हिंदी साहित्य के आदिकाल में रचित वीरगाथात्मक काव्यों को रासो काव्य कहा जाता है। इन काव्यों में मुख्यतः राजाओं और वीर योद्धाओं के शौर्य, पराक्रम, युद्ध, दानशीलता, प्रेम तथा ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन मिलता है। इनकी रचना मुख्य रूप से चारण एवं भाट कवियों ने अपने आश्रयदाता राजाओं की प्रशंसा के लिए की। रासो काव्य हिंदी साहित्य की वीरगाथा परंपरा का महत्वपूर्ण अंग है।
हिंदी साहित्य के आदिकालीन रासो साहित्य (Raso Sahitya) का परिचय, प्रमुख रासो कवि एवं उनकी रचनाऍं तथा रासो साहित्य के विशेषताऍं के साथ ही उसके विस्तार के संबंध में विस्तार से इस पोस्ट में दीया गया है। रासो साहित्य UGC NET हिंदी से संबंधित अक्सर प्रश्न पूछे जाते रहे है, इसलिए यह आदिकालीन रासो साहित्य और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
आदिकालीन साहित्य को मुख्य रूप से छह प्रमुख धाराओं या प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है। जो निम्न है -
- सिद्ध साहित्य
- जैन साहित्य
- नाथ साहित्य
- रासो साहित्य
- लौकिक साहित्य
- गद्य साहित्य
आदिकालीन रासो सहित्य का संक्षिप्त परिचय
| बिंदु | संक्षिप्त जानकारी |
|---|---|
| रासो साहित्य | आदिकाल में रचित वीरगाथात्मक काव्य को सामान्यतः रासो साहित्य कहा जाता है। |
| मुख्य विषय | राजाओं, सामंतों और वीर योद्धाओं के शौर्य, युद्ध, प्रेम और पराक्रम का वर्णन। |
| प्रमुख रस |
|
| प्रमुख विशेषता | अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन, वीरता का गौरवगान और युद्धों का वर्णन। |
| भाषा | डिंगल, पिंगल भाषा तथा तत्कालीन लोकभाषाओं के विभिन्न रूपों का प्रयोग मिलता है। |
| प्रमुख कवि | चंदबरदाई, नरपति नाल्ह, दलपति विजय आदि। |
| प्रमुख रचनाएँ | पृथ्वीराज रासो, बीसलदेव रासो, खुमाण रासो, परमाल रासो आदि। |
| ऐतिहासिक महत्व | इन रचनाओं में तत्कालीन वीरों, राजाओं और युद्धों से संबंधित अनेक वर्णन मिलते हैं, हालांकि इनमें ऐतिहासिकता के साथ कल्पना और अतिशयोक्ति भी है। |
| साहित्यिक महत्व | रासो साहित्य ने हिंदी के आरंभिक वीरगाथात्मक काव्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। |
आदिकालीन रासो साहित्य
जैन रासो काव्य मुख्यतः धार्मिक दृष्टि से प्रधान थे, जबकि अन्य रासो ग्रन्थों में वीरगाथात्मक प्रवृत्ति प्रमुख रूप से दिखाई देती है। रासो ग्रन्थों की विषय-वस्तु का मूल संबंध राजाओं के चरित्र, उनके शौर्य तथा प्रशंसा से रहा है। इन काव्यों के रचयिता अपने आश्रयदाता राजाओं के चरित्र, पराक्रम और वीरता का वर्णन करते थे। इसी कारण रासो काव्य में वीर रस की प्रधानता मानी जाती है।
रासो साहित्य की परिभाषा
रासो साहित्य (Raso Sahitya) की परिभाषा ー
"वे प्रबंध काव्य जिनमें राजाओं एवं वीर योद्धाओं के शौर्य, युद्ध, पराक्रम् दानशीलता तथा प्रेम का वर्णन वीर रस की प्रधानता के साथ किया गया हं उन्हें रासो काव्य कहा जाता है।"
रासो ग्रन्थों के स्वरूप और उनकी विषय-वस्तु को समझने से पहले ‘रासो’ शब्द की व्युत्पत्ति तथा उसके अर्थ पर प्रकाश डालना आवश्यक है।
रासो शब्द की व्युत्पत्ति
हिन्दी साहित्य के आदिकाल में रासो ग्रन्थों के आधिक्य को देखकर यह विवाद आज भी अनसुलझा है कि रासो शब्द की उत्पत्ति कहाँ से हुई। फ्रांसीसी साहित्यकार गार्सा-द-तासी ने रासो शब्द की उत्पत्ति 'राजसूय' शब्द से बताने की कोशिश की है, परन्तु इस काल में न तो राजसूय यज्ञ प्रचलित थे और न ही इस काल की रचनाओं में इनका कोई वर्णन दिखाई पड़ता है। फ्रांस में बैठे-बैठे साहित्य लिखने की कोशिश करने के कारण 'गार्सा-द-तासी' की समझ में परिपक्वता नहीं दिखाई देती।
रासो शब्द की व्युत्पत्ति के संबंध में विद्वानों के तथ्य -
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने रासो शब्द की व्युत्पत्ति 'रसायण' से ढूँढने की कोशिश की। सम्भवतः उन्होंने बीसलदेव रासो में प्रयुक्त इस शब्द की बार-बार आवृत्ति को देखकर ऐसा अनुमान लगाया। बीसलदेव रासो की एक पंक्ति जिसमें रसायण शब्द का उल्लेख हुआ है, को उन्होंने आधार बनाया।
पण्डित हरप्रसाद शास्त्री ने रासो शब्द की व्युत्पत्ति 'राजयश' अथवा 'रहस्य' से मानी है, जो वास्तव में, प्रासंगिक नहीं है। नरोत्तम स्वामी 'रसिक' और चन्द्रबली पाण्डेय 'नाट्यरासक' से इस शब्द की उत्पत्ति तलाशते हैं, परन्तु इसके पीछे तर्क को उद्घाटित नहीं करते।
डॉ. रामकुमार वर्मा और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इसे 'नाट्यरासक' से उधृत माना। रामकुमार वर्मा जी ने सन्देशरासक में प्रयुक्त 29 मात्राओं के 'रासक' छन्द से रासक शब्द को व्युत्पन्न माना। इसकी भी मान्यता पूर्णतः वैज्ञानिक नहीं है।
रासो काव्यों का वर्गीकरण इसके गीत नृत्यपरक होने तथा बहुछन्दमयी होने को लेकर भी है। शारदा तनय के 'भावप्रकाश' नामक ग्रन्थ में लास्य नृत्य से रासक की उत्पत्ति मानी गई है। आदिकालीन ग्रन्थों में 'चन्दनबाला रास', 'जीवदयारास', 'भरतेश्वर बाहुबली रास' इत्यादि को देखकर इन्हें नाट्यरासक से सम्बन्धित बताया गया है और गीतनृत्य परक रासो की श्रेणी में रखा गया। आचार्य स्वयंभू और विरहोक जैसे विद्वानों ने रासो काव्यों में प्रयुक्त शताधिक छन्दों को देखकर इनकी उत्पत्ति छन्द विविधता से देखने की कोशिश की।
उपरोक्त दोनों मतों का परीक्षण करते हुए डॉ. माता प्रसाद गुप्त का यह निष्कर्ष है कि रासो काव्यों का अन्तर छन्द विविधता अथवा गीत नृत्यपरक रासो के आधार पर नहीं किया जा सकता है। जैन रास ग्रन्थों और वीरतापरक रासो ग्रन्थों दोनों में ही एक से अधिक छन्द देखे जा सकते हैं। वस्तुतः रास व रासो में भी कोई अन्तर नहीं है।
डॉ. नरोत्तम स्वामी जी रासो शब्द की व्युत्पत्ति राजस्थानी भाषा के 'रसिक' शब्द से मानते हैं, जिसका अर्थ कथावाक्य होता है। वे रासो का विकास क्रम निम्न प्रकार से मानते हैं
रसिक ⇨ रासउ ⇨ रासो
रासो शब्द के सन्दर्भ में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की मान्यता अंशतः वैज्ञानिक लगती है। उन्होंने 'रासक' शब्द से रासो को व्युत्पन्न माना है। द्विवेदी जी से आगे कोई और मत वैज्ञानिक नहीं दिखाई देता केवल महावीर प्रसाद द्विवेदी को छोड़कर। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 'रस' शब्द से रासो को निष्पन्न माना है। चन्दबरदाई के द्वारा पृथ्वीराज रासो में दिया गया रासो की उत्पत्ति का प्रमाण आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के तर्क का आधार है। चन्दबरदाई भी रासो/रासउ या रासक शब्द को रसों से ही उत्पन्न मानते हैं।
रासो काव्यों की विषय-वस्तु और प्रामाणिकता
रासो काव्यों की विषय-वस्तु का मूल संबंध राजाओं के चरित तथा उनकी प्रशंसा से है। फलतः इनका आकार रचनाकारों की मृत्यु के पश्चात भी बढ़ता रहा। रासो काव्यों का अध्ययन करने पर पता चलता है कि उनके रचयिता जिस राजा के चरित का वर्णन करते थे, उसके उत्तराधिकारी राजा अपने आश्रित अन्य कवियों से उसमें अपने चरित को भी सम्मिलित करा देते थे। यही कारण है कि इन ग्रंथों में मध्यकालीन राजाओं का भी वर्णन मिलता है तथा इनकी भाषा में उत्तरवर्ती भाषा-रूपों की झलक भी दिखाई देती है।
राजस्थान के कतिपय वृत्त-संग्रहकर्ताओं ने इन्हीं कारणों से अधिकांश रासो काव्यों को अप्रामाणिक रचनाएँ माना है। भाषावैज्ञानिकों से भी उन्हें इस मत के समर्थन में आधार प्राप्त हुआ। परंतु इतिहास के मर्म को समझने वाले विद्वान उन वृत्त-संग्रहकर्ताओं के कथनों को स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार सत्य यह है कि रासो काव्यों की रचना आदिकाल में ही हुई थी। इनमें जो अंश उत्तरवर्ती राजाओं से संबंधित हैं, वे प्रक्षिप्त माने जाते हैं।
इसी मान्यता के आधार पर रासो ग्रंथों को आदिकाल का साहित्य स्वीकार करते हुए यहाँ उनका संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया जा रहा है।
प्रमुख आदिकालीन रासो ग्रन्थ
रासो काव्य परम्परा के अन्तर्गत आने वाले प्रमुख रासो ग्रन्थों की सूची इस प्रकार है
- बीसलदेव रासो
- खुमाण रासो
- परमाल रासो
- पृथ्वीराज रासो
- हम्मीर रासो
- विजयपाल रासो
- बुद्धि रासो
उपरोक्त रासो ग्रन्थों में से कुछ का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है
1. बीसलदेव रासो (Bisaldev Raso)
बीसलदेव रासो ग्रन्थ के रचयिता 'नरपतिनाल्ह' थे। इसका रचनाकाल 1515 ई. था। यह हिन्दी के आदिकाल की एक श्रेष्ठ काव्य कृति है। इसमें भोज परमार की पुत्री राजमती और अजमेर के चौहान राजा बीसलदेव तृतीय के विवाह, वियोग एवं पुनर्मिलन की कथा सरस शैली में प्रस्तुत की गई है। राजमती की बातों से रुष्ट होकर स्वाभिमानी राजा उड़ीसा चला जाता है। बारह वर्ष तक राजमती उसके विरह में दुःखी रहती है। वह राजभवन की दीवारों को कोसती हुई वन में रहने की कामना करती है। सामन्ती जीवन के प्रति गहरी अरुचि का सजीव चित्रण इस काव्य में मिलता है।
बीसलदेव रासो 125 छन्दों की एक प्रेमपरक रचना है, जिसमें मेघदूत व सन्देश रासक की सन्देश परम्परा भी मिलती है। श्रृंगार के संयोग व वियोग पक्षों के अत्यन्त मार्मिक चित्र कवि ने प्रस्तुत किए हैं। कवि ने प्रकृति के रमणीय चित्रों से भी भाव-चित्रण को सौन्दर्य दिया है। बारह मासों तथा ऋतुओं के प्राकृतिक चित्र संयोग और वियोग में उद्दीपन का काम करते हैं।
2. खुमाण रासो (Khuman Raso)
खुमाण रासो के रचयिता 'दलपति विजय' नामक कवि थे। रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार इसका रचनाकाल 9वीं शताब्दी है, क्योंकि इसमें 9वीं सदी के चित्तौड़ नरेश खुमाण के युद्धों का चित्रण है। राजस्थान के कृत संग्राहकों ने इसको 17वीं शताब्दी की रचना बताया है, क्योंकि इसमें 17वीं शताब्दी के चित्तौड़ नरेश राजसिंह तक के राजाओं का वर्णन मिलता है, परन्तु यह सत्य नहीं है। वास्तविकता यह है कि इसका रचनाकाल 9वीं शताब्दी ही है। आरम्भिक हिन्दी के प्रयोग से इसी तथ्य के प्रमाण मिलते हैं। इस ग्रन्थ की प्रामाणिक हस्तलिखित प्रति पूना संग्रहालय में उपलब्ध है।
इस ग्रन्थ की रचना 5,000 छन्दों में की गई है। राजाओं के युद्धों एवं विवाहों के सरल वर्णनों से इस काव्य की भावभूमि का विस्तार हुआ है। वस्तुतः वर्णनों के अन्तर्गत नायिका भेद एवं षड्ॠतु वर्णन भी मिलता है। राजाओं की प्रशंसा काव्य का मुख्य प्रतिपाद्य है। काव्य वीर रस एवं श्रृंगार रस की धारा से ओत-प्रोत है। वस्तुतः वर्णनों में पर्याप्त रमणीयता है। दोहा, सवैया आदि छन्द प्रयुक्त हुए हैं। इसकी भाषा राजस्थानी हिन्दी है।
काव्यात्मक सरस वर्णन का उदाहरण -
3. परमाल रासो ( Parmal Raso )
परमाल रासो के रचयिता 'जगनिक' थे। जगनिक महोबा के राजा परमार्दिदेव का आश्रित था। इसने आल्हा एवं ऊदल दो वीर सरदारों की वीरतापूर्ण लड़ाइयों का वर्णन किया है। इसी आधार पर इसका रचनाकाल 13वीं शताब्दी माना जाता है। यह वीर रस प्रधान सर्वश्रेष्ठ रचना है। आज भी इसे ग्रामीण क्षेत्रों में गाया जाता है। श्रोताओं का हृदय वीर रस से भर जाता है।
सर्वप्रथम चार्ल्स इलियट ने इसका प्रकाशन 'आल्हा खण्ड' नाम से कराया था, जिसके आधार पर डॉ. श्यामसुन्दर दास ने परमाल रासो का पाठ निर्धारित कर उसे नागरी प्रचारिणी सभा में प्रकाशित कराया। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी इसकी अर्द्धप्रमाणिकता को ही स्वीकार करते हैं। पृथ्वीराज रासो की भाँति इसे भी अर्द्धप्रमाणिक कह सकते हैं।
4. पृथ्वीराज रासो (Prithviraj Raso)
पृथ्वीराज रासो इसकी रचना 'चन्दबरदाई' ने की है। इस ग्रन्थ का वर्ण्य-विषय पृथ्वीराज की वीरगाथा का वर्णन करना है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार पृथ्वीराज रासो को हिन्दी का प्रथम महाकाव्य माना जाता है।
चन्दबरदाई पृथ्वीराज का मित्र एवं दरबारी कवि था। पृथ्वीराज रासो के चार संस्करण प्रसिद्ध हैं। सबसे बड़ा संस्करण वह है, जिसका प्रकाशन नागरी प्रचारिणी सभा, 'काशी' से हुआ है। उस संस्करण की हस्तलिखित प्रतियाँ उदयपुर के संग्रहालय में सुरक्षित हैं। चौथा संस्करण सबसे छोटा है, जिसमें केवल 1300 छन्द हैं। इसी कारण इस ग्रन्थ को 'छन्दों का अजायबघर' भी कहा जाता है।
पृथ्वीराज रासो ऐतिहासिक चरित काव्य होने पर भी ऐतिहासिक तथ्यों से रहित है। रासो की प्रामाणिकता तो संदिग्ध है, परन्तु उसका काव्य सौन्दर्य अक्षुण्ण है। इसमें वीर व श्रृंगार रसों का सुन्दर प्रयोग हुआ है। पृथ्वीराज रासो वीर रस प्रधान ग्रन्थ है। इसके वृहत् संस्करण में 69 सर्ग हैं। यह हिन्दी का प्रथम महाकाव्य है। विजयपाल रासो एवं हम्मीर रासो अपभ्रंश की रचनाएँ हैं। हिन्दी साहित्य के इतिहास में पृथ्वीराज रासो सर्वाधिक विवादित रचना रही है।
पृथ्वीराज रासो एवं उसकी प्रमाणिकता
पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता के सन्दर्भ में विद्वानों में कई वर्ग बन गए हैं। डॉ. श्यामसुन्दर दास, मोहनलाल विष्णुलाल पाण्ड्या, मिश्र बन्धु, कर्नलटाड आदि विद्वानों ने यह माना है कि पृथ्वीराज रासो का जो संस्करण सभा से प्रकाशित हुआ है, वही प्रामाणिक है।
दूसरा वर्ग रामचन्द्र शुक्ल, कवि राजा श्यामलदास, गौरीशंकर, हीराचन्द ओझा, डॉ. बूलर, मुंशी देवी प्रसाद आदि विद्वानों का है, जो रासो को सर्वथा अप्रमाणिक ग्रन्थ घोषित करते हैं।
रामचन्द्र शुक्ल जी इसे अप्रामाणिक मानते हुए भी आदिकाल के अन्तर्गत ही स्थान देते हैं। तृतीय वर्ग के विद्वान् मुनि जिनविजय, डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी, डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी आदि हैं, जिनकी मान्यता है कि पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि चन्दबरदाई ने ही पृथ्वीराज रासो लिखा था, किन्तु उसका मूलरूप वर्तमान में उपलब्ध नहीं है। चौथा वर्ग नरोत्तमदास जी का है, जिन्होंने कहा कि चन्दबरदाई ने पृथ्वीराज के दरबार में रहकर मुक्तक रूप में रासो की रचना की। इनके मत से कोई भी विद्वान् सहमत नहीं है।
5. हम्मीररासो (Hammir Raso)
'प्राकृतपैंगलम' में इस काव्य के कुछ छंद मिले थे और उन्हीं के आधार पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसके अस्तित्व की कल्पना की थी। उनका अनुमान था कि इसमें हम्मीर और अलाउद्दीन के युद्धों का वर्णन तथा हम्मीर की प्रशंसा चित्रित होगी। किंतु राहुल जी ने उन पद्यों को जज्जल नामक किसी कवि की रचना घोषित किया है।
डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी का कथन है कि 'हम्मीर' शब्द अमीर का विकृत रूप है, जो किसी पात्र का नाम न हो कर एक विशेषण के रूप में प्रयुक्त होता रहा है। अतः शाङ्गधरकृत 'हम्मीररासो' का अस्तिव संकट में पड़ा हुआ है। अभी तक इसकी कोई प्रति उपलब्ध नहीं हो सकी है।
6. विजयपाल रासो (Vijaypal Raso)
विजयपाल रासो की रचना संवत् 1607 वि. के आसपास नल्ह सिंह भाट द्वारा की गई। नल्ल नल्ह सिंह भाट का प्रामाणिक जीवनवृत्त उपलब्ध नहीं हैं। विजयपाल रासो में कहा गया है कि इसका लेखक विजयगढ़ (करौली) के यदुवंशी शासक का दरबारी था। यदि इस कथन को सत्य मानें तो विजयपाल रासो का रचनाकाल सं. 1100 वि. के आसपास का ठहरेगा, जो एकदम असम्भव है। रचना में उल्लिखित तमाम वस्तुओं से यह साबित हो जाता है कि इस ग्रन्थ का प्रणयन सं. 1600 वि के आसपास हुआ है। इस कृति में विजयपाल की दिग्विजय का काव्यमय वर्णन हुआ है। रचना में वीर रस की प्रधानता है। अब तक इस कृति के 42 छन्द ही प्राप्त हो सके हैं।
7. बुद्धि रासो (Buddhi Raso)
बुद्धि रासो के रचयिता कवि जल्ह हैं। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि कवि जल्ह चन्दबरदाई का बेटा जल्हण है, जिसे पृथ्वीराज रासो की रचना का भार सौंपकर चन्द गोर देश चला गया था। बुद्धिरासो के रचनाकाल के बारे में प्रामाणिक तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। अब तक यह ग्रन्थ अप्रकाशित है। इसके अध्येताओं ने जो कुछ लिखा है, उसी के आधार पर इस ग्रन्थ पर प्रकाश डाला जा सकता है।
माताप्रसाद गुप्त के अनुसार यह रचना 140 छन्दों में समाप्त हुई है और इसमें दोहा, छप्पय, गाहा, पद्धड़िया, मुडिल्ल आदि छन्द व्यवहृत हुए हैं। यह एक प्रेमकथा है। चम्पावती नगरी का राजकुमार राजधानी से आकर कुछ दिनों के लिए जलधितरंगिनी के साथ समुद्र के किनारे किसी स्थान पर रहता है। कुछ समय बाद एक मास में लौटने का वचन देकर वह कहीं चला जाता है। अवधि के बाद भी कई मास बीत जाते हैं, किन्तु वह लौटता नहीं, तब विरहणी जलधितरंगिनी जीवन से विरक्त हो जाती है और अपने आभूषण आदि उतार फेंकती है।
इस पर उसकी माँ उसके समक्ष संसार के विलास-वैभव तथा शारीरिक सुखों की महत्ता का प्रतिपादन करने लगती है। इतने ही में राजकुमार वापस आ पहुँचता है और दोनों का पुनर्मिलन हो जाता है, जिसके अनन्तर दोनों आनन्द और उत्साह के साथ जीवन व्यतीत करने लगते हैं।
इन सभी रासो ग्रन्थों में शृंगार (विशेष रूप से वियोग शृंगार) का सुन्दर वर्णन हुआ है। काव्य की दृष्टि से सन्देशरासक और बीसलदेव रास को छोड़कर अन्य किसी ग्रन्थ का कोई विशेष महत्त्व नहीं है।
उपरोक्त ग्रंथ के अतिरिक्त रासो ग्रन्थ
इन ग्रंथो के अतिरिक्त अन्य आदिकालीन रासो ग्रंथ एवं उनके कवियों के नाम इस प्रकार है -
| क्रमांक | रचना | कवि |
|---|---|---|
| 1 | जयमयंक जस चंद्रिका | मधुकर |
| 2 | मुंज रासो | मुंज कवि |
| 3 | रणमल छंद | श्रीधर |
| 4 | भरतेश्वर बाहुबलि रास | शालिभद्र सूरि |
| 5 | जयचंद प्रकाश | भट्ट केदार |
| 6 | परमात्म प्रकाश | जोईंदु |
| 7 | स्थूलिभद्र रास | जिन्न धर्म सूरि |
| 8 | राम रासो | माधवदास चारण |
रासो ग्रंथों की भाषा
रासो ग्रंथों की भाषा के मुख्य रूप : डिंगल और पिंगल भाषा
वीरगाथाकालीन रासो काव्य की एक अन्य उल्लेखनीय विशेषता डिंगल और पिंगल भाषा का प्रयोग है। उस समय की साहित्यिक राजस्थानी भाषा को आज के विद्वान डिंगल नाम से जानते हैं। यह भाषा वीरत्व के स्वर के लिए उपयुक्त थी। चारण कवि अपनी कविता राजदरबार में ऊँचे स्वर में गाते या पढ़ते थे।
डिंगल का प्रयोग प्रायः युद्ध-वर्णन के लिए तथा पिंगल का प्रयोग विवाह और प्रेम के प्रसंगों के वर्णन के लिए किया जाता था। इस प्रकार युद्ध-वर्णन के लिए डिंगल और प्रेम अथवा विवाह-वर्णन के लिए पिंगल भाषा का प्रयोग होता था।
रासो साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ
आदिकालीन रासो साहित्य मूलतः सामंती व्यवस्था, प्रकृति और संस्कार से उपजा हुआ साहित्य है, जिसका मुख्य स्वर वीरत्व रहा है। इस काल के रचनाकार मुख्य रूप से हिंदू राजपूत राजाश्रय में रहने वाले चारण या भाट थे। समाज में उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था और उनका सीधा संबंध राजाओं से होता था। ये कला-रचना के साथ-साथ युद्ध-कला में भी निपुण थे तथा युद्ध के समय विरुदावली गाते हुए सेना की अगुवाई करते थे।
चारण कवि राजाओं, आश्रयदाताओं, वीर पुरुषों और सैनिकों की युद्ध-घटनाओं का वर्णन करते थे। इनमें वीरतापूर्ण घटनाओं को प्रभावशाली बनाने के साथ उनकी यथार्थपरक स्थितियों और संदर्भों का भी चित्रण मिलता है। वीरोचित भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए ‘रासक’ या ‘रासो’ छंद का प्रयोग किया गया। इसी कारण इनके द्वारा रचित साहित्य को ‘रासो साहित्य’ कहा गया।
रासो साहित्य या चारणी साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
1. संदिग्ध रचनाएँ
इस काल की प्रायः सभी रासो रचनाएँ ऐतिहासिकता की दृष्टि से संदिग्ध मानी जाती हैं। इस काल की चार प्रमुख रचनाएँ ‘खुमान रासो’, ‘बिसलदेव रासो’, ‘पृथ्वीराज रासो’ तथा ‘परमाल रासो’ हैं। भाषा-शैली और विषय-सामग्री की दृष्टि से इनमें कई शताब्दियों तक परिवर्तन और परिवर्धन होते रहे, जिसके कारण इनका मूल रूप दब गया। यह भी निश्चित नहीं कहा जा सकता कि ये ग्रंथ आश्रयदाताओं के समय में ही लिखे गए हों।
2. ऐतिहासिकता का अभाव
आदिकलीन रासो रचनाओं में इतिहास के प्रसिद्ध चरित्रों को नायक बनाया गया है, लेकिन उनका वर्णन युद्ध-इतिहास की कसौटी पर पूरी तरह खरा नहीं उतरता। कवियों द्वारा दिए गए संवत् और तिथियाँ इतिहास से मेल नहीं रखतीं तथा इतिहास की अपेक्षा कल्पना और अतिशयोक्ति का अधिक प्रभाव दिखाई देता है। पृथ्वीराज रासो में पृथ्वीराज को उन राजाओं का भी विजयी बताया गया है, जो उनसे कई शताब्दियों पूर्व अथवा पश्चात् विद्यमान थे।
3. युद्धों का सजीव वर्णन
युद्ध-वर्णन रासो ग्रंथों की प्रमुख विशेषता है। चारण कवि केवल मसिजीवी नहीं थे, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर स्वयं युद्ध भी करते थे। इसलिए उनके युद्ध-वर्णन में सेनाओं की गतिविधियों, आक्रमण की रीतियों और शस्त्रों की झनकार का अत्यंत सजीव चित्रण मिलता है। आंतरिक कलह और बाहरी आक्रमणों के इस समय में अपने आश्रयदाताओं को युद्ध के लिए उत्साहित करना भी कवियों का प्रमुख कर्तव्य-सा बन गया था।
4. युद्धों के प्रमुख कारण
वीरगाथा काल में युद्ध निरंतर होते थे। इनके मूल में कनक, कामिनी और भूमि में से कोई एक प्रमुख कारण दिखाई देता है। नारी, साम्राज्य-विस्तार और राजकाज के लिए धन की आवश्यकता युद्ध के प्रमुख कारणों में शामिल थे। रासो काव्य में इनका उल्लेख मिलता है।
5. संकुचित राष्ट्रीयता
आदिकालीन राजा शूरवीर और पौरुष से परिपूर्ण थे, लेकिन उनमें व्यापक राष्ट्रीयता की भावना का अभाव था। वे अपने सीमित क्षेत्र को ही राष्ट्र मानते थे। इसका प्रभाव चारण कवियों पर भी पड़ा और उन्होंने जीविका के लिए अपने आश्रयदाताओं की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। देशद्रोही जयचंद को भी देशप्रेमी कहने वाले वीर चारण उस समय थे।
6. वीर और श्रृंगार रस
रासो ग्रंथों में वीर और श्रृंगार रस का सुंदर सम्मिश्रण मिलता है। वीर रस का प्रभावशाली रूप युद्ध-वर्णनों में दिखाई देता है, जबकि युद्धों के मूल में नारी को कारण मानने के कारण श्रृंगार रस का भी सजीव वर्णन हुआ है। उस समय की वीरता का आदर्श निम्न पंक्तियों में स्पष्ट होता है—
बरस अठारह क्षत्री जिये आगे जीवन को धिक्कार।।
7. नारी के वीर रूप का वर्णन
वीरगाथाकालीन कवियों ने नारी के वीर रूप का भी चित्रण किया है। उस समय नारियाँ वीर पुरुष को पति अथवा पुत्र के रूप में पाना अपना सौभाग्य समझती थीं। वे अपने पति को युद्धभूमि से पराजित होकर लौटते हुए नहीं देखना चाहती थीं और वीरगति को गौरव की दृष्टि से देखती थीं।
इसका उदाहरण है—
लज्जेजं तु वयांसिअहु जै भग्गा धरू एंतु।
अर्थ— हे बहिन! भला हुआ जो मेरा पति युद्ध में मारा गया। यदि वह भागकर आ जाता तो मुझे अपनी सखियों से लज्जित होना पड़ता।
8. आश्रयदाताओं की अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा
चारण और भाट कवियों ने अपने आश्रयदाताओं की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। उन्होंने राजाओं को ब्रह्म, इंद्र आदि देवताओं से भी बढ़कर शूर और वीर बताया। सामंती व्यवस्था में राजा को सर्वोपरि माना जाता था और छोटे-छोटे राजा साम्राज्य-विस्तार के लिए आपस में संघर्ष करते थे। इसी राजाश्रय के कारण रासो काव्य में आश्रयदाताओं की प्रशंसा और अतिशयोक्ति प्रमुख रूप से दिखाई देती है।
9. जन-जीवन से संपर्क का अभाव
चारण कवियों का मुख्य संबंध राजाओं और सामंतों से था। इसलिए उनकी रचनाओं में राजा, सामंत, योद्धा और युद्ध का जीवन अधिक उभरकर आया है, जबकि सामान्य जनजीवन के घात-प्रतिघातों का अपेक्षाकृत अभाव है। इन कवियों का उद्देश्य मुख्यतः अपने आश्रयदाताओं का गुणगान करना था।
10. प्रकृति-चित्रण
रासो साहित्य में प्रकृति का आलम्बन और उद्दीपन, दोनों रूपों में चित्रण मिलता है। नगर, नदी और पर्वत आदि के वस्तुवर्णन भी मिलते हैं। हालांकि प्रकृति का स्वतंत्र चित्रण बहुत कम है और अधिकतर उसका प्रयोग उद्दीपन रूप में किया गया है। छायावादी काव्य जैसी उदात्त प्रकृति-चित्रण शैली यहाँ नहीं मिलती।
11. काव्य के दो रूप
आदिकालीन रासो रचनाएँ मुक्तक और प्रबंध, दोनों रूपों में मिलती हैं। मुक्तक काव्य का प्राचीन उपलब्ध ग्रंथ ‘बीसलदेव रासो’ तथा प्रबंध काव्य का प्राचीन उपलब्ध ग्रंथ, जिसे महाकाव्य कहा जाता है, ‘पृथ्वीराज रासो’ है। इन दो रूपों के अतिरिक्त इस साहित्य में काव्य-रूपों की विशेष विविधता नहीं मिलती। ‘जयचंद प्रकाश’ तथा ‘जयमयंक जसचंद्रिका’ इसी कोटि के ग्रंथ हैं।
12. ‘रासो’ शब्द
आदिकालीन साहित्यिक ग्रंथों के साथ ‘रासो’ शब्द जुड़ा हुआ है, जिसे काव्य शब्द का पर्यायवाची माना गया है। ‘रासो’ शब्द की व्युत्पत्ति के संबंध में विभिन्न विद्वानों के अलग-अलग मत हैं। आचार्य शुक्लजी ‘रासो’ शब्द का संबंध रहस्य से मानते हैं, जबकि ‘बीसलदेव रासो’ में इसका अर्थ रसायन का परिचायक है, जिसका संबंध मूल कथानक से है। मूल रूप में ‘रासो’ शब्द एक छंद के लिए प्रयुक्त हुआ है, जिसका उपयोग अपभ्रंश साहित्य में हुआ है।
13. छंदों का विविध प्रयोग
वीरगाथाकालीन रासो साहित्य में छंदों का अत्यंत विविध प्रयोग हुआ है। दोहा, त्रोटक, सोरठा, छप्पय, गाथा, सटक, रोला, उल्लाला और कुण्डलियाँ आदि छंदों का प्रयोग बड़ी कलात्मकता के साथ किया गया है। ‘पृथ्वीराज रासो’ में छंदों का परिवर्तन और प्रयोग बहुत अधिक मात्रा में हुआ है, फिर भी मूल कथानक में बाधा उत्पन्न नहीं होती।
डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी पृथ्वीराज रासो के संबंध में लिखते हैं—
“रासो के छंद जब बदलते हैं, तो श्रोता के हृदय में प्रसंगानुकूल कम्पन उत्पन्न करते हैं।”
14. अलंकार
वीरगाथाकालीन चारण कवियों ने अलंकारों पर विशेष ध्यान नहीं दिया, फिर भी उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का स्थान-स्थान पर सुंदर प्रयोग मिलता है। पृथ्वीराज रासो में कुछ अलंकारों का प्रयोग सजीव एवं सुंदर रूप में हुआ है। उत्प्रेक्षा तथा अतिशयोक्ति अलंकारों का उदाहरण देखिए—
बौह वैस सजिता समिप अमृत रस पिन्नीपा।।
इस प्रकार इस साहित्य में अलंकारों की संख्या भले ही अधिक न हो, लेकिन जिन अलंकारों का प्रयोग हुआ है, वे सजीव एवं सुंदर हैं।
निष्कर्ष :
रासो काव्य हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है। इसमें वीरता, राष्ट्रीय चेतना संस्कृति तथा इतिहास का अद्भुत समन्वय मिलता है। यद्यपि इसकी ऐतिहासिव प्रामाणिकता पर विवाद है, फिर भी साहित्यिक दृष्टि से इसका महत्व अत्यं विशिष्ट है। रासो काव्य ने हिंदी साहित्य को वीरगाथा परंपरा, ओजस्वी भाष और राष्ट्रीय गौरव की अमूल्य विरासत प्रदान की है।
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