आदिकालीन सिद्ध साहित्य
बौद्ध धर्म की दो शाखाओं हीनयान व महायान में महायान को वज्रयान भी कहते हैं। वज्रयानियों को ही सिद्ध कहा गया। सिद्धों ने बौद्ध धर्म के वज्रयान तत्त्व का प्रचार करने के लिए जो साहित्य जनभाषा में लिखा, वह हिन्दी के सिद्ध साहित्य की सीमा में आता है। इन सिद्धों में सरहपा, शबरपा, लुइपा, डोंभिषा, कण्हपा एवं कुक्कुरिपा हिंदी के मुख्य सिद्ध कवि हैं।
सिद्धों ने संधा भाषा का प्रयोग किया। संधा भाषा का अर्थ है- अन्तरसाधनात्मक अनुभूतियों का संकेत करने वाली प्रतीक भाषा। राहुल सांकृत्यायन ने 84 सिद्धों के नामों का उल्लेख किया है। ये सिद्ध अपने नाम के पीछे 'पा' जोड़ते थे। 'पा' आदरार्थक पाद शब्द है।
सिद्ध का अर्थ और संक्षिप्त परिचय
- सिद्ध का अर्थ - मंत्रों अथवा तंत्र साधना के माध्यम से सिद्धि प्राप्त करने वाला।
- सिद्ध साहित्य की परिभाषा - ''आदिकाल में बौद्ध धर्म की महायान शाखा के वज्रयानी या सहजयानी कवियों द्वारा अपने धर्म का प्रचार-प्रसार करने के लिए जिस साहित्य की रचना जन-भाषा में हुई उसे सिद्ध साहित्य के नाम से जाना जाता है।''
- सिद्धों के बारे में जानकारी सबसे पहले 'वर्ण रत्नाकर' से प्राप्त होती है।
- सिद्धों का समय 8 वीं से 13 वीं शताब्दी माना जाता है।
- सिद्धों के प्रमुख केंद्र - श्री पर्वत, नालंदा, विक्रमशिला, उड़ीसा, बंगाल, नेपाल। बाद में मुस्लिम-आक्रमणों के कारण भोट देश (तिब्बत) की तरफ चले गये।
खोज और आधार ग्रंथ
आदिकालीन सिद्ध साहित्य का पता सबसे पहले हरप्रसाद शास्त्री ने 1907 ई. में नेपाल से प्राप्त किया तथा उन्होंने 1917 ई. में सिद्धों की बानियों का संकलन 'बौद्धगान-ओ-दोहा' के नाम से प्रकाशित करवाया।
सिद्ध साहित्य के ग्रंथ आधार तीन माने जाते हैं -
- साधन समुच्चय
- मंजुश्री मूल कल्प्
- आदिकर्म प्रदीप
ये अधिकांश दार्शनिक ग्रंथ मूल रूप से श्रीपर्वत पर रचे गए थे। इनका मूल आधार सहजवाद और तांत्रिक साधना था।
सिद्ध साहित्य के संबंध में विद्वानों के मत
डॉ. बच्चन सिंह जी कहते है - “तांत्रिक साधना सिद्धों का आविष्कार नहीं थी। यह बौद्धों, शैवों और वैष्णवों में समान रूप से फैली हुई थी। पर बौद्ध तंत्र अधिक ही रहस्यवादी और विकृतिपरक हो गया था। इनकी तांत्रिक साधना के स्वरूप और सामाजिकता को लेकर विद्वानों में गहरा मतभेद है। सारे तंत्रवाद का मूल तत्व देह है। चाहे वह बौद्धों का हो, शैवों का हो या वैष्णवों का हो।”
देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय के मतानुसार, “यदि यह पूर्ण रूप से भौतिकवाद नहीं तो कम से कम आदि भौतिकवाद तो है ही। ‘कुलार्णव’ तथा ऐसे अन्य तन्त्रों में यह भौतिकवाद, जबरदस्ती थोपे गये आध्यात्मिक विचारों के कारण कुछ अस्पष्ट हो गया है। किन्तु सहजिया लोगों के सरल किसान गीतों में यह मूल भौतिकवाद जीवित रहा।”
सिध्द साहित्य का वर्गीकरण
सिद्ध साहित्य को मुख्यतः तीन श्रेणियों में विभाजित किया, जो इस प्रकार है:-
- नीति या आचार संबंधित साहित्य
- उपदेश परक साहित्य
- साधना सम्बन्धी या रहस्यवादी साहित्य
सिद्धों की भाषा: संध्या या संधा भाषा
सिंद्धों ने संध्या भाषा-शैली का प्रयोग किया है। इसका प्रभा नाथों से होता हुआ भक्तिकालीन निगुण संत कवियों पर पड़ा और उन्होंने उलटबासियॉ लिखी। सिद्धों की भाषा को संध्या भाषा का नाम मुनिदत्त आर अद्वयवज्र ने दिया।
संध्या भाषा का अर्थ: मुनि अद्वयवज्र और मुनिदत्त के अनुसार, संध्या भाषा वह है जिसकी आंतरिक साधना की अनुभूतियाँ प्रतीकात्मक होती हैं। इसका आधा हिस्सा स्पष्ट और आधा रहस्यमयी होता है, जैसे शाम का धुंधलका।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल: इन्होनें इसे अन्तर्मुख साधना की प्रतीक भाषा माना है।
हरप्रसाद शास्त्री ने सिद्धों की इस भाषा को 'आलोअंधारी' (अंधेरे में उजाला) कहा है।
सिद्ध साहित्य के प्रमुख सिद्ध कवि
सिद्धों की कुल संख्या 84 मानी गई है। आर्चाय रामचंद्र शुक्ल ने चौरासी सिध्दों के नाम इस प्रकार दिये है-
लूहिपा, लीलापा, विरूपा, डोंभिपा, शबरीपा, सरहपा, कंकालीपा, मीनपा, गोरक्षपा, चौरंगीपा, वीणापा, शांतिपा, तंतिपा, चमरिपा, खङ्गपा, नागार्जुन, कण्हपा, कर्णरिपा, थगनपा, नारोपा, शीलपा, तिलोपा, अजनंगपा छत्रापा, भद्रपा, दोखंधिपा, अजोगिपा, कालपा, धोभीपा, कंकणपा, कमरिपा, डेंगिपा, भटेपा, तंधोपा, कुक्कुरिपा, कुचिपा, धर्मपा, महीपा, अचिंतिपा, भल्लहपा, नलिनपा, भूसुकुपा, इंद्रभूति, मेकोपा, कुठालिपा, कमरिपा, जालंधारपा, राहुलपा, घर्वरिपा, धोकरिपा, मेदिनीपा, पंकजपा, घंटापा, जोगीपा, चेलुकपा, गुंडरिपा, निर्गुणपा, जयानंत, चर्पटीपा, चंपकपा, भिखनपा, भलिपा, कुमरिपा, चैवरिपा, मणिभद्रपा (योगिनी), कनखलापा (योगिनी), कलकलपा, कतालीपा, धाहुरिपा, उधारिपा, कपालपा, किलपा, सागरपा, सर्वभक्षपा, नागबोधिपा, दारिकपा, पुतलिपा, पनहपा, कोकालिपा, अनंगपा, लक्ष्मीकरा (योगिनी), समुदपा, भलिपा।
📌 84 सिद्धों में प्रथम सिद्ध कवि - सरहपा
📌 84 सिद्धों में अंतिम सिद्ध कवि - मत्स्येंद्र नाथ
🔴 सिद्धों में योगिनियों की संख्या 04 बताई गई है -
- लक्ष्मीकरा (राजकुमारी)
- मणिभद्रपा (गृहदासी)
- मेखलापा (गृहपति कन्या)
- कनखलापा (गृहपतिकन्या)
सिद्ध साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ / प्रवृत्तियाँ
- इनकी साधना-पद्धति में शिव-शक्ति के युगल स्वरूप की उपासना का उल्लेख मिलता है।
- सिद्ध कवियों ने जाति-प्रथा और वर्ण-व्यवस्था का विरोध किया।
- सिद्धों की साधना में पंचमकार—मांस, मछली, मदिरा, मुद्रा और मैथुन—का उल्लेख मिलता है। हालांकि, तंत्रशास्त्र में पंचमकार के अर्थ और स्वरूप की अलग-अलग व्याख्याएँ भी मिलती हैं।
- सिद्ध निरीश्वरवादी थे, ये वैदिक देवी-देवताओं के स्थान पर लौकिक देवी-देवताओं को मानते थे।
- ये शास्त्रीय ज्ञान की अपेक्षा अनुभूति पर आधारित ज्ञान को महत्त्व देते थे।
- इस साहित्य में धार्मिक पाखंडों, ब्राह्मणवाद एवं वैदिक धर्म का विरोध किया।
- नारी सहवास को ब्रह्मानंद सहोदर मानते थे।
- सिद्ध साहित्य में तंत्र-साधना को विशेष महत्त्व दिया गया है।
- सिद्धों ने जाति प्रथा एवं वर्ण व्यवस्था का विरोध किया।
- इनके यहाँ 'कमल' 'योनि' का 'कुलिश' वज्र ओर लिंग का प्रतीक है।
- इनमें चमत्कार प्रदर्शन की प्रवृत्ति भी मिलती है।
- इनके साहित्य में रहस्यवादी भावना है।
- साहित्य में शांत एवं शृंगार रसों की प्रधानता है।
- निराशावाद के भीतर आशावाद का स्वर है।
प्रमुख सिद्ध कवि
सरहपा
प्रथम सिद्ध सरहपा को हिंदी साहित्य का प्रथम कवि भी माना जाता है। यह सरहपाद, सरोजवज्र, राहुल भद्र आदि कई नामों से प्रसिद्ध थे। ये जाति से ब्राह्मण थे। राहुल सांकृत्यायन के अनुसार इनका समय 769 ई. माना गया है। सरहपा सिद्ध शाखा में सहजयान के प्रवर्तक माने जाते हैं। हिंदी में ‘कडवक’ पद्धति का प्रयोग सबसे पहले सरहपा ने किया था। इनके द्वारा रचित 32 ग्रन्थ हैं, जिनमें 'दोहाकोश' प्रसिद्ध है। इन्होंने पाखण्ड, आडम्बर आदि का विरोध किया तथा गुरुसेवा को महत्त्व दिया।
बच्चन सिंह ने लिखा है, ''आक्रोश की भाषा का पहला प्रयोग सरहपा में ही दीखाई देता है।''
शबरपा
इनका जन्म क्षत्रिय कुल में 780 ई. में हुआ। इनके गुरु सरहपा थे। शबरों की भाँति जीवन व्यतीत करने के कारण ये शबरपा कहलाए। 'चर्यापद' इनकी प्रसिद्ध पुस्तक है। चर्यापद एक प्रकार का गीत है जो प्राय: अनुष्ठानों के समय गाया जाता है। चर्यापद संध्या भाषा-शैली के दृष्टि-कूट में लिखी गई है। शबरपा माया मोह के विरोधी थे तथा सहज जीवन पर बल देते थे।
लुइया
ये राजा धर्मपाल के शासनकाल में कायस्थ परिवार में उत्पन्न हुए थे। शबरपा ने इन्हें अपना शिष्य बनाया था। इनकी साधना का प्रभाव देख कर उड़ीसा के तत्कालीन राजा तथा मंत्री इनके शिष्य हो गये थे। चौरासी सिद्धों में इनका सबसे ऊंचा स्थान माना जाता है। इनकी कविता में रहस्य भावना की प्रधानता है।
उदाहरण -
डोम्भिया
इनका जन्म मगध के क्षत्रिय वंश में 840 ई. में हुआ था इनके गुरु विरूपा थे। इनके द्वारा रचित ग्रन्थों की संख्या 21 बताई जाती है। 'डोम्बिगीतिका' 'योगचर्या', 'अक्षरद्विकोपदेश' इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं।
कण्हपाये
कर्नाटक में 820 ई. में ब्राह्मण वंश में पैदा हुए। इनके गुरु जालंधरपा थे। इनके कई शिष्य थे। इनके ग्रन्थों की संख्या 74 बताई जाती है। इन्होंने शास्त्रीय रूढ़ियों का खण्डन किया। यह एक दार्शनिक कवि थे।
कुक्कुरिपा
इनका जन्म कपिलवस्तु में ब्राह्मण परिवार में हुआ। इनका जन्मकाल ठीक-ठीक ज्ञात नहीं है। इनके गुरु चर्पटीया थे। इनके द्वारा लिखे गए ग्रन्थों की संख्या 16 बताई जाती है।
📌काल क्रमानुसार इन सिद्धों का कालक्रम इस प्रकार है-
- सरहपा 769 ई.
- लुइपा 773 ई.
- शबरपा 780 ई.
- कण्हपा 820 ई.
- डोम्भिपा 840 ई.
प्रमुख सिद्ध कवि व उनकी रचनाएँ
| क्रमांक | सिद्ध कवि | रचना |
|---|---|---|
| 1 | सरहपा (769 ई.) | दोहाकोष |
| 2 | लुइपा (773 ई. लगभग) | लुइपादगीतिका |
| 3 | शबरपा (780 ई.) | चर्यापद, महामुद्रावज्रगीति, वज्रयोगिनीसाधना |
| 4 | कण्हपा (820 ई. लगभग) | चर्याचर्यविनिश्चय, कण्हपादगीतिका |
| 5 | डोंभिपा (840 ई. लगभग) | डोंबिगीतिका, योगचर्या, अक्षरद्विकोपदेश |
| 6 | भूसुकपा | बोधिचर्यावतार |
| 7 | आर्यदेवपा | कावेरीगीतिका |
| 8 | कंवणपा | चर्यागीतिका |
| 9 | कंबलपा | असंबंध-सर्ग दृष्टि |
| 10 | गुंडरीपा | चर्यागीति |
| 11 | जयनन्दीपा | तर्क मुदँगर कारिका |
| 12 | जालंधरपा | वियुक्त मंजरी गीति, हुँकार चित्त, भावना क्रम |
| 13 | दारिकपा | महागुह्य तत्त्वोपदेश |
| 14 | धामपा | सुगत दृष्टिगीतिकाचर्या |
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