महादेवी वर्मा की कविता ‘फिर विकल हैं प्राण मेरे’ उनके काव्य संग्रह साध्यगीत से ली गई एक रहस्यवादी रचना है। इस कविता में कवयित्री ने आत्मा और परमात्मा के मिलन की तीव्र आकांक्षा, जीवन की चिरन्तनता तथा भारतीय पुनर्जन्म सिद्धान्त को काव्यात्मक रूप में व्यक्त किया है। कविता में क्षितिज, लहर, दीपक, शलभ और आकाश जैसे प्रतीकों के माध्यम से आध्यात्मिक जिज्ञासा और रहस्यवाद की अभिव्यक्ति की गई है। यह कविता छायावाद की भावधारा को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।
प्रस्तुत पोस्ट में कविता का सारांश, पद-व्याख्या, काव्य-विशेषताएँ, अलंकार, दार्शनिक भाव, तथा परीक्षा-उपयोगी महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर सरल भाषा में दिए गए हैं। यह सामग्री BA-MA, UGC NET और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत उपयोगी है।
'फिर विकल हैं प्राण मेरे' कविता का सारांश
प्रस्तुत कविता 'फिर विकल हैं प्राण मेरे' महादेवी वर्मा के काव्य संग्रह 'साध्यगीत (1936)' से उद्धत है। इस कविता में कवयित्री द्वारा रहस्य की अप्रतिम अभिव्यक्ति हुई हैं। कवयित्री को परम सत्ता रूपी अपने प्रियतम से मिलने की उत्सुकता व्याकुल कर रही है। कवयित्री का मानना है कि उस परम सत्ता से मिलन क्षितिज के पार जाकर ही सम्भव है अर्थात् जीवन का वास्तविक रूप परमात्मा को जान लेने के बाद ही सम्भव हो सकता है।
महादेवी जी का मानना है कि संसार की प्रत्येक वस्तु चिरन्तन है। उनके मन में जिज्ञासा है कि सागर के विस्तृत वक्षस्थल पर छोटी-छोटी लहरें किस प्रकार नृत्य करती हैं तथा दीपक छोटा होने के बावजूद भी प्रकाश को कैसे धारण कर लेता है। कवयित्री के ये प्रश्न छायावाद के रहस्यवाद को प्रकट करते हैं यही स्थिति रहस्यवाद की स्थिति होती है।
महादेवी जी कहती हैं कि परमात्मा ने कणों को बिम्ब ग्राह्यता, पतंगे को दीपक के प्रति चिर साधना, पृथ्वी को कल्पनामय वेदना तथा आकाश को प्रसन्नता प्रदान की है। इसलिए परमात्मा प्रदत्त ये वस्तुएँ भी परमात्मा के समान शाश्वत और सत्य हो गई हैं। इनकी चिरन्तनता परमात्मा सदृश ही व्यापक है अर्थात् परमात्मा द्वारा ही दी गई ये भौतिक वस्तुएँ नश्वर कैसे हो सकती हैं, असत्य कैसे हो सकती हैं। महादेवी जी का मानना है कि जन्म के साथ जुड़ी हुई मेरी इच्छाएँ मृत्यु के कारण विलीन नहीं हो सकतीं। कहने का तात्पर्य यही है कि मनुष्य की इच्छाएँ भी चिरन्तन होती हैं, वे कभी नहीं मरती। एक जन्म की इच्छाओं को पूरा करने के लिए मनुष्य फिर जन्म लेकर उन इच्छाओं को पूरा करने आता है। शास्त्रों में कवयित्री के इसी सिद्धान्त को कर्म-फल का सिद्धान्त कहते हैं अर्थात् मनुष्य अपने कर्मों का फल प्राप्त करने तथा अपनी इच्छाओं की पूर्ति हेतु पुनर्जन्म लेता है।
'फिर विकल हैं प्राण मेरे' कविता के कुछ पदों की व्याख्या
तोड़ दो यह क्षितिज मैं भी देख लूँ उस ओर क्या है!
जा रहे जिस पन्थ से युग कल्प उसका छोर क्या है?
क्यों मुझे प्राचीर बन कर आज मेरे श्वास घेरे?
व्याख्या -
महादेवी जी कहती हैं कि हे प्रियतम! आज मेरे प्राण अत्यधिक व्याकुल हो रहे हैं। मैं आज यह देखने के लिए व्यग्र हूँ कि क्षितिज के उस पार क्या है? अतः प्रियतम क्षितिज को तोड़कर मुझे उस पार का दृश्य दिखा दीजिए। युग और कल्प जिस मार्ग से जा रहे हैं, उसका पर्यवसान कहाँ है? आज मेरी श्वासे ही मेरे लिए दीवार बन गई हैं; इन्हीं के कारण मैं अपनी इन जिज्ञासाओं का समाधान कर पाने में अपने को असमर्थ पा रही हूँ।
विशेष -
- प्रस्तुत पंक्तियों में रहस्य भाव की सुन्दर अभिव्यक्ति हुई है। प्रियतम से मिलन की उत्कण्ठा ही प्राणों को व्याकुल कर रही है और कवयित्री का ऐसा विश्वास है कि वास्तविक रहस्य का ज्ञान तो दूरदर्शी बनने से होगा अर्थात् जब हम क्षितिज के उस पार देख लेंगे या फिर युग और कल्प के भेदों को जान लेंगे।
- यहाँ रूपक अलंकार का प्रयोग किया गया है
सिन्धु की निःसीमिता पर लघु लहर का लास कैसा।
दीप लघु शिर पर धरे आलोक का आकाश कैसा ।
दे रही मेरी चिरन्तनता
क्षणों के साथ फेरे!
व्याख्या -
संसार की प्रत्येक वस्तु को चिरन्तन मानते हुए महादेवी जी कहती है कि सीमा रहित सिन्धु के वक्षस्थल पर ये छोटी-छोटी लहरें कैसा नृत्य कर रही हैं? इनके नृत्य में आखिर कौन सा रहस्य छिपा हुआ है? ये छोटे से दीपक अपने मस्तक पर प्रकाश के आकाश को कैसे धारण किए हुए हैं। भाव यह है कि दीपक तो छोटा सा है किन्तु फिर भी वह जिस प्रकाश को फैला रहा है, वह आकाश के समान व्यापक है। आखिर इसमें ऐसा कौन-सा रहस्य है? इन वस्तुओं को देखकर आज मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो मेरी चिरन्तनता क्षणों के साथ फेरे दे रही है अर्थात् इस संसार की प्रत्येक वस्तु चिरन्तन एवं शाश्वत है।
विशेष -
- इन पंक्तियों में कवयित्री ने संसार के पदार्थों के प्रति जो जिज्ञासा व्यक्त की है, यही रहस्यवाद की स्थिति है।
- यहाँ पहली और दूसरी पंक्ति में मानवीकरण अलंकार है।
बिम्बग्राहकता कणों को शलभ को चिर साधना दी,
पुलक से नभ भर धरा को कल्पनामय वेदना दी,
मत कहो हे विश्व ! झूठे
है अतुल वरदान तेरे'।
व्याख्या -
महादेवी जी कहती हैं कि हे प्रियतम ! तुमने सृष्टि के कण-कण को बिम्ब ग्रहण करने की शक्ति और प्रत्येक पतंगे को चिरन्तन साधना प्रदान की है। संसार का प्रत्येक कण किसी-न-किसी आकर्षण से युक्त है। शलभ प्रकाश पर मर मिटने की चाह लिए हुए है। किन्तु उसका यही बलिदान उसे अमर बना देता है।
आकाश में प्रकट होने वाले तारे मानो उसकी रोमावली हैं और उसकी पुलकन को प्रकट कर रहे हैं। आकाश को पुलक (प्रसन्नता) तुम्हीं ने तो प्रदान की है। धरती की उर्वर कल्पना प्रवण पीड़ा के जनक भी तो तुम ही हो। अतः यह कहने के लिए कोई अवकाश नहीं है कि संसार के अतुलनीय वरदान झूठे हैं। इस संसार में कुछ भी तो झूठा नहीं है। सृष्टि का कण-कण चिरन्तन, शाश्वत, सत्य और रहस्यमय है। उसके रहस्य को जान पाना व्यक्ति की सीमा से परे है, क्योंकि इस विश्व की प्रत्येक वस्तु तुम्हारी महिमा से अभिमण्डित है। यहाँ महादेवी जी के कहने का आशय यह है कि उस अज्ञात प्रियतम ने कणों को बिम्ब ग्राहकता, पतंगे को चिर साधना, आकाश को पुलक और पृथ्वी को कल्पनामय वेदना प्रदान की है। अतः उससे सम्पृक्त होने के कारण ये सभी चीजें उसी के समान चिरन्तन, शाश्वत और सत्य हैं। वस्तुतः जब ये ईश्वर के अनुपमेय वरदान हैं, तब ये झूठे कैसे हो सकते हैं?
विशेष -
- यहाँ कवयित्री ने स्पष्ट किया है कि संसार की कोई भी वस्तु झूठी नहीं है। प्रत्येक वस्तु परमात्मा की महिमा से मण्डित है।
नभ डुबा पाया न अपनी बाढ़ में भी क्षुद्रतारे,
ढूँढने करुणा मृदुल घन चीर कर तूफान हारे
अन्त के तम में बुझे क्यों
आदि के अरमान मेरे!
व्याख्या -
सृष्टि के कण-कण में चिरन्तनता का अवलोकन करके अपने जीवन दर्शन को व्यक्त करते हुए महादेवी जी कहती हैं कि आकाश अपनी बाढ़ (अपने अनन्त विस्तार) में लघु नक्षत्रों को अस्तित्वहीन न कर सका। तारों की सत्ता, उनका अस्तित्व स्पष्टतः आकाश में परिलक्षित होता है। अतः ये स्वतः सिद्ध है कि वे चिरन्तन हैं। तूफान कोमल बादलों के वक्षस्थल को करुणा ढूंढने के लिए निरन्तर चीरते रहे हैं किन्तु वे उसके अस्तित्व को समाप्त न कर सके। तब भला मेरे जन्म के साथ जुड़ी इच्छाएँ मृत्यु के अन्धकार में कैसे विलीन हो सकती हैं? अर्थात् उन इच्छाओं और कामनाओं का भी मृत्यु के अन्धकार में विलय नहीं होगा। भाव यह है कि भारतीय दर्शन के अनुसार व्यक्ति अपनी अतृप्त इच्छाओं की पूर्ति अपने दूसरे जन्म में करता है और जब तक उसकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण नहीं हो जाती तब तक उसे जन्म-मृत्यु के बन्धन में बंधना पड़ता है।
विशेष -
- यहाँ कवयित्री ने परोक्ष रूप से भारतीय पुनर्जन्मवाद के सिद्धान्त की प्रतिष्ठा की है।
फिर विकल हैं प्राण मेरे, कविता के महत्वपूर्ण तथ्य
- 'फिर विकल है प्राण मेरे' कविता महादेवी जी के काव्य संग्रह 'साध्यगीत' में संग्रहित है।
- विरह, मिलन, जिज्ञासा की तीन स्थितियां है इनके काव्य में ।
- इस कविता का प्रथम आयाम ब्रजभाषा और खड़ी बोली में है
- महादेवी को 'हिंदी के विशाल मंदिर की वीणापाणि' कहा जाता है
- श्रीमती महादेवी वर्मा के अन्य अनेक काव्य संकलन भी प्रकाशित हैं, जिनमें उपर्युक्त रचनाओं में से चुने हुए" गीत" संकलित किये गये हैं, जैसे आत्मिका, परिक्रमा, सन्धिनी, गीतपर्व, दीपगीत, स्मारिका, नीलांबरा।
- कवयित्री अपने (आत्मा) और प्रभू (परमात्मा) के मिलन में आने वाली बाधा-बंधन को तोड़ देना चाहती है।
- पद में प्रभु मिलन की अंतिम हिस्से को देखने की इच्छा जाहिर करती है।
- कवयित्री श्वास (साँस) को प्रभू-मिलन में बाधक मानती है।
- जिस तरह भ्रमर फूल के प्रेम (रस) को पाने के लिए लगातार साधना करता है, ठीक उसी तरह महादेवी अपने आराध्यदेव के लिए साधना करती हैं।
- कवयित्री प्रभु को झूठा साबित करते हुए कहती है कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का वरदान तो तुमने ही दिया है तो फिर ये बाधायें क्यों।
- कविता के अंत में आत्मा-परमात्मा का मिलन न होने के कारण कवयित्री निराश और हताश हो जाती है।
- इस कविता में कवयित्री ने असीम त्याग की भावना का चित्रण किया है।
- आत्मा की तुलना शूद्र तारों से की गयी है।
'फिर विकल हैं प्राण मेरे' कविता के महत्वपूर्ण प्रश्नोउत्तर
- भक्ति काल
- रीतिकाल
- छायावाद
- प्रगतिवाद
- बेचैन
- शांत
- प्रसन्न
- समर्थ
- भौतिक सुखों की लालसा
- प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन
- अज्ञात/अनंत सत्ता की खोज और मिलन की व्याकुलता
- सामाजिक समस्याओं का चित्रण
- दीवार को
- क्षितिज को
- आकाश को
- बंधन को
- जिज्ञासा और अज्ञात सत्ता की खोज
- भय और डर
- निराशा
- अज्ञानता

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