नाथ साहित्य: प्रमुख कवि, गोरखनाथ, विशेषताएँ एवं महत्व

 आदिकालीन साहित्‍य को मुख्‍य रूप से छह प्रमुख धाराओं या प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है। जो निम्‍न है -

  1. सिद्ध साहित्य
  2. जैन साहित्य
  3. नाथ साहित्य
  4. रासो साहित्य
  5. लौकिक साहित्य
  6. गद्य साहित्य

इस पोस्‍ट में हम आदिकालीन जैन साहित्‍य को विस्‍तार से जानेगें। 

    आदिकालीन नाथ साहित्य का परिचय

    नाथ साहित्य हिंदी के आदिकालीन धार्मिक एवं दार्शनिक साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखता है जिसमें योगमार्ग, गुरु भक्ति और आत्मज्ञान की साधना को सर्वोच्च माना गया है।राहुल जी ने नाथपंथ को सिद्धों की परंपरा का ही विकसित रूप माना है। जिसमें भोग विलास, सामाजिक आडंबरों और बाह्याचारों का विरोध किया गया है। नाथ साहित्य का प्रमुख आधार योग साधना और आध्यात्मिक उन्नति है, हठयोग की प्रधानता है जो आत्मशुद्धि, संयम, ब्रह्मचर्य और मोक्ष की प्राप्ति की शिक्षा देता है। 

    इस पंथ के चलाने वाले मत्येंद्रनाथ (मछंदरनाथ) तथा गोरखनाथ माने गये हैं। 

    नाथ का अर्थ एवं परिभाषा 

    'नाथ' शब्द में से 'ना' का अर्थ है 'अनादि रूप' और 'थ' का अर्थ है 'भूवनत्रय में स्थापित होना। इस प्रकार 'नाथ' शब्द का अर्थ है- वह अनादि धर्म, जो भूवनत्रय की स्थिती का कारण है। 

    दूसरी व्याख्या के अनुसार 'नाथ' वह तत्व है, जो मोक्ष प्रदान कतरा है। नाथ ब्रह्म का उद्बोधन कतरा है, तथा अज्ञान का दरुमन करता है। नाथ सम्प्रदाय उन साधकों का सम्प्रदाय है जो 'नाथ' को परमतत्व स्वीकार कर उसकी प्राप्ति के लिए योग साधना कतरे थे तथा इस सम्प्रदाय में दीक्षित होकर अपने नाम के अन्त में 'नाथ' उपाधि जोड़ते थे। 

    नाथ साहित्य, गोरखनाथ, मत्स्येंद्रनाथ और हठयोग साधना का परिचय

    नाथ शब्‍द का प्रयोग

    नाथ शब्द का प्रयोग ब्रह्म के लिए भी हुआ है और सद्‌गुरू के लिए भी। इन योगियों की एक विशिष्ठ वेशभूषा ही है। प्रत्येक योगी एक निश्चित तिथि को कान चिरखा कर कुंडल धारण कतरा है जिसे मुद्रा कहते है। इनके हाथ में किंकरी सिर पर जटा, शरीर पर भस्म, कंठ में रूद्राक्ष की माला, हाथ में कमण्डल, कन्धे पर व्याघ्रचर्म (बाघ या शेर की खाल) और बगल मे खप्पर रहता है। 

    नाथों की संख्‍या 

    चौरासी सिद्धों के समान नौ नाथ भी प्रसिद्ध है। नाथों की संख्‍या के संबंध में अलग-अलग विद्वानों ने अपने मत दिये है। राहुल सांकृत्यायन के अनुसार नौ नाथों के नाम निम्नलिखित हैं –

    1. मत्स्येंद्रनाथ
    2. जालंधर नाथ
    3. गोरखनाथ
    4. चौरंगीनाथ
    5. कनेरी नाथ
    6. चरपट नाथ
    7. भर्तृहरिनाथ
    8. कंथड़ी नाथ और 
    9. गहनीनाथ  

    हालाकी राहुल सांकृत्‍यायन के मत से कोई भी विद्वान् सहमत नहीं हैं। 

    डॉ. रामकुमार वर्मा और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के द्वारा माने गये नौ नाथ इस प्रकार है – 

    1. आदिनाथ (स्वयं शिव)
    2. मत्स्येन्द्रनाथ
    3. गोरखनाथ
    4. चर्पटनाथ
    5. गाहिणीनाथ
    6. ज्वालेंद्रनाथ
    7. चौरंगीनाथ
    8. भर्तृनाथ (भरथरीनाथ) और 
    9. गोपीनाथ।

    नौ नाथों क संबंध में सर्वमान्‍य मत माना गया। 

    नाथों की रचनाओं का संपादन डॉ. पीतांबर दत्त बड़थ्वाल के प्रयत्नों से 1942 ईस्वी में हुआ।  

    गोरखनाथ नाथ संप्रदाय के सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं प्रमुख कवि माने जाते हैं। गोरखनाथ के ग्रंथों की संख्या लगभग 40 मानी गई है  जिनमें  कुछ प्रमुख ग्रथं अवधूत गीता,  गोरक्ष शास्त्र,  ज्ञान प्रकाश शतक, गोरक्ष गीता, नाड़ी ज्ञान,  गोरख सार,  हठयोग, योग चिंतामणि,  गोरख वाणी,  सिद्धांत पद्धती  हठसंहिता आदि हैं।  

    नाथ साहित्‍य के संंबंध में विद्वानों के मत

    डॉ. रामकुमार वर्मा ने नाथपंथ के चरमोत्कर्ष का समय बारहवीं शताब्दी से चौदहवीं शताब्दी के अंत तक माना है। उनका मत है कि नाथपंथ से ही भक्तिकाल के संतमत का विकास हुआ था, जिसके प्रथम कवि कबीर थे। इस मंतव्य का समर्थन कथ्य और शिल्प दोनों दृष्टियों से हो जाता है, नाथपंथी रचनाओं की अनेक विशेषताएं संत-काव्य में यथावत् विद्यमान हैं।

    डॉ. नगेंद्र के अनुसार,  “सिद्धों के वाममार्गी भोग प्रधान प्रणाली की प्रतिक्रिया (विरोध) स्वरुप आदिकाल में नाथ पंथियों की (हठयोग) साधना प्रणाली आरंभ हुई।”

    राहुल सांकृत्यायन के अनुसार, “नाथ पंथ सिद्धों की परंपरा का ही विकसित रूप है।”

    आचार्य चतुरसेन शास्त्री के शब्दों में- “नाथों की भाषा कुछ कर्कस व फक्कड़ी भाषा है जिसमे सपाट बयानी है।”

    डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार, "नाथपंथ या नाथ संप्रदाय के सिद्धमत, सिद्धमार्ग, योग-मार्ग, योगसंप्रदाय, अवधूतमत एवं अवधूत-संप्रदाय नाम भी प्रसिद्ध हैं। " 

    उनके इस कथन का यह अर्थ नहीं कि सिद्धमत और नाथमत एक ही हैं। उन्होंने तो नाम ख्याति की ओर ध्यान आकर्षित किया है, जिसका आशय इतना ही है कि इन दोनों मार्गों को एक ही नाम से पुकारा जाता था और उसका कारण यह था कि मत्येंद्रनाथ (मछंदरनाथ) तथा गोरक्षनाथ (गोरखनाथ) सिद्धों में भी गिने जाते थे। 

    यह प्रसिद्ध है कि मत्येंद्रनाथ नारी-साहचर्य के आचार में जा फंसे थे, जिससे उनके शिष्य गोरक्षनाथ ने उद्धार किया था। वस्तुतः इस लोकचर्चा के मूल में ही सिद्धमत एवं नाथमत का अंतर छिपा हुआ है। सिद्धगण नारी-भोग में विश्वास करते थे, किंतु नाथपंथी उसके विरोधी थे। 

    नाथ साहित्‍य के प्रमुख कवि 

    1. गोरखनाथ : 

    गोरखनाथ नाथ साहित्य के आरंभकर्ता माने जाते हैं। वे सिद्ध मत्येंद्रनाथ के शिष्य थे, किंतु उन्होंने सिद्धों के मार्ग का विरोध किया था। गोरखपंथी साहित्य के अनुसार आदिनाथ स्वयं शिव थे। उनके पश्चात मत्येंद्रनाथ हुए, जिनके आचरण का विरोध उनके शिष्य गोरखनाथ ने किया। 

    राहुल सांकृत्यायन ने गोरखनाथ का समय 845 ई. माना है, डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी उन्हें नवीं शती का मानते हैं, आचार्य रामचंद्र शुक्ल उन्हें तेरहवीं शती का बतलाते हैं, डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल इन्हें ग्यारहवीं शती का मानते हैं तथा डॉ. रामकुमार वर्मा शुक्ल जी के मत से सहमत हैं। 

    नवीन खोजों के अनुसार यही धारणा अधिक प्रबल हुई है कि गोरखनाथ ने ईसा की तेरहवीं शती के आरंभ में अपना साहित्य लिखा था। उनके ग्रंथों की संख्या 40 मानी जाती है, किंतु डॉ. बड़थ्वाल ने केवल 14 ही उनके द्वारा रचित मानी हैं, जिनके नाम हैं - सबदी, पद, प्राण संकली, सिष्यादरसन, नरवैबोध, अभैमात्राजोग, आतम-बोध, पंद्रह तिथि, सप्तवार, मछींद्र-गोरखबोध, रोमावली, ग्यानतिलक, ग्यानचौंतीसा एवं पंचमात्रा। 

    डॉ. बड़थ्वाल ने 'गोरखबानी' नाम से उनकी रचनाओं का एक संकलन भी संपादित किया है, जिसकी कई रचनाएं साहित्य की सीमा में आती हैं।

    गोरखनाथ ने उनकी रचनाओं में गुरु-महिमा, इंद्रिय-निग्रह, प्राण-साधना, वैराग्य, मनःसाधना कुंडलिनी जागरण, शून्यसमाधि आदि का वर्णन किया है। इन विषयों में नीति और साधना की व्यापकता मिलती है। 

    2. मत्स्येंद्रनाथ

    नाथ साहित्‍य के नाथ मत्स्येंद्रनाथ को मैन नाथ तथा मिन नाथ भी कहा जाता था। यह गोरखनाथ के गुरु थे। ऐसा कहा जाता है कि सागर के तट पर शिवजी पार्वती को योगविद्या का रहस्य समझा रहे थे। तब ही माता पार्वती को नींद आ गई, किंतु मत्स्येंद्रनाथ मछली के रूप में योगविद्या के रहस्य को सुनते रहे। इसी कारण उनका नाम मत्स्येंद्रनाथ पड़ा। सिंघल द्वीप की रानी पद्मावती से इनके दो पुत्र उत्पन्न हुए, जिनके नाम पारसनाथ और नेमिनाथ थे। आगे चलकर ये जैन तीर्थंकर हुए। इनका प्रसिद्ध ग्रंथ 'कौल ज्ञान निर्णय' है।

    3. गहिनीनाथ

    गहिनीनाथ गोरखनाथ के शिष्य थे तथा ज्ञानेश्वर के पिता और विट्ठल नाथ के गुरु थे। इनका समय 13वीं शताब्दी का मध्य भाग माना जाता है। इनके शिष्यों में निवृत्तिनाथ भी थे। यही निवृत्तिनाथ अपने छोटे भाई ज्ञानेश्वर के गुरु थे।

    जालंधरनाथ गोपीचंद के गुरु थे। अपना घर-द्वार छोड़कर राजा गोपीचंद योगी बन गए। गोपीचंद की माता मैनावती के कारण जालंधरनाथ को कुएँ में डाल दिया गया। वहीं पर गोरखनाथ ने उन्हें बाहर निकालने का अनुनय किया। बाहर आने के बाद उन्होंने राजा गोपीचंद को अपना शिष्य बना लिया। आगे चलकर उन्होंने राजपाट छोड़कर योग-साधना में ही अपना जीवन व्यतीत किया।

    4. भर्तहरि नाथ

    भर्तहरि नाथ दूसरा नाम भरत नाथ है। ये जालंधरनाथ के शिष्य थे। ये राजा थे, किंतु एक बार उन्होंने अपनी रानी पिंगला की परीक्षा लेने की सोची और इन्‍होंने झूठ-मूठ राजा की मृत्यु का समाचार फैलाया गया था। यह सुनकर रानी सती हो गई। राजा विलाप करने लगा। वहाँ गोरखनाथ आए और उन्होंने रानी पिंगला को फिर से जीवित किया। तब राजा ने पिंगला को माता कहकर भिक्षा माँगी और जंगल में चले गए। आज भी राजा गोपीचंद-भर्तहरि के नाम से अनेक लोकगीत प्रचलित हैं।

    भर्तहरि द्वारा लिखी गई संस्कृत की तीन पुस्तकें प्रसिद्ध हैं— 'शृंगार शतक', 'नीति शतक' और 'वैराग्य शतक' आदि।

    नाथ साहित्य की विशेषताएं

    नाथों ने अपनी मान्यताओं के प्रचार के लिए जिस प्रकार के साहित्य की रचना की है उसे नाथ साहित्य कहा जाता है। यह आदिकालीन साहित्य का माहत्वपूर्ण अंश है। इसे सिद्ध साहित्य का विकसित रूप माना जाता है जिसमें बौद्ध के साथ साथ कुछ अंश तक शैव मत को भी स्वीकार किया जाता है|

    नाथ साहित्‍य की भाव पक्ष की विशेषताएं:-

    धार्मिक मान्यता से ओतप्रोत - 

    नाथों ने अपने साहित्य की रचना अपनी धार्मिक मान्यताओं के प्रचार प्रसार के लिए किया है इसलिए उनकी रचनाए धार्मिक मान्यता से ओत-प्रोत हैं। इनकी रचनाओं में इन्द्रिय निग्रह, संयम, निवृत्ति मार्ग, हठयोग आदि का वर्णन मिलता है। इनके द्वारा आडम्बरों का खंडन भी किया गया है।  गोरखनाथ ने लिखा है-

    अवधू मन चंगा तो कठौती में गंगा'

    निवृत्ति मार्ग की स्थापना - 

    नाथों ने सिद्धों की प्रवृत्ति मार्ग के विपरीत निवृत्ति मार्ग को अपनाया है। निवृत्ति मार्ग का आशय है सांसारिक सुखों में लीन न होना। नाथ सांसारिक सुख के प्रति उदासीन हैं। गोरखनाथ ने लिखा है-

    “नौ लख पातरि आगे नाचे, पीछे सहज अखाडा। 

    ऐसो मन लै जोगी खेलै तब अंतर बसै भंडारा।।”

    सांसारिक भोग से मुक्ति - 

    नाथों का मानना है की आध्यात्मिक सत्य तक वही पहुँच सकता है जो सांसारिक भोग से मुक्त हो चुका हो| सांसारिक भोग से मुक्त होने के लिएं इन्द्रियों का नियमन, निग्रह एवं संयम आवश्यक है।

    "जोगी सोई जाणीए जग ते रहै उदास 

    तत निरंजण पाइए कहै मछंदर दास”

    हठ योग पद्धति - 

    नाथों के साधना पद्धति को हठ योग कहते हैं। इसका आशय है 'ह' यानी सूर्य 'ठ' यानी चन्द्रमा को आपस में मिला देना। इसका आशय है इन्द्रियों के स्वभाव को पलट देना। हठ योग के माध्यम से ही कुण्डलिनी जागरण तथा षट्चक्र भेदन का अभ्यास किया जाता है।

    बाह्य आडम्बरों का विरोध - 

    नाथों ने सभी प्रकार के बाह्य आडम्बरों का विरोध किया है। इनके द्वारा वर्ण व्यवस्था, जाति तथा उंच नीच पर चोट किया गया है और समानता पर बल दिया गया है।

    गुरु का महत्त्व - 

    नाथों ने गुरु के महत्त्व का भी प्रतिपादन किया है। इनके अनुसार बिना गुरु के मुक्ति संभव नहीं है। गोरखनाथ ने लिखा है-

    "गुरु कीजै महिला निगुरा न रहिला, 

    गुरु बिन ज्ञानं न पाइला रे भाइला।”


    नाथ साहित्‍य की शिल्प पक्ष की विशेषताएं - 

    नाथों ने कवि के रूप में अपनी कविताएँ नहीं लिखी हैं बल्कि उन्होंने अपने धार्मिक मान्यताओ का प्रचार प्रसार ही अपनी कविता के माध्यम से किया है। इसलिए उनके काव्य में शिल्प की सजगता दिखाई नहीं पड़ती है।

    भाषा -

    नाथों की भाषा अपभ्रंश व पुरानी हिंदी के संक्रमण काल की है। जिसमे ब्रज, अवधी, पंजाबी आदि के शब्द शामिल है।

    काव्य रूप - 

    इनकी कविताए मुक्तक के रूप में ही उपलब्ध हैं।

    उलटवासी - 

    नाथों ने अपनी कविता उलटवासी का प्रयोग किया है जिसका अर्थ है- विपरीत कथन। यह एक प्रकार की प्रतीक होती हैं जिनका अर्थ खुलने पर ही प्रकट होता है|-

    “नाथ बोलै अमृत बाणी, 

    बरिसैगी कम्बली भीजैगा पाणी"

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    नाथ साहित्य का महत्व

    इन नाथों ने अपने सम्प्रदाय में भोग का तरिस्कार, इन्द्रिय संयम, मनः साधना, प्राणसाधना, कुण्डलिनी जागरण, योग साधना को अधिक महत्व दिया है। इनकी साधना का मूल स्वर शील, संयम और शुद्धतावादी था। इस सम्प्रदाय में इन्द्रिय निग्रह पर विशेष बल दिया गया है। इन्द्रियों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण नारी है, तअः नारी से दूर रहना की भरसक शिक्षा दी गई है। संभव है कि गोरखनाथ ने बौद्ध विहारों में भिक्षुनियों के प्रवेश का परिणाम और उनका चरित्रिक पतन देखा हो। 

    इस सम्प्रदाय में निवृत्ति और मुक्ति गुरू के प्रसाद से ही संभव मानी गई है। अत: गुरू का विशेष महत्व है। नाथ पंथियों के मुख्य सिद्धान्त इन्द्रिय - संगम, मनः साधना, हठयोग साधना आदि का प्रभाव कबीर एवं अन्य सन्तों की रचनाओं में देखा जा सतका है। गोरखनाथ आदि ने जिन प्रतीकों को पारिभाषिक शब्दों को, खण्डन मण्डनात्मक शैली को अपनाया उसका विकास संत साहित्य में मितला है।

    नाथों की साधना 

    प्रणाली 'हठयोग' पर आधारित है। 'ह' का अर्थ सूर्य और 'ठ' का अर्थ चन्द्र बतलाया गया है। सूर्य और चन्द्र के योगों को हठयोग कहते है। यहाँ सूर्य इड़ा नाडी का और चन्द्र पिंगला नाडी का प्रतीक है। 

    इस साधना पद्धती के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति कुण्डलिनी और प्राणशक्ति लेकर पैदा होता है। सामान्यतया कुण्डलिनी शक्ति सुषुप्त रहती है। साधक प्राणायाम के द्वारा कुण्डलिनी को जातगृ कर ऊर्ध्वमुख कतरा है। शरीर में छह चक्रों और तीन नाड़ियों की तबा कही गयी है। जब योगी प्रणयान के द्वारा इड़ा पिंगला नामक श्वास मार्गों को रोक लेते है। तब इनके मध्य में स्तिथ सुषुम्ना नाड़ी का द्वार खुलता है। कुण्डलिनी शक्ति इसी नाड़ी के मार्ग से आगे बढ़ती है और छ. चक्रों को पार कर मस्तिष्क के निकट स्थित शून्यचक्र में पहुँचती है। यही पर जीवात्मा को पहुँचा देना योगी का चरम लक्ष्य होता है। यही परमानन्द तथा ब्रह्मानुभूति की अवस्था है। यही हठयोग साधना है।

    सिद्ध साहित्‍य और नाथ साहित्‍य में प्रमुख अंतर 

    आदिकालीन साहित्‍य में सिद्ध और नाथ में अंतर इस प्रकार है, जो निम्‍न है -

    क्र. सिद्ध साहित्य नाथ साहित्य
    1. सिद्धों की साधना में सहजयान और वज्रयान की प्रवृत्तियाँ प्रमुख थीं। नाथों की साधना में हठयोग और योग-साधना को विशेष महत्त्व दिया गया।
    2. सिद्ध परंपरा की कुछ धाराओं में साधना के लिए नारी के सहयोग को महत्त्व दिया गया। नाथ परंपरा में योग-साधना और ब्रह्मचर्य पर विशेष बल दिया गया।
    3. सिद्धों की कुछ साधना-पद्धतियों में नारी-सहवास को साधना का अंग माना गया। नाथों ने ब्रह्मचर्य और इंद्रिय-निग्रह को महत्त्व दिया।
    4. सिद्ध साहित्य में सहज साधना तथा तांत्रिक साधना की प्रवृत्तियाँ मिलती हैं। नाथ साहित्य में योग-साधना, शरीर-साधना और कुंडलिनी-जागरण पर बल मिलता है।
    5. सिद्धों ने गुरु की महिमा को स्वीकार किया। नाथों ने गुरु को साधना में अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान दिया।
    6. सिद्धों ने ब्राह्मणवाद, पुरोहितवाद, पाखंड और रूढ़ियों का खंडन किया। नाथों ने भी धार्मिक आडंबरों, पाखंड और रूढ़ियों का विरोध किया।
    7. सिद्ध साहित्य में प्रतीकात्मकता, उलटबाँसी और संध्या भाषा का प्रयोग मिलता है। नाथ साहित्य में उपदेशात्मकता, योग-संबंधी पारिभाषिक शब्दावली और उलटबाँसी का प्रयोग मिलता है।
    8. परंपरागत मान्यता के अनुसार सिद्धों की संख्या 84 मानी गई है। परंपरागत मान्यता के अनुसार नवनाथों की संख्या 9 मानी गई है।
    9. अनेक सिद्धों के नाम के अंत में ‘पा’ आता है, जैसे—सरहपा, शबरपा आदि। अनेक नाथ योगियों के नाम के अंत में ‘नाथ’ आता है, जैसे—मत्स्येंद्रनाथ, गोरखनाथ आदि।
    10. सिद्ध साहित्य का संबंध पूर्वी भारत, विशेषकर बिहार और बंगाल सहित असम तक के क्षेत्रों से रहा। नाथ परंपरा का प्रसार राजस्थान, पंजाब सहित भारत के विभिन्न क्षेत्रों में हुआ।

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