आदिकालीन जैन साहित्य: प्रमुख कवि, रचनाएँ, विशेषताएँ एवं महत्वपूर्ण तथ्य

आदिकालीन साहित्‍य को मुख्‍य रूप से छह प्रमुख धाराओं या प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है। जो निम्‍न है -

  1. सिद्ध साहित्य
  2. जैन साहित्य
  3. नाथ साहित्य
  4. रासो साहित्य
  5. लौकिक साहित्य
  6. गद्य साहित्य

इस पोस्‍ट में हम आदिकालीन जैन साहित्‍य को विस्‍तार से जानेगें। 

 आदिकालीन जैन साहित्‍य का संक्षिप्‍त परिचय 

विषय जानकारी
साहित्य आदिकालीन जैन साहित्य
काल-क्रम आदिकाल का आरंभिक चरण
प्रमुख काव्यरूप रास, फागु, चरित, आचार
प्रमुख कवि स्वयंभू, पुष्पदंत, देवसेन, शालिभद्र सूरि आदि
प्रमुख रचनाएँ श्रावकाचार, भरतेश्वर बाहुबली रास, चंदनबाला रास, स्थूलिभद्र रास, नेमिनाथ रास आदि
मुख्य विशेषताएँ उपदेशात्मकता, धार्मिक-नैतिक शिक्षा, सामाजिक चित्रण, लोकभाषा का प्रयोग और शांत/निर्वेद रस की प्रधानता
मुख्य उद्देश्य धर्म, सदाचार, आत्मसंयम और मोक्ष की भावना का प्रचार

    आदिकालीन जैन साहित्य

    हिंदी साहित्य की उत्पत्ति और विकास में जैन धर्म का बहुत योगदान है। जिस प्रकार हिंदी के पूर्वी क्षेत्र में सिद्धों ने बौद्ध धर्म के वज्रयान मत का प्रचार हिंदी कविता के माध्यम से किया, उसी प्रकार पश्चिमी क्षेत्र में जैन साधुओं ने अपने मत का प्रचार हिंदी कविता के माध्यम से किया। 

    आदिकाल के जैन कवियों की रचनाएँ आचार, रास, फागु चरित आदि विभिन्न शैलियों में मिलती हैं। आचार शैली में घटनाओं के स्थान पर उपदेशात्मकता को प्रधानता दी जाती है। फागु व चरित काव्य शैली सामान्यता के लिए प्रसिद्ध है। रास शब्द संस्कृत साहित्य में क्रीड़ा और नृत्य से सम्बन्धित था। भरतमुनि ने इसे क्रीड़ानीयक कहा।

    जैन साधुओं ने 'रास' को एक प्रभावशाली रचना शैली का रूप दिया। जैन तीर्थंकरों के जीवनचरित तथा वैष्णव अवतारों की कथाएँ जैन आदर्शों के आवरण में 'रास' नाम से ही पद्यबद्ध की गई थीं। चौदहवीं शताब्दी तक इस पद्धति का प्रचार रहा, इसलिए जैन साहित्य का सबसे लोकप्रिय रूप 'रास' ग्रन्थ बन गया। 

    वीरगाथाओं में 'रास' को ही रासो कहा गया, परन्तु उनकी विषय भूमि जैन रास ग्रन्थों से भिन्न -हो गई थी। आदिकालीन जैन साहित्य में 'भरतेश्वर बाहुबली रास' को जैन साहित्य की रास परम्परा का प्रथम ग्रन्थ माना जाता है। इसकी रचना 1184 ई. में शालिभद्र सूरि ने की थी।

    आदिकालीन जैन साहित्य: प्रमुख कवि, रचनाएँ, विशेषताएँ एवं महत्वपूर्ण तथ्य

    जैन शब्‍द का अर्थ एवं संक्षिप्‍त परिचय

    जैन शब्द का अर्थ है, 'जिन' के अनुयायी। जैन शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के 'जिन' शब्द से हुई है। 'जिन' शब्द का अर्थ है, विजेता। जैन धर्म के अनुयायी राग-द्वेष को जीतने वाले होते हैं। 

    जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) तथा अन्तिम तीर्थंकर भगवान वर्धमान महावीर हैं।

    जैन साहित्‍य की परिभाषा - 12 से 13 वीं शताब्दियों के मध्य जैन कवियों द्वारा अपने धर्म का प्रचार-प्रसार करने के लिए जिस साहित्य की रचना हुई, उसे जैन या रास साहित्य के नाम से जाना जाता है।

    आदिकालीन जैन साहित्यिक रचनाएँ

    आदिकालीन जैन साहित्य की प्रमुख रचनाएँ निम्न हैं -

    (1) श्रावकाचार : 

    देवसेन नामक प्रसिद्ध जैन आचार्य ने 933 ई. में इस काव्य की रचना की थी। ये एक अच्छे कवि तथा उच्च कोटि के चिंतक थे। इन्होंने अपभ्रंश में भी 'दब्ब-सहाव-पयास' नामक काव्य लिखा था। हिंदी में लिखित इनकी अन्य रचनाएं 'लघुनयचक्र' तथा 'दर्शनसार' हैं, जो काव्य की सीमा में नहीं आतीं। 'श्रावकाचार' में 250 दोहों में श्रावक-धर्म का प्रतिपादन किया गया है। कवि ने गृहस्थ के कर्तव्यों पर भी विस्तार से विचार किया है। इसकी रचना दोहा छंद में हुई है। एक उदाहरण इस प्रकार है :

    जो जिण सासण भाषियउ, सो मइ कहियउ सारु। 
    जो पालइ सइ भाउ करि, सो सरि पावइ पारु ॥

    (2) भरतेश्वर-

    बाहुबली रास मुनि जिनविजय ने इस ग्रंथ को जैन साहित्य की रास-परंपरा का प्रथम ग्रंथ माना है। इसकी रचना 1184 ई. में शालिभद्र सूरि ने की थी। ये अपने समय के प्रसिद्ध जैन आचार्य तथा अच्छे कवि थे। इस ग्रंथ में भरतेश्वर तथा बाहुबली का चरित-वर्णन है। ये दोनों चरित-नायक संस्कृत, प्राकृत तथा अपभ्रंश में भी काव्य-रचना का विषय रहे हैं। प्रस्तुत कृति में इनकी जो कथा वर्णित है, उसमें इन्हें अयोध्यावासी ऋषभ जिनेश्वर के यहां सुनंदा और सुमंगला से उत्पन्न बताया गया है। भरत आयु में बड़े थे एवं पराक्रमी भी अधिक थे। वे अयोध्या के राजा बनाये गये और बाहुबली को तक्षशिला का राज्य मिला। कवि ने दोनों राजाओं की वीरता, युद्धों आदि का विस्तार से वर्णन किया है, किंतु हिंसा और वीरता के पश्चात विरक्ति और मोक्ष के भाव प्रतिपादित करना कवि का मुख्य लक्ष्य रहा है। अतः वीर और श्रृंगार रसों का निर्वेद में अंत हुआ है। 205 छंदों में रचित यह एक सुंदर खंडकाव्य है। इसकी भाषा में नाटकीयता, उक्तिवैचित्र्य तथा रसात्मकता के सर्वत्र दर्शन होते हैं। आगे की 'रास' या 'रासो' रचनाओं को इस ग्रंथ ने अनेक रूपों में प्रभावित किया है। इसकी कविता का एक उदाहरण यहां प्रस्तुत है :

    बोलह बाहुबली बलवन्त। लोह खण्डि तउ गरवीउ हंत। 

    चक्र सरीसउ चूनउ करिउं। सयलहं गोत्रह कुल संहरउं।

    (3) चंदनबालारास : 

    यह पैंतीस छंदों का एक लघु खंडकाव्य है, जिसकी रचना 1200 ई. के लगभग आसगु नामक कवि ने जालौर में की थी। इसकी कथा-नायिका चंदनबाला चंपा नगरी के राजा दधिवाहन की पुत्री थी। एक बार कौशांबी के राजा शतानीक ने चंपा नगरी पर आक्रमण किया, जिसमें उसका सेनापति चंदनबाला का अपहरण कर ले गया और एक सेठ को बेच दिया। सेठ की स्त्री ने उसे अपार कष्ट दिया। चंदनबाला अपने सतीत्व पर अटल रह कर सब दुःख सहती रही और अंत में महावीर से दीक्षा ले कर मोक्ष को प्राप्त हुई। इस लघु कथानक पर आधारित यह जैन-रचना करुण रस की गंभीर व्यंजना करती है। भाव सौंदर्य के जितने चित्र इसके रचयिता ने अंकित किये हैं, सभी में उसकी काव्य-निष्ठा व्यंजित है।

    (4) स्थूलिभद्ररास : 

    1209 ई. में रचित इस काव्य को जिनधर्मसूरि की कृति माना जाता है। स्थूलिभद्र और कोशा वेश्या के विषय में अन्य रचनाएं भी मिलती हैं, किंतु इस कृति की सभी घटनाओं से उनका प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। अवांतर घटनाओं के माध्यम से लौहघट के रूप में स्थूलिभद्र का संयम चित्रित करके कवि ने काव्य को विशिष्ट बना दिया है। कोशा वेश्या के पास भोगलिप्त रहने वाले स्थूलिभद्र को कवि ने जैनधर्म की दीक्षा लेने के बाद मोक्ष का अधिकारी सिद्ध किया है।

    काव्य की भाषा पर अपभ्रंश का प्रभाव अधिक है, फिर भी इसकी भाषा का मूल रूप हिंदी है। धार्मिक दृष्टि से प्रेरित होने पर भी इसकी भावभूमि और अभिव्यंजना काव्यानुकूल है।

    (1) रेवंतगिरिरास : 

    यह विजयसेन सूरि की काव्यकृति है। 1231 ई. के लगभग लिखित इस काव्य में तीर्थंकर नेमिनाथ की प्रतिमा तथा रेवंतगिरि तीर्थ का वर्णन है। यात्रा तथा मूर्ति-स्थापना की घटनाओं पर आधारित यह 'रास' वास्तुकलात्मक सौंदर्य का भी आकर्षण प्रस्तुत करता है। प्रकृति के रमणीक चित्र इस काव्य के भाव तथा कला पक्ष का श्रृंगार करते हैं। एक उदाहरण देखिए :

    कोयल कलयलो मोर केकारओ 
    सम्मए महुयर महुर गुंजारवो। 
    जलद जाल बंबाले रीझरणि रमाउलु रेहइ, 
    उज्जिल सिहरू अलि कज्जल सामलु ॥

    नेमिनाथरास : 

    इस काव्य की रचना सुमति गणि ने 1213 ई. में की थी। अट्ठावन छंदों की इस रचना में कवि ने नेमिनाथ का चरित्र सरस शैली में प्रस्तुत किया है। नेमिनाथ के प्रसंग में श्रीकृष्ण का वर्णन इस काव्य का विषय है और इन दोनों के माध्यम से विभिन्न भावों की व्यंजना हुई है। रचना की भाषा अपभ्रंश से प्रभावित राजस्थानी हिंदी है।

    जैन साहित्य के प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ

    आदिकालीन जैन साहित्य के प्रमुख कवियों तथा उनकी प्रसिद्ध रचनाओं का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है—

    (1) स्वयंभू

    हिंदी के जैन कवियों में सर्वप्रथम स्वयंभू का नाम लिया जाता है। स्वयंभू का रचनाकाल अनुमानतः आठवीं शताब्दी माना जाता है। भयाणी नामक विद्वान ने सबसे पहले स्वयंभू को ‘अपभ्रंश का वाल्मीकि’ कहा था।

    स्वयंभू ने निम्नलिखित चार ग्रंथों की रचना की—

    1. पउमचरिउ
    2. रिट्ठणेमि चरित
    3. पचामचरिउ
    4. स्वयंभू छंद

    इनमें ‘पउमचरिउ’ स्वयंभू की प्रसिद्धि का प्रमुख आधार है। इसमें राम-कथा को एक नवीन रूप प्राप्त हुआ है। कवि ने राम की कथा को जैन धर्म का स्पर्श प्रदान किया है। ‘पउमचरिउ’ में विलाप और युद्धों का वर्णन अत्यंत कुशलता से किया गया है। उपेक्षित पात्रों के प्रति भी स्वयंभू की विशेष दृष्टि रही है। उन्होंने भरत और विभीषण के चरित्रों को नवीन वैभव प्रदान किया है।

    कथा के अंत में राम निर्वाण प्राप्त करते हैं और मुनीन्द्र उपदेश देते हैं कि राग से दूर रहकर ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है। महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने स्वयंभू को भारत के आधे दर्जन महाकवियों में स्थान दिया है।

    (2) पुष्पदंत

    स्वयंभू के बाद पुष्पदंत जैन साहित्य के प्रतिष्ठित कवियों में माने जाते हैं।

    पुष्पदंत के चार प्रमुख ग्रंथ प्रसिद्ध हैं—

    1. महापुराण
    2. जसहर चरिउ
    3. णाय कुमार चरिउ
    4. कोश ग्रंथ

    प्रारंभ के तीन ग्रंथों की रचना धार्मिक उद्देश्य से हुई है। फलस्वरूप साहित्यिक शिल्प और तात्त्विक दृष्टि से इन पर ‘जिन-भक्ति’ का प्रभाव सर्वत्र दिखाई देता है।

    ‘महापुराण’ में अनेक घटनाओं और चरित्रों का वर्णन किया गया है। कवि ने 63 महापुरुषों के जीवन की घटनाओं को वर्णन का विषय बनाया है। प्रसंगवश इसमें राम-कथा को भी स्थान प्राप्त हुआ है। इसमें जैन धर्म का उत्कृष्ट रूप प्रतिपादित किया गया है। अपभ्रंश में कृष्ण-कथा का प्रथम रूप भी हमें इसी ग्रंथ में प्राप्त होता है।

    पुष्पदंत की तीन प्रमुख उपाधियाँ हैं—

    • काव्य रत्नाकर
    • कवि कुल तिलक
    • अभिमान मेरु

    ‘महापुराण’ की रचना के आधार पर भयाणी ने पुष्पदंत को ‘अपभ्रंश का वेदव्यास’ कहा है। इसी रचना के आधार पर उन्होंने ‘अभिमान मेरु’ की उपाधि धारण की।

    (3) हेमचंद्र सूरी

    हेमचंद्र सूरी को जैन धर्म का ‘शंकराचार्य’ तथा ‘कलिकाल सर्वज्ञ’ कहा जाता है। संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश का एक साथ प्रयोग करके उन्होंने अपने भाषा-ज्ञान का परिचय दिया। उनके बचपन का नाम चंगदेव था। वे बहुत बड़े वैयाकरण थे।

    हेमचंद्र सूरी गुजरात के सोलंकी राजा जयसिंह सिद्धराज तथा उनके पुत्र कुमारपाल के आश्रित थे। उन्होंने अपनी कृतियों में प्राचीन हिंदी के जीवित उदाहरणों को सुरक्षित करके साहित्य का बहुत बड़ा उपकार किया।

    हेमचंद्र सूरी के छह प्रमुख ग्रंथ हैं—

    1. कुमारपाल चरित
    2. प्राकृतानुशासन
    3. छंदानुशासन
    4. हेमचंद्र शब्दानुशासन
    5. त्रिसष्टि शालाकापुरुष चरित
    6. देशीनाममाला कोश

    इनमें ‘कुमारपाल चरित’ और ‘हेमचंद्र शब्दानुशासन’ प्राकृत व्याकरण एवं भाषा की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इनमें अपभ्रंश के उदाहरण भी मिलते हैं।

    (4) मुनि रामसिंह

    मुनि रामसिंह जैन रचनाकारों में सर्वश्रेष्ठ रहस्यवादी कवि माने जाते हैं। उनकी विचारधारा सिद्ध रहस्यवाद से मिलती-जुलती है।

    मुनि रामसिंह का प्रसिद्ध ग्रंथ ‘पाहुड़ दोहा’ है।

    मुनि रामसिंह ने ‘पाहुड़ दोहा’ की रचना 11वीं शती में की थी। इसमें 222 दोहे हैं। इस ग्रंथ में इंद्रिय सुख तथा अन्य सांसारिक सुखों की निंदा की गई है और त्याग, आत्मज्ञान तथा आत्मानुभूति को महत्व दिया गया है। जैन दर्शन में समस्त श्रुत ज्ञान को ‘पाहुड़’ कहा जाता है।

    (5) आचार्य देवसेन

    आचार्य देवसेन अच्छे कवि होने के साथ-साथ उच्च कोटि के चिंतक भी थे। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं—

    1. श्रावकाचार
    2. लघुनयनचक्र
    3. दर्शनसार
    4. दब्ब-सहाव-पयास
    5. आराधना सार
    6. तत्व सार
    7. वृहतनय चक्र

    आचार्य देवसेन ने 933 ई. में ‘श्रावकाचार’ की रचना की थी। ‘श्रावकाचार’ में 250 दोहे प्राप्त होते हैं। इन दोहों में श्रावक-धर्म का प्रतिपादन किया गया है। इस रचना में गृहस्थ जीवन के कर्तव्यों की सुंदर व्याख्या मिलती है। इसकी रचना दोहा छंद में हुई है।

    (6) शालिभद्र सूरि

    शालिभद्र सूरि अपने समय के प्रसिद्ध जैन आचार्य और अच्छे कवि थे।

    शालिभद्र सूरि की तीन प्रमुख रचनाएँ हैं—

    1. भरतेश्वर बाहुबली रास
    2. पंच पांडव चरित रास
    3. बुद्धि रास

    शालिभद्र सूरि ने ‘भरतेश्वर बाहुबली रास’ की रचना 1184 ई. में की थी। मुनि जिनविजय ने इस ग्रंथ को जैन साहित्य की रास परंपरा का प्रथम ग्रंथ माना है। इसे जैन परंपरा का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ माना जाता है।

    250 छंदों में रचित यह एक सुंदर खंडकाव्य है। इसमें भरतेश्वर तथा बाहुबली के चरित का वर्णन किया गया है। कवि ने दोनों राजाओं की वीरता और युद्धों आदि का विस्तार से वर्णन किया है, किंतु हिंसा और वीरता के बाद विरक्ति तथा मोक्ष के भावों को प्रतिपादित करना कवि का मुख्य उद्देश्य रहा है।

    इसकी भाषा में नाटकीयता, उक्ति-वैचित्र्य तथा रसात्मकता के दर्शन होते हैं। आगे की ‘रास’ अथवा ‘रासो’ रचनाओं को इस ग्रंथ ने अनेक रूपों में प्रभावित किया है।

    ‘पंच पांडव चरित रास’ हिंदी का प्रथम ऐतिहासिक रास ग्रंथ है।

    ‘बुद्धि रास’ 63 छंदों में रचित है, जिसका वर्ण्य विषय धर्मोपदेश है।

    (7) आसगु

    आसगु की प्रमुख रचनाएँ हैं—

    1. चंदनबाला रास
    2. जीवदया रास

    आसगु ने ‘चंदनबाला रास’ की रचना 1200 ई. में जालौर में की थी। ‘चंदनबाला रास’ 35 छंदों में लिखा गया एक सुंदर लघु खंडकाव्य है।

    इसकी कथा-नायिका चंदनबाला चंपा नगरी के राजा दधिवाहन की पुत्री थी। इस ग्रंथ में चंदनबाला के ब्रह्मचर्य, संयम, सतीत्व और उत्कर्ष का चित्रण किया गया है। यह रचना करुण रस की गंभीर व्यंजना करती है। कवि ने भाव-सौंदर्य के जितने चित्र अंकित किए हैं, उन सभी में उसकी काव्य-निष्ठा व्यक्त हुई है।

    (8) जिनधर्म सूरि

    जिनधर्म सूरि की प्रमुख रचना ‘स्थूलिभद्र रास’ है।

    जिनधर्म सूरि ने ‘स्थूलिभद्र रास’ की रचना 1209 ई. में की थी।

    इस काव्य में तीन प्रमुख पात्र हैं—कोशा वेश्या, स्थूलिभद्र तथा इनके गुरु भाई मुनि।

    इस ग्रंथ में स्थूलिभद्र के संयमित जीवन का चित्रण किया गया है। कोशा वेश्या के पास भोगलिप्त जीवन बिताने वाले स्थूलिभद्र को कवि ने जैन धर्म की दीक्षा लेने के बाद मोक्ष का अधिकारी सिद्ध किया है।

    काव्य की भाषा पर अपभ्रंश का प्रभाव अधिक है, फिर भी इसकी भाषा का मूल रूप हिंदी है।

    (9) विजयसेन सूरि

    विजयसेन सूरि की प्रमुख रचना ‘रेवंतगिरिरास’ है।

    विजयसेन सूरि ने ‘रेवंतगिरिरास’ की रचना 1231 ई. में की थी। यह एक ऐतिहासिक गीत-प्रधान ‘रास’ ग्रंथ है। इस काव्य में तीर्थंकर नेमिनाथ की प्रतिमा तथा रेवंतगिरी तीर्थ का वर्णन किया गया है।

    यात्रा तथा मूर्ति स्थापना की घटनाओं पर आधारित यह ‘रास’ वास्तुकलात्मक सौंदर्य का भी आकर्षक रूप प्रस्तुत करता है। प्रकृति के रमणीक चित्र इस काव्य के भाव तथा कलापक्षों का श्रृंगार करते हैं।

    (10) सुमति गणि

    सुमति गणि की प्रमुख रचना ‘नेमिनाथ रास’ है।

    सुमति गणि ने ‘नेमिनाथ रास’ की रचना 1213 ई. में की थी। यह 58 छंदों में रचित ग्रंथ है। इसमें नेमिनाथ के चरित्र को प्रस्तुत किया गया है।

    नेमिनाथ के प्रसंग में श्रीकृष्ण का वर्णन इस काव्य का विषय है और इन दोनों के माध्यम से विभिन्न भावों की व्यंजना हुई है। इस रचना की भाषा अपभ्रंश से प्रभावित राजस्थानी हिंदी है।

    (11) जोइन्दु

    जोइन्दु नीति-निष्ठ कवि थे।

    जोइन्दु की प्रमुख रचनाएँ हैं—

    • परमात्मप्रकाश
    • योगसार

    ‘परमात्मप्रकाश’ छठी सदी के धर्म, दर्शन एवं इंद्रिय-निग्रह को आधार बनाती है। जोइन्दु की इस रचना से अपभ्रंश में दोहा-काव्य का आरंभ होता है और इसकी परंपरा 15वीं शती तक चलती है। इनके दोहों में रूढ़ि और परंपरा पर आघात किया गया है।

    (12) धनपाल

    धनपाल जैन साहित्य के प्राचीन कवियों में माने जाते हैं।

    धनपाल का प्रमुख ग्रंथ ‘भविसयतकहा’ है।

    धनपाल ने ‘भविसयतकहा’ की रचना 10वीं शती में की थी। यद्यपि धर्म-भावना इसकी भी रीढ़ है, तथापि प्रत्यक्ष रूप से इसका संबंध लोक-हृदय की विभिन्न स्थितियों से है।

    इसमें एक वणिक की कथा को स्वाभाविक घटनाओं के संयोजन द्वारा हृदय के विभिन्न घात-प्रतिघातों की अभिव्यक्ति में पूर्ण सफल बनाया गया है। कवि ने अपने ग्रंथ में धार्मिक तत्वों के साथ काव्य-सौंदर्य की रक्षा के लिए कथा-प्रसंग को कहीं भी टूटने नहीं दिया।

    धनपाल की यह रचना चरित काव्यों की एक नई कड़ी है, जिसका प्रभाव आदिकालीन हिंदी रचनाओं पर भी पड़ा।

    (13) सोमप्रभ सूरी

    सोमप्रभ सूरी की प्रमुख रचना ‘कुमारपाल प्रतिबोध’ है।

    सोमप्रभ सूरी ने ‘कुमारपाल प्रतिबोध’ की रचना 13वीं शताब्दी में की थी।

    ‘कुमारपाल प्रतिबोध’ गद्य-पद्यमय संस्कृत-प्राकृत काव्य है। हेमचंद्र ने कुमारपाल को जैन धर्म संबंधी जो उपदेश दिए थे, उन्हीं का संग्रह सोमप्रभ सूरी ने ‘कुमारपाल प्रतिबोध’ ग्रंथ में किया। इस ग्रंथ में प्राकृत के बीच-बीच में अपभ्रंश का भी प्रयोग मिलता है।

    (14) मेरुतुंग

    मेरुतुंग का प्रमुख ग्रंथ ‘प्रबंध चिंतामणि’ है।

    मेरुतुंग ने ‘प्रबंध चिंतामणि’ की रचना 13वीं शताब्दी में की थी। यह ग्रंथ संस्कृत के ‘भोज प्रबंध’ के ढंग से लिखा गया है।

    मेरुतुंग ने ‘प्रबंध चिंतामणि’ में प्राचीन ऐतिहासिक व्यक्तियों और राजाओं के चरित्रों को कथारूप में संकलित किया। ‘प्रबंध चिंतामणि’ के कथानक को आधार बनाकर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ‘चारुचंद्रलेख’ उपन्यास लिखा है।

    (15) जिनदत्त सूरी

    जिनदत्त सूरी का प्रमुख ग्रंथ ‘उपदेशरसायन रास’ है।

    जिनदत्त सूरी ने ‘उपदेशरसायन’ की रचना 12वीं शताब्दी में की थी। रास-काव्य परंपरा की दृष्टि से यह ग्रंथ उल्लेखनीय है। 80 पद्यों का यह एक नृत्य-गीत काव्य है, जिसमें रासलीला का वर्णन भी किया गया है।

    (16) विनयचंद्र सूरि

    विनयचंद्र सूरि की प्रमुख रचना ‘नेमिनाथ चौपाई’ है।

    (17) कनकामरमुनि

    कनकामरमुनि की प्रमुख रचना ‘करकंड चरित’ है।

    (18) प्रज्ञा तिलक

    प्रज्ञा तिलक की प्रमुख रचना ‘कच्छुली’ है।

    (19) सार मूर्ति

    सार मूर्ति की प्रमुख रचना ‘जिनि पदम् सूरि रास’ है।

    (20) उदयवंत

    उदयवंत की प्रमुख रचना ‘गौतम स्वामी रास’ है।

    (हरिवंशपुराण) में जैन परम्परा के बाईसवें तीर्थकार अरिष्टनेमि तथा कृष्ण और कौरव पाण्डवों का वध वर्णित है। इसमें कवि ने द्रौदपी के चरित्र को एदकम निखार दयिा है नारी चरित्रों के प्रति कवि की अत्यधिक सहानुभूति स्पष्ट सामने आती है।

    एक नजर में जैन साहित्य के प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ

    क्रमांक जैन कवि रचना
    1 स्वयंभू पउमचरिउ, रिट्ठणेमिचरिउ
    2 पुष्पदंत महापुराण, जसहरचरिउ, णायकुमारचरिउ
    3 धनपाल भविसयत्तकहा
    4 योगीन्दु परमात्मप्रकाश
    5 देवसेन श्रावकाचार, दर्शनसार, लघुनयचक्र
    6 माइल्लधवल दव्वसहावपयास
    7 मुनि रामसिंह पाहुड़ दोहा
    8 कनकामर करकंड चरिउ
    9 नयनंदि सुदंसणचरिउ
    10 जिनदत्त सूरि उपदेश रसायन रास
    11 शालिभद्र सूरि भरतेश्वर बाहुबली रास
    12 आसगु चंदनबाला रास, जीवदया रास
    13 जिनधर्म सूरि स्थूलिभद्र रास
    14 विजयसेन सूरि रेवंतगिरि रास
    15 सुमति गुणि नेमिनाथ रास
    16 सोमप्रभ सूरि कुमारपाल प्रतिबोध
    17 हेमचंद्र कुमारपाल चरित, सिद्ध-हेम-शब्दानुशासन, देशीनाममाला
    18 मेरुतुंग प्रबंध चिंतामणि
    19 विनयचंद्र सूरि नेमिनाथ चउपई
    20 राजशेखर सूरि नेमिनाथ फागु
    21 विनयप्रभ उपाध्याय गौतम स्वामी रास

    आदिकालीन जैन साहित्य की विशेषताएँ

    अपभ्रंश साहित्य को जैन साहित्य कहा जाता है, क्योंकि अपभ्रंश साहित्य के रचयिता जैन आचार्य थे। जैन कवियों की रचनाओं में धर्म और साहित्य का मणिकांचन योग दिखाई देता है। जैन कवि जब साहित्य निर्माण में जुट जाता है तो उस समय उसकी रचना सरस काव्य का रूप धारण कर लेती है और जब वह धर्मोदपेश की ओर झुक जाता है तो वह पद्य बौद्ध धर्म उदपेशात्मक रचना बन जाती है। इस उदपेश प्रधान साहित्य में भी भारतीय जनजीवन के सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष के दर्शन होते है।

    आदिकालीन  जैन साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार है-

    (1) उपदेश मूलकता :-

    उदपेशात्मकता जैन साहित्य की मुख्य प्रवृत्ति है, जिसके मूल में जैन धर्म के प्रति दृढ आस्था और उसका प्रचार है। इसके लिए जैन कवियों ने दैनिक जीवन की प्रभावोत्पदाक घटनाएँ, आध्यात्म के पोषक तत्व, चरित नायकों, शलाका पुरूषों, दआर्श श्रावकों, तपस्वियों तथा पात्रों के जीवन का वर्णन किया है। इसीलिए इस साहित्य में उदपेशात्मकता का स्वर मुख्य बन गया है।

    (2) विषय की विविधता :-

    जैन साहित्य धार्मिक साहित्य होने के बावजूद सामाजिक, धार्मिक, ऐतिहासिक विषयों के साथ ही लोक-आख्यान की कई कथाओं को अपनाता है। रामायण, महाभारत सम्बन्धी कथाओं को भी जैन कवियों ने अत्याधिक दक्षता के साथ अपनाया है। जहाँ तक सामाजिक विषयों का सम्बन्ध है, जैन रचनाओं में लगभग सभी प्रकार के विषयों का समावेश हो गया है।

    (3) तत्कालीन स्थितियों का यथार्थ चत्रिण :-

    जैन कवि राजानित नहीं थे, अतः राजाश्रय का दवाव और दरबारी अतिरंजना से इनकी रचनाएँ मुक्त है। यही कारण है कि इनकी रचनाओं में तत्कालीन स्थितियों का यथार्थ अंकन हुआ है। आदकिालीन आचार-विचार, समाज, धर्म, राजनीति आर्दा की सही स्थितियों को जानने के लिए यह रचनाएँ पर्याप्त रूप में सहायक सिद्ध होती है।

    (4) कर्मकाण्ड़ रूढ़ियों तथा परम्पराओं का विरोध :-

    जैन अपभ्रंश कवियों ने बाहा उपासना, पूजा-पाठ, शास्त्रीय ज्ञान, रूढ़ियों और परम्पराओं का घोर विरोध किया है, किन्तु इनके स्वर में कटुता या परखड़ता नहीं मिलती। मंदरि, तीर्थ शास्त्रीय ज्ञान, मूर्ति, वेष, जाति, वर्ण, मंत्र, तंत्र, योग आर्दा किसी भी संस्था को यह नहीं मानते। चारित्रिक अथवा मन की शुद्धता को ये हर व्यक्ति के लिए एक आवश्यक वस्तु मानते है। धन-सम्पत्ति की क्षणिकता, विषयों की निन्दा, मानव देह की नश्वरता, संसार के सम्बन्धों का मिथ्यापन आदर्दा का वर्णन करते हुए इन कवियों ने शुद्ध आत्मा पर बल दया है।

    (5) आत्मानुभूति पर विश्वास :-

    आत्मानुभव को जैन कवियों ने चरम प्राप्तव्य कहा है और यह शरीर में रहता है। आत्मा को जानने के लिए शुभाशुभ कर्मों का क्षय करना आवश्यक है। आत्मा परमात्मा एक ही है। आत्मा को जान लेने के पश्चात् कुछ जानने के लिए नहीं रहता । आत्मानन्द ही सरसीभाव या सहजानन्द है। अपने साधन-पथ की व्याख्या करने के लिए इन्होंने जहाँ-तहाँ प्रेम-भावना के द्योतक प्रिय-प्रियतम की कल्पना का आश्रय लिया है। इसप्रकार इन जैन कवियों ने भोग से त्याग की, शास्त्रज्ञान से आत्मज्ञान की और कर्मकाण्ड से आत्मानुभूति की श्रेष्ठता सिद्ध की है। 

    (6) रहस्यवादी विचारधारा का समावेश :-

    जैन कवियों की कुछ रचनाएँ रहस्यदकी विचार भावना से ओत प्रोत है। योगिन्द्र मुनि रामसिंह, सुत्रभाचार्य, महानन्दि महचय आदर्दा इस कोटि के कवि है। इनको रहस्यदकी रचनाओं में बाह्य आचार, कर्मकाण्ड, तीर्थव्रत, मूर्ति का बहिष्कार, दे हरूपी देवालय में ही ईश्वर की स्थिति बताना, तथा अपने शरीर में स्थित परमात्मा की अनुभूति पाकर परम समाधि रुपी आनन्द प्राप्त करना आद िइनकी साधना का मुख्य स्वर है। यह आनन्द शरीर में स्थित परमात्मा गुरू (जिन गुरू) की कृपा से प्राप्त होता है, यह इनकी धारणा है।

    (7) काव्य रूपों में विविधता :-

    काव्य रूपों के क्षेत्र में जैन साहित्य विविध रूपों से सम्पन्न है। इसमें रास, फागु, छप्पय, चतुष्पदकिा, प्रबन्ध, गाथा, जम्नरी, गुर्वावली, गीत, स्तुति, माहात्म्य, उत्साह आदर्दा प्रकार पाये जाते है। अपभ्रंश के कई काव्य-रूपों का प्रयोग जैन कवियों ने किया है लेकिन अधिकांश काव्य रुप ऐसे भी है, जिनके निर्माण का श्रेय जैन साहित्य को जाता है।

    (8) शांत या निर्वेद रस का प्राधान्य :-

    जैन साहित्य में करुण, वीर, श्रृंगार, शान्त आर्दा सभी रसों का सफल निर्वाह हुआ है। 'नेमिचन्द चउपई' में करुण, 'मरतेश्वर बाहुबली रास' में वीर तथा 'श्रीस्थूलिभद्र फागु में श्रृन्गार इस की सफल निष्पत्ति पायी जाती है, किन्तु इन सभी कृतियों के अन्त में शान्त या निर्वेद सभी रसों पर हावी हो जाता है। इसीलिए यह कहना असंगत नहीं होगा कि जैन साहित्य में रसराज शान्त या निर्वेद है।

    (9) प्रेम के विविध रूपों का चित्रण :-

    जैन अपभ्रंश साहित्य में प्रेम के पाँच रूप मिलते हैं-विवाह के लिए प्रेम, विवाह के दबा प्रेम, असामाजिक प्रेम, रोमाण्टिक प्रेम और विषम प्रेम। प्रथम प्रकार के प्रेम का चित्रण 'करकंडुचरित' में हुआ है। दूसरे प्रकार के प्रेम का दाहरण 'पउमासिरिचरिउ' में समुद्र और पद्मश्री के प्रेमपूर्वक प्रेमपूर्वक विवाह विवाह में में मिलता मिलता है। है। 'जहसरचरिउ' में में रानी अमृतमयी का कुबड़े से जो प्रेम था, वह असामाजिक की कोटि में आता है। प्रेम की विषमता का ज्वलन्त दडाहरण 'पउमचरित' में रावण का प्रेम है, किंतु रोमाण्टिक प्रेम का ही इस साहित्य में अधिक प्रस्फुटत हुआ है। इसके दो कारण हैं प्रथम, सामंतदवी इस युग में बहुपत्नी प्रथा थी, दूसरा, धर्म की महिमा बताने के लिए। 

    (10) गीत तत्व की प्रधानता :-

    जैन कवियों की रचनाएँ शैली, स्वरूप और लक्ष्य की दृष्टि से गीत काव्य के अधिक निकट है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि गेयता इस युग की प्रमुख विशेषता थी। जैन कवियों द्वारा प्रयुक्त छन्दों में लय और गेयता का ध्यान रखा गया है। मंगलाचरण के अतिरिक्त स्तुति और वंदना इस काव्य का आवश्यक अंग है। छन्दों में संगीत का पुट पुष्पदन्त और स्वयंभू ने दयिा है। कड़वक के छन्दों की गति क्रमशः संगीत के स्वर और वाद्यों के लय पर ही चलती है।

    (11) अलंकार -योजना :-

    जैन साहित्य में अर्थालन्कार और शब्दालन्कार दोनों प्रयुक्त हुए है, परंतु प्रमुखता अर्थालन्कारों की ही है। अर्धालन्कारों में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, व्यक्तिरेक, उल्लेख, अनन्वय, दिनर्शना, विरोधाभास, स्वभावोक्ति, भ्रान्ति, सन्देह आदर्दा का प्रयोग सफलतापूर्वक हुआ है। अधिकांश जैन कवि उपमान के चुनाव में विशेष परिचय देते है। शब्दालन्कारों में श्लेष, यमक, और अनुप्रास की बहुलता है।

    (12) छन्द-विधान :-

    जैन काव्य छन्द की दृष्टि से समृद्ध है। स्वयंभू कृत 'स्वयंभूछन्द' और हेमचन्द्र विरचित 'छन्दोऽनुशासन' ग्रन्थों में पर्याप्त संख्या में छन्दो की विशिष्ट विवेचना की गई है। जैन काव्य में कड़वक, पट्दपी, चतुष्पदी, धत्ता दबतक, अहिल्य, बिलसिनी, स्कन्दक, दुबई, रासा, दोहा, उल्लाला, सोरठा, चउपद्य आदछिन्दो का प्रयोग मिलता है।

    (13) लोकभाषा की प्रतिष्ठा :-

    जैन साधु ग्राम, नगर-नगर घूमकर धर्म-प्रचार करते थे, इसीलिए उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति के लिए लोकभाषा का प्रयोग किया और उसे प्रतिष्ठा प्रदान की।

    जैन साहित्‍य संबंधित महत्‍वपूर्ण तथ्‍य 

    1. जैन साहित्य का प्रमुख आधार - जैन धर्म के सिद्धांत, तीर्थकरों का जीवन, नैतिकता और आध्यात्मिक चिंतन।
    2. जैन साहित्य की प्राचीन भाषा -  मुख्यतः प्राकृत और शौरसेनी प्राकृत।
    3. बाद में जैन आचार्यों ने अपभ्रंश में भी विपुल साहित्य की रचना की।
    4. जैन साहित्य में चरित-काव्य की समूद्ध परंपरा मिलती है।
    5. जैन कवियों ने रास, चरित, फागु और कथा आदि काव्य-रूपों में रचनाएँ कीं।
    6. स्वयंभू को अपभ्रंश के प्रमुख जैन कवियों में गिना जाता है।
    7. स्वयंभू की प्रसिद्ध रचना पउमचरिउ।
    8. पुष्पदंत अपभ्रंश के प्रसिद्ध जैन कवि थे।
    9. पुष्पदंत की प्रमुख रचनाएँ महापुराण, जसहरचरिउ और णायकुमारचरिउ।
    10. धनपाल की प्रसिद्ध कृति भविसयत्तकहा।
    11. जिनदत्त सूरि की रचना उपदेशरसायन रास।
    12. शालिभद्र सूरि की प्रसिद्ध रचना भरतेश्वर बाहुबली रास ।
    13. आसगु की रचना- चंदनबाला रास।
    14. जैन साहित्य में अहिंसा, अपरिग्रह, संयम और सदाचार को विशेष महत्व दिया गया है।
    15. जैन कवियों ने धार्मिक उपदेशों के साथ-साथ लोकजीवन और तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों का भी चित्रण किया।
    16. जैन साहित्य में श्रावक-श्राविकाओं, साधु-साध्वियों और तीर्थकरों से संबंधित कथाएँ मिलती हैं।
    17. जैन साहित्य का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य धर्मोपदेश और नैतिक जीवन की प्रेरणा देना था। 
    18. रास साहित्य के विकास में जैन कवियों का उल्लेखनीय योगदान माना जाता है।
    19. जैन साहित्य ने अपभ्रंश से आरंभिक हिंदीं की ओर होने वाले भाषिक विकास को समझने में महत्वपूर्ण सामग्री प्रदान की।
    20. आदिकालीन साहित्य के अध्ययन में जैन, सिद्ध और नाथ साहित्य को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।

    एक टिप्पणी भेजें

    0 टिप्पणियाँ