न 1. यह मंदिर का दीप 'कविता किस संग्रह में संकलित है :
    1. नीरजा
    2. संध्यगीत
    3. दीपशिखा
    4. निहार
    उत्तर - 3. दीपशिखा


    प्रश्‍न 2. दीप शिखा का प्रकाशन वर्ष है :
    1. 1930
    2. 1936
    3. 1940
    4. 1942
    उत्तर - 4. 1942


    प्रश्‍न 3. यह मंदिर का दीप में दीप किसका प्रतीक है :
    1. साधक
    2. साधना
    3. प्रकाश
    4. चमक
    उत्तर - 1. साधक


    प्रश्‍न 4. मसि-सागर में कौन सा अलंकार है :
    1. उपमा
    2. रूपक
    3. उत्प्रेक्षा
    4. अनुप्रास
    उत्तर - 2. रूपक


    प्रश्‍न 5. दीप को किसका दूत माना गया है :
    1. सुबह
    2. दोपहर
    3. शाम 
    4. रात
    उत्तर - 3. शाम 


    प्रश्‍न 6. 'चरणों से चिन्हित अलिन्द की भूमि सुनहली' में 'अलिन्द' का क्या अर्थ है?
    1. मंदिर का शिखर
    2. मंदिर का आंगन/डेवढ़ी
    3. गर्भगृह
    4. नदी का तट
    उत्तर - 2. मंदिर का आंगन/डेवढ़ी

    यह मन्दिर का दीप इसे नीरव जलने दो - महादेवी वर्मा 


    यह मन्दिर का दीप इसे नीरव जलने दो
    रजत शंख घड़ियाल स्वर्ण वंशी-वीणा-स्वर,
    गये आरती वेला को शत-शत लय से भर,
    जब था कल कंठो का मेला,
    विहंसे उपल तिमिर था खेला,
    अब मन्दिर में इष्ट अकेला,
    इसे अजिर का शून्य गलाने को गलने दो!

    चरणों से चिन्हित अलिन्द की भूमि सुनहली,
    प्रणत शिरों के अंक लिये चन्दन की दहली,
    झर सुमन बिखरे अक्षत सित,
    धूप-अर्घ्य नैवेदय अपरिमित
    तम में सब होंगे अन्तर्हित,
    सबकी अर्चित कथा इसी लौ में पलने दो!

    पल के मनके फेर पुजारी विश्व सो गया,
    प्रतिध्वनि का इतिहास प्रस्तरों बीच खो गया,
    सांसों की समाधि सा जीवन,
    मसि-सागर का पंथ गया बन
    रुका मुखर कण-कण स्पंदन,
    इस ज्वाला में प्राण-रूप फिर से ढलने दो!

    झंझा है दिग्भ्रान्त रात की मूर्छा गहरी
    आज पुजारी बने, ज्योति का यह लघु प्रहरी,
    जब तक लौटे दिन की हलचल,
    तब तक यह जागेगा प्रतिपल,
    रेखाओं में भर आभा-जल
    दूत सांझ का इसे प्रभाती तक चलने दो!

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